प्रो. सतीश कुमार। दशहरा का त्योहार मूलत: भारतीय संस्कृति में बुराई पर अच्छाई, असत्य पर सत्य की जीत के रूप में मनाया जाता है। इस पावन दिवस के अवसर पर हर वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख आरएसएस मुख्यालय से देश की जनता को संबोधित भी करते हैं। इस बार भी महामारी के बीच शारीरिक दूरी के साथ संघ प्रमुख मोहन भागवत का संबोधन हुआ। चूंकि बात राष्ट्रीय सुरक्षा और चीन को लेकर हुई, इसलिए इसकी अहमियत भी वैश्विक है। संघ प्रमुख ने भारतीय सुरक्षा को अभेद्य बताया और सरकार की नीतियों की प्रशंसा भी की, लेकिन साथ में भारत को सजग और सतर्क रहने की बात भी दोहरायी। संघ प्रमुख ने न केवल गलवन घाटी में चीन के अतिक्रमण की बात कही, बल्कि यह जिक्र भी किया कि दुनिया के अन्य हिस्सों में चीन की हिंसक और आक्रामक सोच दुनिया की शांति के लिए एक नया खतरा बन चुका है। वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल यात्रा के दौरान बुद्ध और युद्ध के बीच अंतर को समझने की पहेली भारत के पड़ोसी देशों के सामने रखी थी।

दूसरी तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार एक नए मंत्रालय के गठन के प्रयास में है, जिसे 2022 तक शुरू कर दिया जाएगा। सुरक्षा को मुस्तैद करने के लिए उसे पांच खंडों में बांटने की व्यवस्था की गई है, जिसमें समुद्री सुरक्षा से लेकर चीन और पाकिस्तान के बीच की सीमा को अलग-अलग खंडों में बांटा जाएगा, जिसकी पूरी निगरानी एक केंद्रीकृत व्यवस्था के रूप में की जाएगी। भारतीय नीति और सोच को समझने वाले विशेषज्ञ इन परिवर्तनों के जरिये यह भलीभांति समझ सकते हैं कि भारत युद्ध की बात नहीं करता और न ही युद्ध के पैदा होने की परिस्थितियों को आगाज देता है, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं कि वह युद्ध की गर्जना से भयभीत हो जाता है। संघ प्रमुख द्वारा चीन का विश्लेषण उसी बात को रेखांकित भी करता है।

भारत-अमेरिका टू प्लस टू वार्ता में भी चीन पर चर्चा :

भारत और अमेरिका के बीच टू प्लस टू वार्ता में भी चीन का मुद्दा गंभीरता के साथ उठाया गया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि अमेरिका सहित पूरी दुनिया चीन से तंग आ चुकी है। जहां मानवता अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्षरत है, वहीं चीन भारत सहित अन्य पड़ोसी देशों के साथ युद्ध और कलह की उन्माद को बढ़ा रहा है। इसलिए जरूरी है कि चीन को करारा जवाब दिया जाए।

चीन अभी भी युद्ध और संघर्ष की बात कर रहा है, लिहाजा हर तरह की वार्ता किसी अंजाम पर पहुंचने के पहले ही असफल हो जा रही है। ठंड का मौसम दोनों देशों की सेनाओं के लिए मुसीबत का सबब है। फिर भी हठधर्मिता चीन की बरकरार है। लगता नहीं है कि चीन की मंशा ठीक है। उसने हठधर्मिता के साथ यह कहा है कि वह एक इंच भी नहीं पीछे हटेगा यानी वह युद्ध की धमकी दे रहा है।

चीन की सरकारी पत्रिका ग्लोबल टाइम्स में बीते दिनों प्रकाशित एक लेख में 1962 युद्ध का उल्लेख किया जाना भी इस बात का संकेत है कि चीन उसके बाद की अनेक संधियों को ताक पर रखकर भारत की सामरिक शक्ति को चुनौती दे रहा है। भारत के संसद में रक्षा मंत्री ने भी संसद को चीन की सोच से अवगत करा दिया है और यह भी विश्वास दिलाया है कि भारत की स्थिति मजबूत है। हम युद्ध के लिए तैयार हैं, जबकि शांति से बेहतर कोई विकल्प नहीं है।

