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    तीन-चार साल में सिंधु बेसिन पर हमारे पास इतने डैम होंगे कि पाकिस्तान को सबक सिखा सकेंगे: प्रदीप सक्सेना

    Updated: Sat, 30 Aug 2025 07:27 PM (IST)

    सिंधु जल संधि को निलंबित किए जाने के बाद भारत ने राबी नदी का पानी पाकिस्तान को छोड़ने से पहले सूचना दी क्योंकि बांध भरने से पानी छोड़ना मजबूरी थी। पूर्व सिंधु जल आयुक्त प्रदीप कुमार सक्सेना ने कहा कि पीएम मोदी की घोषणा के बाद सरकार इस संधि को रद्द करने के लिए तैयार है जिसके लिए छह साल से तैयारी चल रही थी।

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    सिंधु जल संधि भारत का सख्त रुख (फाइल फोटो)

    रुमनी घोष, जागरण। सिंधु जलसंधि निलंबित कर दिए जाने के बावजूद भारी बारिश के बाद राबी नदी का पानी छोड़ने से पहले भारत ने पाकिस्तान को सूचना दी। बांध भरने से पानी छोड़ना हमारी मजबूरी थी और पाकिस्तान के अवाम की चिंता करना मानवीय संवेदनाओं का तकाजा।

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    ऐसे में फिर यह शंका जन्म ले रही है कि एक दूसरे के हित-अहित से इस कदर जुड़े दो देशों के बीच की जलसंधि रद हो सकती है? यह शंका सिर्फ आम भारतीय ही नहीं बल्कि पिछले कई वर्षों में सिंधु जल संधि में आए उतार-चढ़ाव के गवाह रहे भारत के पूर्व सिंधु जल आयुक्त और वर्तमान में भारत सरकार के सलाहकार प्रदीप कुमार सक्सेना के मन में भी थी।

    वह टीम के साथ मिलकर छह साल से तैयारी कर रहे थे, लेकिन सरकार को रिपोर्ट सौंपने के बाद भी यकीन नहीं था कि सरकार इतने कठोर कदम उठा पाएगी। 15 अगस्त को लाल किले के प्राचीर से जब पीएम नरेन्द्र मोदी ने घोषणा की, तो वह खम ठोककर कहते हैं कि इतनी तैयारी है कि वियना कन्वेंशन के अनुच्छेद 62 के सहारे जब चाहे, तब इसे रद कर सकते हैं।

    यही नहीं, अगले तीन-चार साल में इस पर बनकर तैयार होने वाले बांधों के जरिए बिजली उत्पादन के साथ पानी का इतना भंडारण कर लेंगे कि, जरूरत पड़ने पर सामरिक उपयोग कर पाकिस्तान को सबक भी सिखा सकेंगे। मूलतः मप्र के निवासी प्रदीप कुमार सक्सेना ने जबलपुर से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की और केंद्रीय जल इंजीनियरिंग सेवा में आ गए।

    यहां कार्यरत रहते हुए वह सिंधु जलसंधि समझौते से जुड़े और छह साल तक आयुक्त रहे। प्रतिष्ठित केन-बेतवा लिंक परियोजना में भी सलाहकार हैं। दैनिक जागरण की समाचार संपादक रुमनी घोष ने उनसे विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंशः

    आप 17 साल से सिंधु जल संधि परियोजना से जुड़े हुए हैं। दुनिया में प्रमुख 50 जलसंधियों में से इस संधि को आप किस क्रम में रखते हैं?

    मैं इस संधि को दुनिया में सबसे कठिन और सबसे जटिल मानता हूं। सभी जल संधियों में पानी का बंटवारा होता है, लेकिन इसमें नदियों का बंटवारा हुआ है। ऐसा आज तक कभी किसी संधि में नहीं हुआ।

    यह एकमात्र संधि है, जहां ऊपरी देश (अपर राइपेरियन यानी जहां से पानी का उद्गम स्थल) को सिर्फ अठारह प्रतिशत पानी मिला है और उसके लिए भी उसे दूसरे देश (पाकिस्तान) को 1960 में 62 मिलियन पाउंड (वर्तमान में 73.61 अरब) का मुआवजा देना पड़ा। साथ ही ऊपरी देश को अपने सिंचाई क्षेत्र तथा बांधों के डिजाइन तथा उपयोग पर कई बंधनों को भी स्वीकार करना पड़ा। यह ऐसी संधि है, जिसके रिव्यू का भी कोई प्रावधान नहीं है और चिरस्थायी है।

    जब-जब भारत-पाक के बीच तनाव बढ़ता है, संधि तोड़ने की बात होती है। कैसे मानें कि पिछली बार की तरह कोरी धमकी नहीं है, सरकार इस बार गंभीर है?

