नई दिल्ली, [शशांक द्विवेदी]। युवा शक्ति हर युग में और हर समाज में सबसे उर्वर मानी जाती रही है। आर्थिक विकास के लिहाज से भी युवा शक्ति समाज के लिए वरदान हो सकती है। इसलिए अगर भारत के नीति नियंता इस बात से खुश हैं कि उन्हें युवा शक्ति का अक्षय भंडार मिला है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं।

आबादी के ये आंकड़े चौंकाते हैं

यह तथ्य भारत के ही लिए नहीं, पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है कि 2020 में एक औसत भारतीय की उम्र महज 29 साल होगी, जबकि औसत चीनी और अमेरिकी नागरिक 37 साल का होगा। उसी साल पश्चिम यूरोप में यह उम्र 45 साल और जापान में 48 साल होगी। आबादी के आंकड़ों के आधार पर विश्लेषकों ने जो अनुमान पेश किए हैं, उनके मुताबिक 2020 तक भारत की कामकाजी आबादी 4 करोड़ 70 लाख बढ़ चुकी होगी। 21वीं सदी में भारत की जिस प्रभावी भूमिका की चर्चा हम पिछले कुछ समय से लगातार सुनते आ रहे हैं और जिस भूमिका के लिए अब देश तैयार हो रहा है जिसका मुख्य आधार भी यही है कि भारत अब एक लंबे समय तक सबसे युवा देश बना रहने वाला है। मगर अब सबसे बड़ी समस्या यह है कि इतनी बड़ी युवा आबादी को सही दिशा कैसे दें या इतनी बड़ी युवा आबादी को राष्ट्र निर्माण के लिए सकारात्मक दिशा में कैसे मोड़ें?

इस महत्वपूर्ण प्रश्न का सिर्फ एक ही जवाब है कि सम्रग्र शिक्षा और रोजगार के माध्यम से हम देश के युवाओं को सही दिशा दे सकते हैं। जबकि अभी देश में रोजगारपरक शिक्षा न मिलने से बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही है। श्रम मंत्रलय के मुताबिक आर्थिक सर्वेक्षण (2016-17) में कहा गया है कि रोजगार के अवसर पैदा करने की गति सुस्त हुई है। श्रम मंत्रलय के पांचवें वार्षिक रोजगार-बेरोजगार सर्वेक्षण की रिपोर्ट में कहा गया है कि बेरोजगारी दर पांच फीसद रही।

बेरोजगारी के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। पढ़े-लिखे लोगों में बेरोजगारी के हालात ये हैं कि चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी के पद के लिए प्रबंधन की पढ़ाई करने वाले और इंजीनियरिंग के डिग्रीधारी भी आवेदन करते हैं। रोजगार के मोर्चे पर हालात विस्फोटक होते जा रहे हैं। सरकार को चाहिए कि इस मसले पर वह गंभीरता से विचार करे। घोषित तौर पर सरकारी योजनाएं बहुत हैं, लेकिन क्या उन पर ईमानदारी से अमल हो पाता है? इसकी जांच करने वाला कोई नहीं। आखिर देश के युवा कहां जाएं, क्या करें, जब उनके पास रोजगार के लिए मौके नहीं हैं, समुचित संसाधन नहीं हैं, योजनाए सिर्फ कागजों में सीमित हैं। युवा देश का भविष्य है तो वह क्यों अधर में लटका हआ है?

युवाओं का भविष्य अधर में

आज युवा दिवस पर इस रिपोर्ट का जिक्र इसलिए करना पड़ा कि यह ओजस्वी विचारों से ओतप्रोत स्वामी विवेकानंद का देश है जिन्होंने युवाओं को हमेशा आत्मविश्वास से लबरेज रहकर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी थी। आज उन्हीं के देश में शिक्षित युवाओं का भविष्य अधर में है और वह गलत दिशा की तरफ जा रहा है। इसलिए आज के इस दौर में स्वामी विवेकानंद के विचार बहुत ही प्रासंगिक हैं। युवा पीढ़ी एक राष्ट्र की रीढ़ होती है। उनका मनोबल, उनकी क्षमताएं, उनका साहस असीम है।

‘उठो, जागो और अपने लक्ष्य को प्राप्त करो’ का संदेश देने वाले युवाओं के प्रेरणास्नोत, समाज सुधारक, युग-पुरुष स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था। इनके जन्मदिन को ही के रूप में मनाया जाता है। इसका मुख्य कारण उनका दर्शन, सिद्धांत, अलौकिक विचार और उनके आदर्श हैं, जिनका उन्होंने स्वयं पालन किया और भारत के साथ-साथ अन्य देशों में भी उन्हें स्थापित किया। उनके विचार और आदर्श युवाओं में नई शक्ति और ऊर्जा का संचार कर सकते हैं। किसी भी देश के युवा उसका भविष्य होते हैं। उन्हीं के हाथों में देश की उन्नति की बागडोर होती है। आज के परिवेश देश में जहां भ्रष्टाचार, बुराई, अपराध का बोलबाला है जो घुन बनकर देश को अंदर ही अंदर खाए जा रहे हैं।

भारत को जानने के लिए विवेकानंद को जानो

ऐसे में देश की युवा शक्ति को जागृत करना और उन्हें देश के प्रति कर्तव्यों का बोध कराना अत्यंत आवश्यक है। विवेकानंद के विचारों में वह क्रांति और तेज है जो सारे युवाओं को नई चेतना से भर दे। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था-यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़िये। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं। रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था-विवेकानंद के द्वितीय होने की कल्पना करना भी असंभव है वे जहां भी गए, सर्वप्रथम ही रहे। हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी।

मात्र 39 वसंत देखने वाले युवा संन्यासी स्वामी विवेकानंद ने युवाओं का आह्वान किया था- गीता पढ़ने के बजाय फुटबॉल खेलो। दरअसल, वह कर्मयोगी और युगद्रष्टा थे, इसलिए उनका उद्घोष था-उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य को न प्राप्त कर लो। अपने समय से बहुत आगे की सोचने वाले महान चिंतक और दार्शनिक विवेकानंद वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बहुत महत्व देते थे। वह शिक्षा और ज्ञान को आस्था की कुंजी मानते हैं। स्त्री शिक्षा के वह विशेष हिमायती थे। क्योंकि उनका मानना था कि एक शिक्षित स्त्री अपने जीवन काल में कई परिवारों का भला कर सकती है।

आज भी स्वामी विवेकानंद को उनके विचारों और आदर्शो के कारण जाना जाता है। देश की वर्तमान परिस्थितियों में आज उनके विचार बहुत ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं। इसी वजह से वह देश के युवाओं के प्रेरणास्नोत बने हुए हैं। देश को उनके जैसे ही युवा नेतृत्व की जरूरत है, जो देश को आगे बढ़ा सके।

(लेखक मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डिप्टी डायरेक्टर हैं)

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Posted By: Abhishek Pratap Singh