अगर युद्ध की स्थिति बनती है तो चीन के लिए मुश्किलें कैसे पैदा होंगी, उसकी विवेचना जरूरी है। पहला, चीन नई विश्व व्यवस्था में मुखिया बनने की कोशिश में है। भारत उस दौड़ में नहीं है। चीन की अंतरराष्ट्रीय छवि पिछले करीब आठ महीने में बहुत धूमिल हुई है। कुछ दिन पहले ताइवान ने चीनी सैन्य पनडुब्बी को मिसाइल से ध्वस्त कर दिया था, चीन चीखता रहा, हुआ कुछ भी नहीं, क्योंकि ताइवान के माथे पर अमेरिका का हाथ है। दूसरी तरफ चीन के विश्वस्त पड़ोसी देशों मसलन मलेशिया और थाईलैंड ने भी उससे एक निश्चित दूरी बना ली है। दूसरा, भारत ने पिछले दिनों तिब्बत कार्ड की शुरुआत कर दी है। इसका अंदाजा इस बात से मिलता है कि एक विशेष सैन्य टुकड़ी जिसे स्पेशल फ्रंटियर फोर्स कहा जाता है, वह अब खबरों में आई है।

इस सैन्य टुकड़ी का गठन 1964 में ठीक युद्ध के बाद हुआ था, लेकिन यह बात चीन तक नहीं पहुंची थी। इसमें तिब्बत के शरणार्थी हैं, जो 1950 में और बाद में दलाई लामा के साथ 1959 में भागकर भारत आ गए थे। पिछली सदी के सातवें दशक में इस टुकड़ी को खम्पा विद्रोह के रूप में जाना जाता था, जिसे अमेरिकी मदद से तिब्बत को आजाद करने की व्यूह रचना की गई थी। चूंकि भारत नेहरू की सोच की वजह से तब खम्पा विद्रोहियों का साथ नहीं दे पाया, नहीं तो तिब्बत उसी दौर में आजाद देश बन जाता और चीन की महत्वाकांक्षा वहीं समाप्त हो जाती। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पिछले दिनों एक तिब्बती सेना के शहीद होने के बाद उसे भारत और तिब्बत के झंडे में लपेट कर अंतिम विदाई दी गई। यह सब देखकर चीन के होश उड़ गए।

कुल मिलाकर चीन की सेना भारत के विरुद्ध लड़ने के लिए तिब्बती सेना की फोर्स तैयार करने में जुटी हुई थी। लेकिन उसे यह समझ नहीं आ रहा कि जिस क्षेत्र को चीन ने दीमक की तरह चाट लिया है, वहीं के लोगों को भारत के विरुद्ध लड़ने के लिए तैयार किया जा रहा था। भारत के प्रयास ने चीन को खतरे में डाल दिया है। मालूम हो कि भारत के स्पेशल फ्रंटियर फोर्स में मूलत: तिब्बती ही हैं, जो अपने देश को आजाद करने के संकल्प के लिए कुर्बानियां दे रहे हैं। सीमा के उस पार भी उसी नस्ल और क्षेत्र के तिब्बती हैं, अंतर इतना-सा है कि वे चीन के चंगुल में हैं और ये लोग चीन के चंगुल से आजाद हैं। इस बात की पूरी आशंका है कि यह युद्ध तिब्बत स्वतंत्रता संग्राम के रूप में न बदल जाए।

इस पूरे संदर्भ में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि चीन का मुख्य शत्रु आज भी अमेरिका ही है। जब तक अमेरिका से चीन दो-दो हाथ नहीं कर लेता, उसकी छवि एक सुपर पावर के रूप में कभी नहीं बन सकती। आज जिस तरीके से वह भारत के साथ सीमा विवाद में उलझा हुआ है, उसकी वैश्विक पहचान धूमिल होने वाली है। भारत और चीन संघर्ष का नतीजा जो कुछ भी हो, लेकिन इतना तय है कि इससे चीन की हस्ती कमजोर होगी।

राष्ट्र की सुरक्षा के संबंध में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सदैव चिंतनशील रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले पर समय-समय पर इस संगठन ने सदैव राष्ट्रवादी विचारों का पोषण किया है। आज जब चीन हमारी लद्दाख से जुड़ी सीमा पर सैन्य शक्ति का जमावड़ा लगा चुका है और हालात गंभीर बने हुए हैं तब ऐसे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत द्वारा देश के सामने रखी गई अपनी बात कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