    जब देश के माननीय प्रधानमंत्री लाल किले के प्राचीर से इसका एलान करते हैं तो उसे कोरी धमकी नहीं माना जा सकता। आने वाले समय की प्लानिंग चल रही है, जो धीरे-धीरे जनता के समक्ष आएगी। सच कहूं तो मैंने जिंदगी में नहीं सोचा था कि हम कभी यह कठोर कदम उठा पाएंगे, लेकिन मुझे खुशी है कि सरकार ने यह करके दिखाया।

    भारत सरकार ने पहली बार कब गंभीरता के साथ इस संधि को रद करने के बारे में विचार किया?

    पाकिस्तान द्वारा भारत के तमाम प्रोजेक्ट पर रुकावट डालने के बावजूद भी 55 साल तक तीन-तीन युद्ध , 2002 में संसद पर हमले तथा मुंबई हमलों को झेलने के बाद भी सबकुछ ठीकठाक ही चलता रहा। मेरी याददाश्त के अनुसार 18 सितंबर 2016 को हुए उड़ी हमले के बाद पहली बार सरकार ने इस पर गंभीरता से विचार करना शुरू किया था।

    फिर 2019 में पुलवामा में जब सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकी हमला हुआ तो एक बार फिर इसे रद करने की बात उठी। संभवत: अंतरराष्ट्रीय छवि, मानवीय पहलुओं सहित कई मुद्दों को ध्यान रखते हुए सरकार ने तत्काल कोई कदम नहीं उठाया, लेकिन इस परिस्थिति के लिए तैयारी शुरू कर दी। केंद्रीय जल आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई, जिसमें संधि के रद होने या रिव्यू करने की परिस्थिति में लिए जा सकने वाले कदमों पर विचार किया गया।

    हमने विचार किया कि यदि हम संधि रद करते हैं तो हमें कितना नुकसान होगा? प्रतिबंध हटने से भारत को कितना फायदा होगा? अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किन कानूनी दांव-पेच का सामना पड़ेगा? संधि रद करने के बाद भारत क्या-क्या कर सकेगा? इसके बाद कमेटी द्वारा लगभग डेढ़ साल तक अध्ययन कर रिपोर्ट तैयार की गई। वर्ष 2022-23 में हमने सरकार को रिपोर्ट सौंपी।

    इस बीच हमने पाकिस्तान को संधि के रिव्यू पर बातचीत का आमंत्रण भी दिया पर पाकिस्तान इस पर ना-नुकुर करता रहा। सच कहूं तो तब भी मुझे पूरी तरह यकीन नहीं था कि यह अमल में लाया जाएगा। मुझे प्रसन्नता है कि यह वास्तव में होने जा रहा है।

    क्या यह संधि कोई एक पक्ष रद कर सकता है, खास तौर पर जब थर्ड पार्टी शामिल हो?

    यह बिल्कुल सही है कि यह संधि में उसे एकतरफा खत्म करने का कोई प्रविधान है ही नहीं। यहां तक कि इसमें एकतरफा रिव्यू का भी कोई प्रविधान नहीं है। जहां तक तृतीय पक्ष की बात है तो मैं यहां स्पष्ट करना चाहता हूं कि यह संधि पूरी तरह से द्विपक्षीय (भारत-पाकिस्तान के बीच) है।

    बावजूद इसके पाकिस्तान तथा पश्चिमी देश वर्ल्ड बैंक का नाम लेकर लगातार गलत नैरेटिव फैला रहे हैं। सच्चाई यह है कि वर्ष 1970 के बाद संधि में कोई तृतीय पक्ष यानी, विश्व बैंक की कोई सीधी भूमिका नहीं है। विश्व बैंक की भूमिका न्यूट्रल एक्सपर्ट रखने या कोर्ट बनाने तक ही सीमित है, वह भी संधि में दिए गए नियमों के मुताबिक। आपने देखा होगा, स्थिति को देखते हुए इस मसले से विश्व बैंक ने खुद को अलग भी कर लिया है।

    फिर यह संधि कैसे रद होगी? क्या भारत द्वारा उठाए गए कदम को अंतरराष्ट्रीय कोर्ट मान्यता देगी?

