ओवरस्पीडिंग या अधिकारियों की लापरवाही? सड़क हादसों पर केंद्र सरकार की रिपोर्ट खुद सवालों के घेरे में
सड़क दुर्घटनाओं पर 2023 की रिपोर्ट में पिछले साल के मुकाबले 4.2% की वृद्धि हुई है। हादसों का मुख्य कारण तेज गति को माना गया है। रिपोर्ट में सीधी सड़कों पर अधिक दुर्घटनाएं होना बताया गया है जिनमें मौसम की भूमिका भी शामिल है। विशेषज्ञ इन आंकड़ों पर सवाल उठाते हैं।

जितेंद्र शर्मा, नई दिल्ली। देश में हो रही सड़क दुर्घटनाओं पर वर्ष 2023 की नई रिपोर्ट आ गई, लेकिन हाल वही पुराना। बीते वर्ष की तुलना में 4.2 प्रतिशत हादसे बढ़ गए, इनमें जान गंवाने वालों की संख्या भी बढ़ गई और फिर अधिकतर हादसों (68.4 प्रतिशत) का ठीकरा वाहनों की तेज गति (ओवरस्पीडिंग) पर फोड़ दिया।
एक बार फिर रिपोर्ट में 'सरकारी चिंता' भी नत्थी है कि 'कुछ करना होगा।' मगर, यह देख-सुनकर अब सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ भी नाक-भौं सिकोड़ रहे हैं, क्योंकि वह मानते हैं कि जिस तरह के प्रयास सड़क सुरक्षा के लिए होने चाहिए, वह हुए ही नहीं। यह आरोप इसलिए भी निराधार नहीं माने जा सकते, क्योंकि केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी स्वयं अक्सर उलाहना देते हैं कि विभाग के अफसर अकर्मण्य हैं, लेकिन प्रश्न है कि कार्रवाई क्या होती है?
सीधी सड़कों पर हुए ज्यादातर हादसे
लिहाजा, रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि हादसों की रफ्तार इसलिए बढ़ रही है, क्योंकि अफसर बेसुध हैं और सरकार शायद लाचार। मंत्रालय द्वारा जारी वर्ष 2023 की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस वर्ष में 68.4 प्रतिशत सड़क हादसे वाहनों की तेज गति के कारण हुए हैं। सड़क का वातावरण और वाहनों की स्थिति 22.5 प्रतिशत दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार है, जबकि गलत दिशा में वाहन चलाने के कारण 5.3 प्रतिशत हादसे हुए हैं।
नशे, सिग्नल जंप करने और वाहन चलाते समय फोन चलाने के कारण होने वाले एक्सीडेंट की कुल मात्रा सिर्फ 3.9 प्रतिशत है। इसी तरह के आंकड़े सड़कों की स्थिति को लेकर दर्शायी गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, सीधी सड़कों पर कुल 67.0 प्रतिशत, जबकि घुमावदार सड़कों पर मात्र 12.2 प्रतिशत दुर्घटनाएं हुई हैं। सीधी सड़कों पर जो हादसे हुए हैं, उनमें भी 76.1 प्रतिशत दुर्घटनाएं तब हुई हैं, जब मौसम पूरी तरह साफ था। बरसात में 7.8 तो कोहरा मात्र 7.1 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार है।
ओवरस्पीडिंग पर फोड़ा सारा ठीकरा
मंत्रालय ने यह सारे आंकड़े पुलिस के माध्यम से जुटाए हैं, लेकिन विशेषज्ञ इन पर विश्वास नहीं करते। इंटरनेशनल रोड कांग्रेस इंडिया चैप्टर के सलाहकार प्रो. पीके सिकदर का कहना है कि तमाम खामियों को छिपाते हुए हमेशा ओवरस्पीडिंग पर ठीकरा फोड़ दिया जाता है। कैसे मान लिया जाए कि पुलिस ने तेज गति को जो कारण बताया है, वही सही ही है। बड़ा हादसा होने पर भी अफसर दो-तीन दिन बाद जांच के लिए जाते हैं, जबकि हादसे की मूल वजह तुरंत जांच पर ही मालूम हो सकती है।
सवाल यह भी है कि जब सारे हाईवे पर सीसीटीवी कैमरे ही नहीं लगे तो कैसे पता कर लिया कि ओवरस्पीडिंग थी। प्रो. सिकदर का सवाल इसलिए भी सटीक है, क्योंकि सरकार ने खुद आंकड़ा दिया है कि अभी तक सिर्फ 20 हजार किलोमीटर हाईवे नेटवर्क पर ही एडवांस ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम शुरू किया जा सका है, जबकि नेशनल हाईवे और स्टेट हाईवे का कुल नेटवर्क लगभग 3.25 लाख किलोमीटर का है।
इसी तरह भारत सरकार की सड़क सुरक्षा सलाहकार समिति के सदस्य डॉ. कमल सोई कहते हैं कि यदि ओवरस्पीडिंग से हादसे हो रहे हैं तो मंत्रालय बताए कि इसे रोकने के उपाय क्या किए? पश्चिमी देशों में तो स्पीड राडार लगाए गए हैं। यहां व्यावसायिक वाहनों में भी स्पीड गर्वनर लगाने की योजना धूल फांक रही है। यह इंटेलीजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम है, जो कि वाहन के फ्यूल सप्लाई सिस्टम से जोड़ा जाता है, जो कि गति बढ़ाने के लिए अतिरिक्त ईंधन ही नहीं जाने देता। डॉ. सोई वाहनों की फिटनेस में घालमेल और खराब रोड इंजीनियरिंग को भी जिम्मेदार मानते हैं।
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