जानें- गुरुवायुर मंदिर के निर्माण और उससे जुड़ी रोचक कहानी; सिर्फ हिंदू ही कर सकते हैं दर्शन
मंदिर के देवता भगवान गुरुवायुरप्पन हैं जो कृष्ण भगवान का बालरूप है। हालांकि गैर-हिन्दुओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं है।
नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। सैकड़ों साल बाद भारत के केरल राज्य के त्रिसूर जिले में गुरुवायुर मंदिर के आसपास के इलाकों का स्वरूप तो बहुत बदल गया है, लेकिन कुछ नहीं बदला है वो भगवान के प्रति भक्तों की अटूट श्रद्धा और यही श्रद्धा प्रधानमंत्री को इन मंदिरों तक खींच ला रही है। जो कई शताब्दियों पुराना है और केरल में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। मंदिर के देवता भगवान गुरुवायुरप्पन हैं जो कृष्ण भगवान का बालरूप है। हालांकि, गैर-हिन्दुओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं है। कई धर्मों को मानने वाले भगवान गुरुवायुरप्पन के परम भक्त हैं। केरल के गुरुवायुर में स्थित गुरुवायुर मंदिर बालगोपाल श्रीकृष्ण का प्रसिद्ध हिंदू मंदिर है। ये भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। यहां भगवान कृष्ण की पूजा गुरुवायुरप्पन के रूप में की जाती है। मंदिर में भगवान विष्णु के दस अवतारों का भी वर्णन किया गया है।
मंदिर से जुड़ी कथा
मान्यता है कि इस मंदिर में जिस मूर्ति की स्थापना की गई है वह मूर्ति द्वारिका की है। एक बार जब द्वारिका में भयंकर बाढ़ आई तो यह मूर्ति बह गई। देव गुरु बृहस्पति को भगवान की ये मूर्ति मिली। उन्होंने वायु की सहायता से इस मूर्ति को उपयुक्त स्थान पर पहुंचा दिया। वायु और बृहस्पति इस मूर्ति की स्थापना के लिये एक उपयुक्त स्थान ढूंढ रहे थे, तभी वह केरल पहुंचे। जहां उन्हें महादेव और माता पार्वती के दर्शन हुए। महादेव के कहने पर बृहस्पति और वायु ने उस मूर्ति की स्थापना की। गुरु और वायु के नाम पर ही इस मंदिर का नाम गुरुवायुर श्रीकृष्ण मंदिर पड़ा। हालांकि, इस मंदिर में गैर-हिन्दुओं को प्रवेश की अनुमति नहीं है, फिर भी कई धर्मों के अनुयायी भगवान गुरुवायुरप्पन के परम भक्त हैं।
कला और साहित्य से रिश्ता
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इसका रिश्ता केवल धर्म-कर्म और पूजा पाठ से ही नहीं, बल्कि कला और साहित्य से भी है। ये मंदिर प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्य कला कथकली के विकास में सहायक रही विधा कृष्णनट्टम कली, जो कि नाट्य-नृत्य कला का एक रूप है उसका प्रमुख केंद्र है। गुरुयावुर मंदिर प्रशासन जो गुरुवायुर देवास्वोम कहलाता है एक कृष्णट्टम संस्थान का संचालन करता है। इसके साथ ही, गुरुवायुर मंदिर का दो प्रसिद्ध साहित्यिक कृतियों से भी संबंध है नारायणीयम के लेखक मेल्पथूर नारायण भट्टाथिरी और ज्नानाप्पना के लेखक पून्थानम, दोनों ही गुरुवायुरप्पन के परम भक्त थे।
पहुंचने का मार्ग
यहां पहुंचने के लिए सबसे निकटम मार्ग तिसूर रेलवे स्टेशन है। दक्षिण रेलवे कोच्चि हार्बर टर्मिनस-पौरण्णुर जंक्शन रेलमार्ग एवं एर्नाकुलम जंक्शन से 75 किलोमीटर दूर त्रिसूर स्टेशन है। यहां से बत्तीस किलोमीटर दूर है गुरुवायुर मंदिर।
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