    विएना कन्वेशन आन ला आफ ट्रीटीज के आर्टिकल 62 के तहत यह रद की जा सकती है। अभी तो संधि निलंबित है, लेकिन जब भी रद होगी तो हम इसी आर्टिकल का सहारा लेंगे। यह आर्टिकल कहता है कि कोई भी संधि जिस माहौल और मंतव्य से हुई है, यदि वह बदल जाता है तो आपको संधि रद करने का अधिकार है। सिंधु जल संधि की प्रस्तावना में ही लिखा गया है कि दोनों देश सौहार्द, मित्रता और भाईचारे के माहौल में इस पर हस्ताक्षर कर रहे हैं। अब न तो सौहार्द रहा और न ही भाईचारा। हम उड़ी देख रहे हैं, पुलवामा देख रहे हैं... हम पहलगाम देख रहे हैं।

    क्या पाकिस्तान इतनी आसानी से मान लेगा?

    यकीकन नहीं। अपने मित्र देशों के माध्यम से पाकिस्तान वैश्विक स्तर पर भारत को गलत ठहराने की कोशिश करेगा। अंतरराष्ट्रीय कोर्ट तक भी जा सकता है, लेकिन अब हम लोगों ने उन सभी पहलुओं को चिह्नित कर तैयारी कर ली है। यानी मोटे तौर पर हमें पता है कि पाकिस्तान क्या-क्या कदम उठा सकता है।

    और हमें क्या करना है। इस प्रक्रिया के शुरुआती दौर में अभी के विदेश मंत्री एस. जयशंकर तत्कालीन विदेश सचिव थे और वह पूरी प्रक्रिया से जुड़े हुए थे। उनके नेतृत्व में पाकिस्तान द्वारा बनाए जाने वाले नैरेटिव से निपटने में विदेश मंत्रालय सक्षम है। बैक चैनल सभी देशों को वास्तविक स्थिति के बारे में बताया जा रहा है।

    आप कह रहे हैं छह साल से तैयारी चल रही है...आज 2025 है। पानी का प्रवाह तो फिर भी जारी है। कैसे?

    देखिए, संधि वर्तमान में निलंबित है। अभी रद नहीं हुई है। प्रक्रिया जारी है । संधि रद होने का मतलब भारत की ओर से पानी रोकना और पाकिस्तान में हाहाकार मचा देना नहीं है। तकनीकी रूप से ऐसा संभव भी नहीं है। पानी रोकने के साथ उसे अपने देश की सीमा में उपयोग करना भी आवश्यक है तभी उसका महत्व है। तो हमें रोकने के साथ अपने देश में उस पानी का उपयोग बढ़ाना भी होगा।

    उसमें चेनाब और झेलम के पानी को दूसरे क्षेत्रों में मोड़ना भी शामिल है, जो अभी तक प्रबंधित था। इसके अलावा संधि के तहत हमारे यहां बांधों के डिजाइन और आपरेशन्स के ऊपर बहुत प्रतिबंध लगे हुए थे। यह सारे प्रतिबंध पाकिस्तान को फायदा पहुंचाने वाले थे। जैसे, एक प्रतिबंध यह था कि जो भी पानी आएगा, उसे एक हफ्ते के भीतर पाकिस्तान की ओर छोड़ना पड़ेगा। इसकी वजह से हम पानी स्टोर नहीं कर पाते थे।

    अगस्त माह के अलावा सामान्य दिनों में जलाशय में स्टोर किए हुए पानी को खाली भी नहीं कर सकते थे, ताकि पाकिस्तान को पानी कम न पड़े। बांध को फ्लश करना पूरे विश्व में प्रचलित है पर हम इसे नहीं कर सकते थे, जिससे हमारे बांधों का जीवन कम होता था। संधि रद होने के बाद जब हमारे ऊपर प्रतिबंध नहीं होगा, तो ढेरों डैम बनाकर पानी स्टोर कर सकते हैं। देश के विकास के साथ-साथ हम इसका सामरिक उपयोग भी कर सकेंगे।

    वास्तविक रूप से पानी रोकना यह है। इसमें और भी बहुत-सी चीजें होती हैं। भारत में यदि बाढ़ आती है तो 16 से 18 घंटे के भीतर पाकिस्तान पहुंच जाता है। संधि के तहत हम लोग पाकिस्तान के साथ पानी छोड़ने-बाढ़ की स्थिति आदि डाटा साझा करते थे, वह हमने देना बंद कर दिया। दोनों देशों के बीच इंजीनियर्स का आना-जाना बंद कर दिया है। सालाना मीटिंग तो 2022 से बंद है। इसके अलावा भारत ने कोर्ट का आदेश मानने से भी इंकार कर दिया है। यह भारत की बढ़ती ताकत का सबूत है।

    भारत ने पाकिस्तान के अवाम की चिंता कर मानवीय आधार पर पाकिस्तान को राबी नदी का पानी छोड़ने की सूचना दी। शुक्रिया अदा करने के बजाय पाकिस्तान दोषारोपण क्यों कर रहा है?

