नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। तपेदिक (टीबी), ऐसी महामारी है जो भारत समेत पूरी दुनिया के लिए आज भी एक चुनौती बना हुआ है। 76 साल पहले आज ही के दिन इसका इलाज सामने आया था। बावजूद आज भी ये बीमारी पूरी दुनिया के लिए सबसे बड़ी महामारी बना हुआ है। विश्व ने इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए जहां 2030 का लक्ष्य तय किया है, वहीं भारत 2025 तक इससे निजात पाने की रेस कर रहा। ऐसे में 5.4 लाख टीबी मरीजों की जानकारी रिकॉर्ड में दर्ज न होना भारत के अभियान को कमजोर कर सकता है।

न्यूज एजेंसी पीटीआई के अनुसार भारत में पिछले साल तपेदिक (टीबी) के 5.4 लाख मामले दस्तावेजों में दर्ज होने से छूट गए थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट के अनुसार देश में वर्ष 2017 के मुकाबले वर्ष 2018 में टीबी के मरीजों की संख्या 50 हजार कम हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2017 में भारत में टीबी के 27.4 लाख मरीज थे। वर्ष 2018 में टीबी मरीजों की संख्या घटकर 26.9 लाख हो गई। प्रति एक लाख आबादी के सापेक्ष टीबी मरीजों की संख्या में भी कमी दर्ज की गई है। वर्ष 2017 में प्रति एक लाख में से 204 लोग टीबी से पीड़ित थे, जबकि वर्ष 2018 में इनकी संख्या घटकर 199 रह गई है।

प्रति वर्ष छूट जाते हैं 30 लाख मरीज

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के मुताबिक, ‘विश्व भर के देशों में चलने वाले टीबी कार्यक्रमों में औसतन 30 लाख मरीज दस्तावेज में दर्ज होने से छूट जाते हैं। भारत में वर्ष 2018 में 26.9 लाख टीबी के मरीज पाए गए थे। इनमें से 21.5 लाख मरीज ही भारत सरकार के दस्तावेजों में दर्ज हो पाए थे, जबकि 5.40 लाख मरीज दस्तावेजों में दर्ज होने से रह गए थे।’

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भारत को कई सफलताएं भी मिली हैं

WHO की रिपोर्ट के अनुसार, इस दौरान भारत को टीबी पर जीत की दिशा में कई उल्लेखनीय सफलताएं भी हाथ लगीं। रिफैंपसिन नामक टीबी की दवा की जांच के दौरान वर्ष 2017 में 32 फीसद मरीज प्रतिरोधी पाए गए, जबकि वर्ष 2018 में इनकी संख्या बढ़कर 46 फीसद हो गई। बीमारी के उपचार में सफलता की दर वर्ष 2016 में 69 थी, जो वर्ष 2017 में 81 फीसद हो गई।

लोगों तक पहुंचानी होगी स्वास्थ्य सुविधाएं

डब्लूएचओ के महानिदेशक डॉ. टीए घेब्रेयस ने कहा, ‘टीबी पर जीत के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पहुंच सुनिश्चित करनी होगी। इसका मतलब है कि प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करना होगा।’ बता दें कि टीबी के मामले इस वजह से ज्यादा बढ़ते हैं, क्योंकि शुरूआती समय में मरीज को इसकी पहचान नहीं हो पाती और सही देखरेख के अभाव में यह बीमारी गंभीर हो जाती है।

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वर्ष 2018 में लोगों ने लिया सबसे ज्यादा आत्मरक्षक उपचार

ग्लोबल टीबी रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2018 में लोगों ने अभूतपूर्व तरीके से आत्मरक्षक उपचार लिया। इसका प्रमुख कारण रहा कि टीबी की पहचान व उपचार की सुविधा बढ़ी है। वर्ष 2017 में दुनिया भर में टीबी से 16 लाख लोगों की मौत हुई, जो वर्ष 2018 में घटकर 15 लाख हो गई। शुरूआती चरण में रोग का पता चलने पर बीमारी का तळ्रंत इलाज कराया जा सका।

आज ही हुई थी दवा की खोज

महामारी बनने वाली बीमारी टीबी (तपेदिक) का इलाज सामने आया 1943 में आज ही अमेरिकी शोधकर्ताओं ने एक एंटीबॉयोटिक दवा तैयार की थी, जिसका नाम स्ट्रेप्टोमाइसिन था। यह पहली ऐसी दवा थी जिससे टीबी का उपचार संभव हुआ था। इस दवा की खोज अल्बर्ट शेट्ज नामक एक छात्र ने की थी। इसके लिए 1952 में उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला था।

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2016 में टीबी से हुई थी 4 लाख मौत

भारत में टीबी के खिलाफ अभियान में वक्त-वक्त पर कई बदलाव हुए हैं। नए प्लान में टीबी मरीजों की पहचान कर उन तक दवा पहुंचाने से लेकर अन्य जरूरी चीजें पहुंचाने का लक्ष्य तय किया गया है। इसका मकसद ये है कि सभी को हर हाल में इलाज मिले। इसके अलावा टीबी को फैलने से रोकने के लिए सरकार विभिन्न माध्यमों से नियमित जागरूकता अभियान भी चलाती रहती है। देश की कई एनजीओ और स्वास्थ्य संगठन भी इसका हिस्सा हैं। भारत के लिए टीबी इसलिए भी सबसे बड़ी चुनौती है क्योंकि देश में प्रतिवर्ष होने वाली सबसे ज्यादा मौतों की वजह यही महामारी है। वर्ष 2016 में भारत में 28 लाख टीबी मरीज थे, इनमें से चार लाख मरीजों की इस बीमारी की वजह से मौत हो गई थी।

टीबी होने की वजह

टीबी कोई अनुवांशिक बीमारी नहीं है और ये किसी को भी हो सकती है। ये महामारी हवा के जरिए फैलती है। मसलन अगर कोई टीबी मरीज खांसता या छींकता है और उससे टीबी के जो जिवाणु हवा में फैलते हैं, वो आसपास मौजूद किसी स्वस्थ व्यक्ति को भी सांस के जरिए अपनी चपेट में ले सकते हैं। इसके अलावा अत्यधिक धूम्रपान और शराब के सेवन से भी इस रोग के फैलने की आशंका बढ़ जाती है। टीबी से बचने के उपाय बेहद सीमित हैं, जिसमें टीकाकरण, साफ-सफाई और हाइजिन का ख्याल रखना प्रमुख है।

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टीबी के लक्ष्ण

टीबी रोग से ग्रसित व्यक्ति का सबसे मुख्य लक्ष्ण तीन हफ्तों से ज्यादा खांसी का बने रहना है। इसके अलावा थूक का रंग बदल जाना या उसके खून आना भी इसके प्रमुख लक्ष्णों में है। टीबी रोग से ग्रसित मरीज को बुखार, थकान, सीने में दर्द, भूख न लगना, सांस लेने या खांसने में दर्द महसूस होना। टीबी, माइक्रोबैक्टिरीअम टूबर्क्यूलोसस (mycobacterium tuberculosis) नामक जीवाणु के जरिए फैलती है। ये एक संक्रामक रोग है, जिसका समय से इलाज संभव है। हालांकि, इसका इलाज काफी लंबा होता है और इसे बिना डॉक्टरी सलाह के बीच में छोड़ना घातक साबित हो सकता है। बीच में इलाज छोड़ने से ये जानलेवा भी हो सकता है।

Posted By: Amit Singh

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