दुनिया का सबसे ताकतवर देश बनना चाहता है चीन 

चीन के मुखिया शी चिनफिंग ने 2012 में चीन को दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बनाने की बात कही थी। वह उसी अनुरूप कदम उठा रहे थे। उन्हें विश्वास था कि दुनिया अब चीन के अश्वमेघ उड़ान को रोक नहीं पाएगी। लेकिन व्यक्ति या देश के लिए अति उत्साह या सार्वभौमिक बनने की आतुरता विघटन को जन्म देती है। यहीं पर शी चिनफिंग भूल कर रहे हैं। दरअसल उन्हें अपने देश की बढ़ती हुई ताकत का अंदाजा तो है, लेकिन वहीं दूसरी ओर वे भारत को अभी तक अपने पुराने चश्मे से ही देख रहे हैं। शायद उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि देश नेहरू युग से बहुत आगे बढ़ चुका है और नरेंद्र मोदी युग में प्रवेश कर चुका है, जहां कोई भी सैन्य क्षेत्र के मामले में तो कम से कम भारत से मुकाबला नहीं कर सकता है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि चीन के राष्ट्रपति अपने राजनीतिक अस्तित्व की जंग लड़ रहे हैं। गलवन घाटी में जो कुछ भी अभी तक हुआ है, वह उनके इशारों पर ही हुआ है, क्योंकि वही तीनों सेना के कमांडर भी हैं। इन तमाम तथ्यों के बीच जिस तरीके से भारतीय सीमा पर आजाद तिब्बत का नारा लगना शुरू हुआ है, उससे आजकल चीन की बेचैनी बढ़ गई है। चीन को विश्वास था कि भारत कभी भी तिब्बत की स्वायत्तता को हवा नहीं देगा। लेकिन विश्वासघात की भी एक सीमा होती है। चीन अपने बल और छल से भारत की संप्रभुता को निरंतर चुनौती दे रहा था।

शी चिनफिंग भूल चुके थे कि भारत में सत्ता की बागडोर एक ऐसे हाथ में है जो संप्रभुता से कोई समझौता नहीं कर सकता। भारत की सैनिक क्षमता और कूटनीतिक धार बहुत मजबूत बन चुकी है। इसलिए यह मुठभेड़ भारत के लिए चिंता की बात कम, चीन के लिए ज्यादा खतरनाक है।

राष्ट्रवादी सोच और उसी अनुरूप कार्यप्रणाली पर आगे बढ़ता संघ

भारत की सुरक्षा को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सोच एक मजबूत नेशनलिस्ट सोच से जुड़ी हुई रही है। मसला चाहे चीन का हो या पाकिस्तान के साथ सीमाई संघर्ष का। संघ प्रमुख ने पड़ोसी देशों को भारत की सांस्कृतिक इकाई के रूप में बताया है। उसका विश्लेषण कूटनीतिक खंडों में महज राजकीय संबंध के रूप में स्थापित नहीं होता। इसी सिद्धांत की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक सुनील अंबेडकर ने अपनी पुस्तक रोडमैप ऑफ आरएसएस 21स्ट सेंचुरी में चर्चा की थी। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संयुक्त महासचिव दत्तात्रेय होसबले ने भी हाल ही में कहा है कि संगठन यह मानता है कि नागरिकता कानून के कारण भारत के पड़ोसी देशों के संबंध पर कोई आंच नहीं आएगी। समान आचार संहिता का विषय भी देश के लिए एक अहम अहम मसला है। आरएसएस इस बात को लेकर बहुत गंभीर है। एक देश एक विधान एकात्मकता के लिए जरूरी भी है। इससे राजनीतिक पृथकीकरण की शुरुआत हो जाती है। इसे धाíमक विद्वेष के रूप में चंद राजनीतिक पार्टियों के द्वारा जनता के सामने परोसा जाता है। वर्षो से धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुसलमानों को डराया जाता रहा है। दुनिया की ताकतें भारत की अखंडता को खंडित करने की साजिश रचती रही हैं।

हाल ही में चीन ने धमकी दी है कि वह भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में अलगाववाद को हवा देगा, इसलिए भी भारत की इस राष्ट्रीय इकाई को मजबूत करना बहुत ही आवश्यक है। दरअसल बीते लगभग सात दशकों में देश को यह पढ़ाया और समझाया गया कि हमारा देश विभिन्नताओं में बंटा हुआ है, जबकि सच यह है कि हम सभी एक पुंज और अखंडता के अंग हैं। प्रधानमंत्री की हर व्यापक योजना का दार्शनिक आधार एक विश्व, एक सूर्य और एक ग्रिड क्यों बनता है? हर नीति के पीछे राष्ट्र निर्माण की भारतीय सोच है, जिसका उद्गम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सोच से स्पंदित होता है। राष्ट्र और राष्ट्र के माध्यम से विश्व को जब तक एक साथ नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक भूमंडलीकरण महज दिखावा बनकर रह जाएगा और समय के साथ निजी स्वार्थो को पूरा करने में जुट जाएगा, जैसा कि पिछले कुछ माह में महामारी के दौरान देखा गया।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं) 

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