    संधि निलंबित होने के बाद तो हम किसी भी तरह की सूचना देने के लिए बाध्य नहीं हैं। हमने बांधों के जलस्तर का डाटा शेयरिंग बंद भी कर दिया था, लेकिन उसके बाद भी जब बाढ़ की स्थिति बनी तो भारत ने पाकिस्तान को अलर्ट किया। यह सारी चीजें दुनिया देख रही हैं कि मानवीय पहलुओं को लेकर हम कितने संवेदनशील हैं, लेकिन पाकिस्तान की 'हिप्पोक्रेसी' देखिए, कि वह इस बात को लेकर हल्ला मचा रहा है कि हमने पानी छोड़ने की सूचना सिंधु जल आयोग के बजाय उच्चायुक्त के जरिए क्यों भेजी?

    पाकिस्तान में आई बाढ़ के लिए रावी नदी के जल प्रवाह से ज्यादा वहां की सरकार जिम्मेदार है। जब मैं पाकिस्तान के दौरे पर गया था, तो मैंने देखा कि नदी के बहाव क्षेत्र में कॉलोनी बनाने की अनुमति दी गई। बिजली की लाइनें डाली गई। मैंने खुद कई बार उन्हें इसके लिए आगाह किया कि वह बहाव क्षेत्र में किसी को बसने नहीं दें। फ्लड प्लेन जोनिंग हर देश लागू करता है पर वहां की सरकार के सामने इसका खुला उल्लंघन होता है।

    हमारा डैम भरेगा तो हमें पानी छोड़ना ही पड़ेगा और वहां की सरकार की लापरवाही की वजह से हर बार यही स्थिति बनेगी पर अपनी नाकामी की वजह से बनी स्थिति का जिम्मेदार भारत को ठहराने का काम पाकिस्तान वर्षों से करता आ रहा है।

    बतौर आयुक्त आपने पाकिस्तान व विश्व बैंक के साथ हुई बैठकों में प्रतिनिधित्व किया। आपके क्या अनुभव रहे? किन परेशानियों का सामना करना पड़ा?

    व्यक्तिगत तौर पर भारत-पाकिस्तान के प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों के बीच कोई मनमुटाव नहीं रहता था। सामान्य स्थिति में हमारे बीच मैत्रीपूर्ण बातचीत होती थी, लेकिन जब समझौते के लिए टेबल पर बैठते थे तो अपने-अपने एजेंडे के साथ आते थे।

    पाकिस्तान के साथ बातचीत में सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि पाकिस्तान के प्रतिनिधि मंडल के सदस्यों के पास कभी कोई स्पष्ट मैंडेट या दिशा-निर्देश नहीं होता था। पल-पल बदलती सरकारों में उन्हें पता नहीं होता था कि क्या करना है, क्या कदम उठाना है। कई मामलों में वह पलट जाते थे। जैसे, जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले के पाकल दुल विद्युत परियोजना को लेकर हमने समझौता किया। दो साल बाद पाकिस्तान ने इस समझौते को मानने से इन्कार कर दिया।

    इसके विपरीत एक चुनी हुई स्थायी सरकार का प्रतिनिधि होने की वजह से मुझे हमेशा यह स्पष्ट रहता था कि हमारे देश की प्राथमिकताएं क्या हैं और मैं किन मुद्दों पर कितना लचीला रूख अपना सकता हूं, पर पाकिस्तान से बातचीत में मुझे यह पता नहीं होता था कि उनके साथ किन चीजों पर समझौता किया जा सकता था। दूसरी चुनौती थी कि उनका मकसद सिर्फ रोड़े अटकाना था।

    वह चाहते थे कि कोई भी प्रोजेक्ट पूरा न हो या फिर कहीं न कहीं अटका रहे। अगर उन्होंने भारत की राह में रोड़े अटकाने की बजाय अपनी तरक्की पर ध्यान दिया होता तो आज उनका देश पानी की कमी की गंभीर समस्या से नहीं जूझ रहा होता।

    क्या पहले कभी सिंधु के पानी को रोका गया था?

