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    बस्तर के जंगलों में गोलियां की जगह अब लाइट, कैमरा-एक्शन की गूंज

    Updated: Sun, 30 Nov 2025 06:59 PM (IST)

    बस्तर, जो कभी माओवादी हिंसा से त्रस्त था, अब फिल्म निर्माण का केंद्र बन रहा है। 'दण्डा कोटुम' की शूटिंग चल रही है, और 'माटी' जैसी फिल्में रिलीज हो चुकी हैं। सुरम्य प्रकृति और आदिवासी संस्कृति फिल्म निर्माताओं को आकर्षित कर रही है। स्थानीय प्रतिभाओं को अवसर मिल रहा है, और पर्यटन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। बस्तर में फिल्म शूटिंग का सुनहरा दौर लौट रहा है।

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    बस्तर के जंगलों में अब लाइट, कैमरा-एक्शन की गूंज।

    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। लंबे समय तक माओवादी हिंसा की साए में दबी रही बस्तर की धरती अब नई कहानी लिख रही है। गोलियों की गूंज थमने लगी है और उसकी जगह जंगलों में फिर ‘लाइट, कैमरा, एक्शन’ की आवाजें लौट आई हैं। अबूझमाड़ से दक्षिण बस्तर तक फिल्मकार नए दृश्य तलाश रहे हैं।

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    कहीं ‘दण्डा कोटुम’ की शूटिंग जारी है, तो हाल ही में रिलीज माटी ने खूब चर्चा बटोरी। ‘ढोलकल’, ‘आरजे बस्तर’ और मुंदरा मांझी पर आधारित फिल्में भी कतार में हैं। सुरम्य प्रकृति और आदिवासी संस्कृति बस्तर को फिर फिल्मों का प्रिय ठिकाना बना रही है।

    छत्तीसगढ़ी फिल्मकार अमलेश नागेश कहते हैं, ‘मैं ऐसी फिल्म बनाना चाहता हूं, जो केवल मनोरंजन न दे बल्कि अबूझमाड़ की असल पहचान को दुनिया के सामने रखे। इसी वजह से मैंने दण्डा कोटुम की शूटिंग के लिए अबूझमाड़ को चुना।’ इसी का परिणाम है कि कभी माओवादी गतिविधियों का गढ़ माने जाने वाले मसपुर, गारपा और होरादी गांवों में कैमरे घूम रहे हैं, लाइटें जल रही हैं और स्थानीय लोग अभिनय कर रहे हैं।

    अमलेश की फिल्म यूनिट में करीब 150 सदस्य है, जिनमें से कई स्थानीय कलाकार और ग्रामीण युवा भी शामिल है। गांव की महिलाएं फिल्म क्रू के लिए भोजन बना रही हैं, बच्चे सेट पर कलाकारों के पीछे-पीछे दौड़ते हैं। वहीं, बस्तर की लोककथाओं के नायक मुंदरा मांझी पर बनी फिल्म तैयार है, जो अगले वर्ष मार्च-अप्रैल में रिलीज हो सकती है।

    बस्तर के सघन जंगल, सुरम्य घाटियां, कल-कल बहती नदियां, झरते झरने, पर्वतमालाएं और अद्भुत दृश्यावलियां—इन नैसर्गिक खजानों के साथ आदिवासी संस्कृति की अनूठी छटा फिल्मकारों को सदैव आकर्षित करती रही है। 82 वर्षीय सुभाष पांडे ‘कालाजल’ उपन्यास पर आधारित टीवी सीरियल में काम कर चुके है। इसे बस्तर के साहित्यकार स्व. गुलेशर अहमद शानी ने लिखा था।

    पांडे कहते हैं कि वे दिन भी क्या दिन थे, जब देवानंद, नाना पाटेकर, भारत भूषण, सुरेश ओबेराय, मोहन भंडारी जैसे दिग्गज कलाकार बस्तर आते थे। अब जब बस्तर माओवादी हिंसा के साए से बाहर निकल रहा है, तो फिल्मों की शूटिंग का पुराना सुनहरा दौर लौटता दिखाई दे रहा है।

