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    राजा,रानी और कहानी: दूसरे राजपरिवारों से अलग है कोल्हापुर राजवंश

    By Lalit RaiEdited By:
    Updated: Sat, 23 Sep 2017 05:06 PM (IST)

    राज परिवारों के उत्थान और पतन की कहानी में हर एक की दिलचस्पी रहती है। कोल्हापुर का मराठा राजपरिवार उनमें से एक है।

    राजा,रानी और कहानी: दूसरे राजपरिवारों से अलग है कोल्हापुर राजवंश

    नई दिल्ली [स्पेशल डेस्क] । कोल्हापुर और सतारा का जिक्र होते ही छत्रपति शिवाजी महाराज की शौर्य गाथा याद आती है। 1680 में शिवाजी महाराज के निधन के बाद मुगल बादशाह औरंगजेब लगातार मराठा राज्य पर दबाव बनाता रहा। लेकिन शाहू जी, राजाराम और ताराबाई की अगुवाई में मराठा पूरे उत्साह से मुगलों के खिलाफ लड़ते रहे। समय बीतने के साथ मराठा राज्य दो हिस्सों में बंट गया जिसे कोल्हापुर और सतारा के नाम से जाना गया। 1849 में अंग्रेज गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स के जरिए सतारा को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया। कोल्हापुर राज्य की विरासत राजाराम के वंशजों के हाथों में आई और अंग्रेजों ने 19 बंदूकों की सलामी का अधिकार दिया। अंग्रेजी शासन के दौरान बहुत से भारतीय राज्य अपनी जनता की भलाई के प्रति लापरवाह थे। लेकिन कोल्हापुर राज्य उस जमाने में भी प्रगतिशील था। अब जब लोकतंत्र में राजा और रानी का कोई कानूनी वजूद नहीं है, कोल्हापुर के शंभाजी राजे थोड़े अलग है। शंभाजी राजे, छत्रपति शिवाजी महाराज के 13वें वंशज हैं। आइए आप को बताते हैं कि शंभाजी राजे का राजपरिवारों के बारे में क्या कुछ कहना है। 

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     आम और खास में कोई भेद नहीं

    मौजूदा क्राउन प्रिंस और सांसद शंभाजी राजे का कहना है कि मराठों को मुख्य धारा में जोड़ने के लिए आरक्षण की जरूरत है। इस संबंध में उन्होंने संसद में आवाज भी उठाई थी। एक राजपरिवार से संबंध होने की वजह से ये उनकी जिम्मेदारी है कि वो नौजवान मराठा युवकों को उनके पिछले इतिहास के बारे में बताएं। शाहू जी का जिक्र करते हुए वो बताते हैं कि कोल्हापुर में शाहुजी हमेशा दलित समुदाय से कहा करते थे कि डॉ बी आर अंबेडकर ही उनके नेता हैं। उन्होंने एक कार्यक्रम में खुद अपना साफा अंबेडकर को दिया था।


    शंभाजीराजे कहते हैं कि प्रिवी पर्स के खत्म होने से उनका परिवार प्रभावित नहीं हुआ। सच ये है कि कोल्हापुर राजपरिवार ने अपने लिए कभी कुछ नहीं किया। न तो शाहू जी न ही उनके पिता और न ही किसी और ने खुद के उद्योगधंधों के बारे में नहीं सोचा। कोल्हापुर राजपरिवार के पास कोई होटल नहीं है। उन्होंने कहा कि कभी भी रॉल्स रॉयल की चाहत नहीं रही। वो जिस कार में चलते हैं उसमें खुश हैं। शंभाजी राजे कहते हैं कि मराठा राजपरिवार हमेशा देश और अपने समाज के लिए जीता रहा है। वो कहते हैं कि आम तौर पर ये धारणा रही है कि राजपरिवारों और आम लोगों के बीच हमेशा दूरी बनी रहती है। लेकिन वो इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते हैं। अगर उनका बेटा सामान्य परिवार में शादी करना चाहेगा तो  वो कभी नहीं रोकेंगे।

    ऐसे थे शाहू जी महाराज

    कोल्हापुर के मशहूर राजाओं में छत्रपति शाहु महाराज थे। 1902 में वो ऐसे पहले भारतीय राजा बने जिन्होंने सरकारी नौकरियों में सामाजिक-आर्थिक और मुसलमानों को आरक्षण देने की व्यवस्था की। शंभाजी राजे( वर्तमान में क्राउन प्रिंस) शाहू के पांचवें वंशज हैं।शाहू जी महाराज ने अपनी प्रजा की भलाई के लिए कई कदम उठाए थे। उन्होंने कोल्हापुर तक रेलवे लाइन बिछवाई, राधा नगरी में डैम बनवाए और किसानों के लिए भूमि सुधार पर काम करना शुरू किया। इसके अलावा दलित समाज के लोगों को उद्योगों की तरफ आकर्शित करने के प्रयास शुरू किये। बताया जाता है कि शाहू जी जब कभी महल से बाहर जाते थे तो वो दलित शख्स के कैंटीन में चाय जरूर पीते थे। शाहू जी ने जब आरक्षण को अपने राज्य में लागू किया तो उसमें मराठा भी शामिल थे। उन्हें पता था कि सिर्फ 30 फीसद मराठा परिवार संपन्न थे, जबकि 70 फीसद परिवारों को सरकारी मदद की जरूरत थी।

    मराठा राजपरिवार की कहानी

    कोल्हापुर और सतारा महाराष्ट्र के दो प्रमुख राजपरिवार हैं। मराठा साम्राज्य के जनक छत्रपति शिवाजी के दो बेटे शंभाजी और राजाराम थे। 1680 में शिवाजी के निधन के बाद शंभाजी ने स्वराज्य को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया और लगातार मुगल बादशाह औरंगजेब से संघर्ष करते रहे। मराठों की तरफ से मिल रहे विरोध से औरंगजेब इतना परेशान हो चुका था कि वो खुद डेक्कन की तरफ कूच कर गया।1689 में मुगल सेना ने शंभाजी को पकड़ा और हत्या कर दी। शंभाजी के निधन के बाद उनके छोटे भाई राजाराम का राजतिलक किया गया। राजाराम भी 1700 में अपनी आखिरी सांस तक मुगलों के खिलाफ लड़ते रहे।

    राजाराम की लड़ाई को उनकी विधवा ताराबाई ने उठाया। 1707 में औरंगजेब की मौत के बाद मुगलों ने शंभाजी के बेटे शाहू को कैद से आजाद कर महाराष्ट्र जाने की आज्ञा दी। शाहू जी ने सतारा से शासन करना शुरू किया। 1734 में वरना नदी के किनारे एक संधि हुई जिसमें कोल्हापुर और सतारा दो अलग-अलग राज्य बने। शाहू को सतारा राज्य का जिम्मा दिया गया और उनकी मदद पेशवा करते थे। कोल्हापुर राज्य की जिम्मेदारी राजाराम के वंशजों को दी गई। दोनों राज्य एक दूसरे से अलग थे लिहाजा कुछ दूसरे राज्यों की तरह जूनियर और सिनियर का भेद नहीं था। 

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