    जी हां, 1948 में 14 दिन के लिए भारत के पंजाब राज्य ने दो नहरों का पानी रोका था, लेकिन यह सिंधु समझौते से पहले की घटना है। दरअसल, सिंधु नदी पर डैम और नहरें अंग्रेज इंजीनियर्स ने बनाई थीं। उनकी कल्पना में भी यह नहीं था कि इसका बंटवारा करना पड़ेगा। जब भारत-पाक बंटवारा हुआ तो सिंधु की नहरें पाकिस्तान में चली गईं पर उनका कंट्रोल सिस्टम भारत के हिस्से आ गया। बंटवारे के समय दोनों पंजाब सरकारों के बीच 31 मार्च 1948 तक यथास्थिति बनाए रखने पर अनुबंध हुआ।

    1 अप्रैल 1948 को यह समझौता खत्म हो गया तो भारत के हिस्से वाली पंजाब सरकार ने दो नहरों का पानी रोक दिया। इस मामले में हम कानूनी रूप से बिल्कुल सही थे, क्योंकि अनुबंध खत्म हो चुका था। यहीं से विवाद की शुरुआत हुई। मामले का अंतरराष्ट्रीयकरण होने लगा। चार साल की लड़ाई के बाद 1952 में तीसरी पार्टी के तौर पर विश्व बैंक का दखल हुआ।

    आठ साल तक बातचीत के बाद 1960 में सिंधु जल संधि समझौता हुआ, जिसके तहत तीन पूर्वी नदियां, रावी, ब्यास और सतलुज के पानी (लगभग 18%) पर भारत का अधिकार रहा और पश्चिमी नदियां, झेलम, चेनाब तथा सिंधु के पानी (लगभग 82 प्रतिशत पर) पाकिस्तान का। पर पश्चिमी नदियों पर भारत को हाइड्रो पावर का उत्पादन, बांध बनाना तथा कृषि तथा पीने के पानी के उपयोग के लिए अनेक सीमित अधिकार कई प्रतिबंध के साथ दिए गए।

    क्या 1960 के बाद कभी पानी रोका गया? संधि रद करने का विचार किया गया?

    नहीं, 1960 से लेकर अब तक कभी भी पाकिस्तान को पानी का प्रवाह नहीं रोका गया। मैं बहुत गर्व से कह सकता हूं कि न हमने कभी पानी रोका और न ही रोकने की कोशिश की। एक जिम्मेदार देश होने के नाते हमारा दृष्टिकोण हमेशा ही यह रहा कि पानी पर हुए समझौते को लेकर हमारी ओर से कोई व्यवधान न हो। भारत-पाक के बीच 1965, 1971, 1999 में युद्ध हुआ, 2002 में संसद पर हमला हुआ, लेकिन तब भी पानी का प्रवाह नहीं रुका।

    कोरोना काल में भी जब हम लोग दफ्तर नहीं जा पाते थे, उस समय भी हम लोगों ने इस बात का ध्यान रखा कि उन्हें समझौते के मुताबिक सारी सूचनाएं मिलती रहें। जब दो देशों के बीच पानी पर कोई समझौता होता है, उसकी सफलता का श्रेय उस देश पर होता है, जो अपर राइपेरियन है, यानी जिस देश से पानी का प्रवाह होता है। यहां पानी का स्रोत भारत से निकलकर पाकिस्तान में बहता है।

    हमने अब तक हर मौके पर अपना दायित्व निभाया। पानी को कभी हथियार बनाकर इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन एक समय बाद हमें यह लगने लगा कि इस संधि को पाकिस्तान द्वारा राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा है, जिसका असर भारतीय कश्मीर के विकास पर पड़ रहा है। इसके बाद इस समझौते को रद करने की बात पर विचार शुरू हुआ।

    पहली बार आपको कब महसूस हुआ कि संधि का उपयोग 'पालिटिकल टूल' की तरह हो रहा है। जल संधि की शर्तें भारत के हित में नहीं हैं? क्या इस संबंध में कोई फाइल चली?