    1957 में स्वीडिश फिल्म ‘द जंगल सागा’ की शूटिंग अबूझमाड़ में हुई थी, जिसके नायक गढ़बेंगाल का बालक चेंदरू मंडावी था। बाघ से दोस्ती पर आधारित इस फिल्म के बाद चेंदरू बस्तर के ‘मोंगली’ नाम से विश्वविख्यात हुआ था।

    नूतन, देवानंद और मिथुन भी आ चुके हैं बस्तर

    लगभग चार दशक पहले जब माओवाद का प्रभाव नहीं बढ़ा था, तब बस्तर में फिल्मों, धारावाहिकों और वृत्तचित्रों की नियमित शूटिंग होती थी। नवंबर 1980 में रिलीज हुई निर्देशक बिमल दत्त की फिल्म ‘कस्तूरी’ की शूटिंग 1977 में यहीं हुई थी। इस फिल्म में नूतन, मिथुन चक्रवर्ती, डॉ. श्रीराम लागू और परीक्षित साहनी जैसे दिग्गज कलाकारों ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई थीं।

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    बस्तर के फिल्म निर्माता-निर्देशक जीएस मनमोहन बताते हैं कि 10-12 दिन तक कलाकर जंगलों में अस्थायी शिविर में ठहरे थे। उन्होंने बताया कि शूटिंग के दौरान नूतन ने अपना अधिकांश समय बस्तर के घने जंगलों में बिताया और आसपास के क्षेत्रों का भ्रमण भी किया। जीएस मनमोहन ने हाल ही में हिंदी फिल्म मुंदरा मांझी की शूटिंग पूरी की है। उनकी यह फिल्म अगले वर्ष मार्च-अप्रैल में रिलीज होगी।

    माटी में दिखाई बस्तर की खूबसूरती

    हाल ही रिलीज माटी फिल्म के निर्माता संपत झा जगदलपुर के हैं और यह उनकी पहली फिल्म है। उन्होंने इसमें माओवादी हिंसा से जूझते बस्तर के दर्द, जंगलों की अनकही पीड़ा, प्रेम और शोषण को पर्दे पर उतारा है। कहानी भले ही काल्पनिक हो, लेकिन बस्तर के चार दशकों की रक्तरंजित वास्तविकता के काफी करीब है।

    फिल्म में बस्तर के सुंदर स्थलों के साथ जगरगुंडा जैसे माओवादी प्रभाव वाले अंदरूनी इलाकों में भी शूटिंग हुई, जो क्षेत्र में लौटती शांति से ही संभव हो पाया।

    देवमाली-अरकू से कमतर नहीं बस्तर

    पड़ोसी राज्य ओडिशा में बस्तर से करीब 80 किलोमीटर दूर कोरापुट क्षेत्र में विस्तारित पूर्वी घाट का देवमाली और आंध्र प्रदेश का अरकू अनंतगिरी घाट फिल्म शूटिंग के प्रमुख केंद्र बन चुके हैं। बुजुर्ग रंगकर्मी सुभाष पांडे कहते हैं कि देवमाली हो या अरकू वहां फिल्मांकन के लिए जो चीजें है, उससे कहीं अधिक स्थल बस्तर में हैं।

    बस्तर इन क्षेत्रों से किसी भी दृष्टि से कमतर नहीं है। बस्तर में दोबारा फिल्मों की शूटिंग का दौर तेज होता है तो यहां रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे और पर्यटन उद्योग में भी तेजी आएगी।

    अविनाश प्रसाद, युवा फिल्म निर्देशक एवं बस्तर के कलाकार का कहना है कि माओवादी हिंसा घटने और शांति लौटने से अब बॉलीवुड के फिल्मकार बस्तर में शूटिंग के लिए फिर आकर्षित हो रहे हैं। यह क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत है। जल्द ही बड़े पर्दे पर बस्तर की सुंदर तस्वीरें और ज्यादा दिखेंगी।