    पहली बार कब महसूस किया गया, यह तो मैं नहीं बता सकता, क्योंकि तब मैं इस विभाग या पद पर नहीं था। मैं ज्यादा नहीं बोलूंगा, क्योंकि वह राजनीतिक बयान जैसा लगेगा, लेकिन नवंबर 1960 में जब संसद में इस संधि पर लोकसभा में बहस हुई थी तब ही सत्ता पक्ष के लोगों ने भी इसका कड़ा विरोध किया था तो यह बात तो प्रारंभ से ही मानी जाती रही कि यह संधि हमारे हित में नहीं है।

    बतौर आयुक्त जब मैंने संधि को बारीकी से समझा तो महसूस हुआ कि वर्ष 1960 में हुए समझौते के तहत भारत को जितने अधिकार दिए गए, उसका भी ठीक से दोहन नहीं किया गया। उदाहरण के तौर पर हम सिंधु नदी पर हमें असीमित हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट लगाने का अधिकार है और हम 20 हजार मेगावाट तक बिजली का उत्पादन कर सकते हैं।

    जब मैं 2013 में जब सिंधु जल संधि से सीधे रूप से जुड़ा, तब तक हम सिर्फ 3000 मेगावाट बिजली का ही उत्पादन कर रहे थे, यानी 55 साल में हम अपने अधिकार का सिर्फ छठा हिस्सा ही उपयोग कर पाए। हमें लगभग 13.43 लाख एकड़ क्षेत्र सिंचित करने की अनुमति है, लेकिन वर्ष 1980 से हम लगभग 8 लाख एकड़ पर ही अटके हुए हैं। इसे बढ़ाने की कोई गंभीर कोशिश नहीं हुई। हम पश्चिमी नदियों ( झेलम, चेनाब तथा सिंधु पर) लगभग 3.6 मिलियन एकड़ फीट तक क्षमता तक के बांध बना सकते हैं, जो हम आधे भाखड़ा के बराबर डैम बना सकते थे, लेकिन हम अभी तक कोई स्टोरेज नहीं बना पाए ।

    जब भारत ने 1978 में 690 मेगावाट का सलाल प्रोजेक्ट बनाया, तो पाकिस्तान ने बहुत अड़चनें डालीं। अंतरराष्ट्रीय छवि खराब होने का भय और संभवत: आत्मविश्वास की थोड़ी कमी के कारण डिजाइन में बहुत बदलाव करना पड़ा, जिसका खामियाजा आज भी भारत भुगत रहा है, क्योंकि डिजाइन में बदलाव के कारण यह प्रोजेक्ट क्षमतानुरूप नहीं चल पा रहा है। 1987 में तुलबुल प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया। पाकिस्तान ने इस पर एतराज जताया।

    भारत की बातचीत की पेशकश पर उनकी पहली शर्त थी कि इस प्रोजेक्ट को पहले सस्पेंड किया जाए। हमने मैत्री भाव में इसे कुछ समय के लिए सस्पेंड कर दिया। पहले तीन महीने... फिर छह महीने... और आज भी 38 साल से यह प्रोजेक्ट सस्पेंड पड़ा हुआ है। मुझे लगता है कि इन दो प्रोजेक्ट्स के अनुभवों से भारतीय अधिकारियों को लगने लगा होगा कि पाकिस्तान इसे हथियार के रूप में उपयोग कर हमारे कश्मीर की प्रगति को रोकना चाहता है।

    यहां पदस्थापना के बाद मैंने जो अपनी आंखों से देखा, वह है बगलिहार प्रोजेक्ट। हमने बगलिहार प्रोजेक्ट (900 मेगावाट) डिजाइन किया, लेकिन पाकिस्तान ने इस पर भी एतराज किया। यह पहली बार था जब हम थर्ड पार्टी (न्यूट्रल एक्सपर्ट) के पास गए और इसमें 2005 में हमें जीत मिली। उसके बाद किशनगंगा (330 मेगावाट ) आया, इसमें भी पाकिस्तान ने खूब अड़चनें लगाईं और 2010 में मामला कोर्ट में चला गया।

    2013 में हमें जीत मिली। समझौते के तहत डिजाइन या इंजीनियरिंग से जुड़ा हुआ तकनीकी मामला न्यूट्रल एक्सपर्ट के पास जाता है और कानूनी मामला है तो मामल कोर्ट में जाता है। कोर्ट के फैसले के बाद कुछ मुद्दों को लेकर पाकिस्तान फिर कोर्ट में चला गया, जिसका फैसला भारत ने मानने से इंकार कर दिया। 2022 में भारत ने संधि में बदलाव पर बातचीत का प्रस्ताव रखा पर पाकिस्तान टालमटोल करता रहा। दरअसल, यह सब चीजें एक दिन में नहीं होती हैं।

    सलाल से तुलबुल के रास्ते बगलिहार या किशनगंगा तक पहुंचते-पहुंचते हम समझ चुके थे कि पाकिस्तान यह नहीं चाहता था कि भारत खास तौर पर जम्मू-कश्मीर में विकास हो। फिर उड़ी की घटना हुई। ...वर्ष 2016 तक आते-आते हमारा (भारत सरकार का) मन बन गया था यह समझौता हमारे लिए ठीक नहीं है। पहलगाम की घटना ने इस पर मुहर लगा दी।

    आखिर उस समय क्या मजबूरी थी कि इस तरह की शर्तें लगाई गई थीं? क्या कोई दबाव था?

    मुझे लगता है कि दोनों देश आजाद हुए थे। दोनों देश वर्ल्ड बैंक पर निर्भर थे। हम विकास के लिए वर्ल्ड बैंक पर निर्भर थे। इसका फायदा उठाते हुए वह हमारे ऊपर शर्तें थोपते गए। कहीं न कहीं हमारे दिमाग में यह था कि हम एक जिम्मेदार देश हैं और हम समझौते करते गए।

    हमने सिर्फ 18 प्रतिशत पानी लेना स्वीकार किया, जबकि 69 प्रतिशत पानी भारत से ही आता है। इतना पानी (82 प्रतिशत) देने के बाद भी भारत ने पाकिस्तान को 62 मिलियन पाउंड मुआवजा दिया था, जो आज कई हजार करोड़ के बराबर है। अपने बांधों की डिजाइन संचालन पर कड़े प्रतिबंध स्वीकार किए। हमने यह स्वीकार किया कि हम पानी को किसी और क्षेत्र में नहीं मोड़ेंगे।

    यही नहीं, 1948 में संधि से पहले भारत की ओर से जब पंजाब सरकार ने 14 दिन के लिए पानी रोका था, उसके लिए लिखित अफसोस जताया था, जबकि तब तो संधि भी नहीं हुई थी और हम कानूनी रूप से सही थे। इस संधि के बाद तात्कालिक प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का बयान था कि- वी हैव बाट पीस, यानी इस संधि के माध्यम से हमने शांति खरीदी है। इतिहास गवाह है की हमारा यह सोचना कितना गलत था।

    संधि रद होने के बाद हम कितने डैम बना सकते हैं? कितना पानी स्टोर होगा? इसके जरिए पाकिस्तान को कैसे सबक सिखाएंगे?

    पश्चिमी नदियां बड़े पैमाने पर घाटियों में बहती हैं और उन पर भाखड़ा जैसे बड़े बांध बनाने की संभावना मौजूद नहीं है, लेकिन यह समझने की कोशिश करें कि स्टोरेज की मात्रा से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इसे कैसे संचालित किया जाता है और उसका समय क्या है। जब पानी की उपलब्धता कम होती है तो यही स्टोरेज दो से तीन सप्ताह तक नीचे पानी की कमी ला सकती है।

    विशेष रूप से फसलों की बुवाई के समय कुछ हफ्तों की छोटी अवधि के लिए भी रोक से निचले देश को भारी नुकसान होता है। यही कारण है कि संधि में पूरे वर्ष जलाशय को खाली करने और भरने का प्रावधान नहीं था। यह कार्य केवल अगस्त में, जब पानी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है, तब ही किया जा सकता था, लेकिन अब वह प्रतिबंध हट गया है और हम किसी भी समय अपने जलाशयों को खाली और भर सकते हैं, जिससे इनकी मारक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।

    हमने पहलगाम की घटना के बाद यह प्रदर्शित किया है। बस अब हमें पानी स्टोर करके अधिक सामरिक महत्व जोड़ने के लिए कई बांधों की आवश्यकता है, जिसको 2016 से गति मिली है। पाकिस्तान के एतराज के और कोर्ट के फैसले के बाद भी किशनगंगा (330 मेगावाट) बन चुका है। पाकल दुल (1000 मेगावाट) अगले साल बन जाएगा। किरू (624 मेगावाट) और रथले प्रोजेक्ट (850 मेगावाट) अगले दो वर्ष में ही तैयार हो जाएंगे।

    क्वार (540 मेगावाट), दुगर (500 मेगावाट) पर कार्य चल रहा है। किरथई-1 (390 मेगावाट), किरथई-2 (930 मेगावाट) हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स पर स्वीकृत हैं और कुछ दिन पहले सावलकोट हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट (1856 मेगावाट) को मंजूरी मिल गई है, जो देश का सबसे बड़ा हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट होगा। इन प्रोजेक्ट को समय से पूरा करने के लिए लगातार उच्च स्तर पर मानिटरिंग की जा रही है।

    कुल मिलाकर आने वाले तीन-चार साल में इतने डैम हो जाएंगे कि हम पानी स्टोर करेंगे, बिजली का उत्पादन कर सकेंगे और जरूरत पड़ने पर पाकिस्तान को ठीक से सबक सिखा पाएंगे। सोचिए, जब जम्मू-कश्मीर में इतनी मात्रा में बिजली बनेगी तो शर्तों के मुताबिक उन्हें 12 प्रतिशत से ज्यादा फ्री सब्सिडी मिलेगी। बाकी बिजली नार्दन ग्रिड के जरिए पूरे देश को उपलब्ध हो सकेगी।

    वूलर झील पर डैम बनाने का मामला क्या है?

    वूलर, झेलम पर स्थित प्राकृतिक झील है और इसका पानी बहुत तेजी से पाकिस्तान पहुंचता है। संधि के मुताबिक वूलर पर कोई स्टोरेज, यानी नहीं बना सकते थे। तुलबुल परियोजना के अनिश्चितकालीन सस्पेंशन ने दशकों तक लाभ नहीं पहुचने दिए हैं। संधि के स्थगित होने के कारण, भारत अब पश्चिमी नदियों पर अपने कार्यों पर संधि द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों से बाध्य नहीं है।

    अब हम तुलबुल प्रोजेक्ट (जो 38 साल से सस्पेंड है) पर काम शुरू करते हैं, तो पाकिस्तान को बहुत ज्यादा नुकसान हो सकता है। इस पर चर्चा चल रही है। इस पर कार्य चार कार्य सत्रों में पूरा किया जा सकता है। यह परियोजना झेलम जलमार्ग पर नौवहन में मदद करेगी और पर्यटन को बढ़ावा देगी। यह सोपोर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के लिए बाढ़ प्रबंधन में भी सुधार करेगी और 1921 लाख यूनिट्स तक बिजली उत्पादन बढ़ाने में मदद करेगी।

    भारत के पास 0.324 मिलियन एकर फीट जल पर नियंत्रण होगा, जो किशनगंगा के भंडारण से 20 गुना और पाकल दुल से तीन गुना अधिक है। इस परियोजना से पाकिस्तान की ट्रिपल कैनाल परियोजना पर भी असर पड़ेगा।

    पाकिस्तान से सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने डैम पर मिसाइल छोड़ने की बात कही? क्या आपको लगता है कि डैम की सुरक्षा बड़ा मुद्दा होगा? सुरक्षा इंतजाम क्या हैं?

    यह इतना बचकाना बयान है कि भारत की ओर से किसी ने जवाब भी देना उचित नहीं समझा। क्यों... इसे तथ्यात्मक रूप से इस तरह से समझिए। कानूनी पहलू की बात करें तो 1977 के जिनेवा कन्वेंशन (एपीआइ-1977) के अतिरिक्त प्रोटोकाल का अनुच्छेद 56 के तहत दोनों देशों के बीच युद्ध के दौरान कोई भी देश सार्वजनिक संपत्तियों को क्षति नहीं पहुंचा सकता है।

    ये भी याद रखें कि भारत के पास 6138 बड़े डैम हैं और 143 निर्माणाधीन हैं। इसके विपरीत पाकिस्तान के पास सिर्फ तीन बड़े डैम तारबेला, मंगला और वार्शक और 164 छोटे डैम हैं। इन तीन बांध पर पाकिस्तान की 80 प्रतिशत आबादी निर्भर है। सेना प्रमुख होने के नाते आसिम मुनीर को बयान देने से पहले कम से कम यह सोचना चाहिए था कि यदि वह दस मिसाइल दागेंगे, तो जवाबी कार्रवाई में भारत को सिर्फ तीन मिसाइल ही दागनी हैं।

    पाकिस्तान का सारा सिस्टम ध्वस्त हो जाएगा। हां. पाकिस्तान है, तो आतंकी हमलों की बात उठ सकती है, तो इसके लिए हमारी सुरक्षा एजेंसियों की कड़ी निगरानी है। भारत के सारे डैमों की सुरक्षा सीआइएसएफ के हाथों में होती है।

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