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    देश की सुरक्षा को लेकर नहीं होगा चीन से कोई समझौता, भारत-जापान ने साझा किया ऐतिहासिक रक्षा घोषणापत्र

    Updated: Fri, 29 Aug 2025 09:55 PM (IST)

    भारत और जापान चीन के साथ संबंधों को सुधारने के साथ-साथ अपनी सुरक्षा को भी मजबूत कर रहे हैं। दोनों देशों ने रक्षा सहयोग पर एक ऐतिहासिक साझा घोषणा-पत्र जारी किया है जिसका उद्देश्य एशिया में एक-दूसरे के सबसे करीबी सहयोगी बनना है। घोषणा पत्र में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति और समृद्धि सुनिश्चित करने का संकल्प दोहराया गया है।

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    भारत और जापान ने कई समझौतों पर किए हस्ताक्षर।

    जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। चीन के साथ भारत अपने संबंध सुधारने की कोशिश कर रहा है, लेकिन अपनी सुरक्षा को चाकचौबंद करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहा। यही हाल जापान का भी है, जो प्रशांत क्षेत्र में चीन की आक्रामक गतिविधियों से निपटने के लिए अपनी पूरी रक्षा नीति बदलने में लगा है।

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    ऐसे में शुक्रवार को भारत और जापान ने पहली बार रक्षा सहयोग पर एक ऐतिहासिक साझा घोषणा-पत्र जारी किया जो दोनों देशों को एशिया में एक दूसरे का सबसे करीबी रक्षा सहयोगी बनाने की तरफ इशारा करता है।

    घोषणा पत्र में जताई गई इस बात पर चिंता

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा की अगुआई में सालाना शिखर सम्मेलन के बाद जारी इस घोषणा-पत्र में एक स्वतंत्र, खुला, शांतिपूर्ण और समृद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र सुनिश्चित करने का संकल्प दोहराया गया है और पूर्वी चीन सागर एवं दक्षिण चीन सागर के मौजूदा हालात पर गंभीर चिंता जताई गई है।

    संयुक्त घोषणा-पत्र में रक्षा सहयोग के लिए उठाए जाने वाले ठोस कदमों का व्यापक एजेंडा है। दोनों देश इस बात पर सहमत हैं कि वह आपसी संसाधनों व तकनीकी क्षमताओं का साझा उपयोग करेंगे। दोनों देशों की तीनों सेनाओं के बीच बेहतर सामंजस्य स्थापित किया जाएगा। अत्याधुनिक युद्ध रणनीति को लेकर एक दूसरे की क्षमता बढ़ाने के लिए व्यावहारिक सहयोग किया जाएगा। दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाया जाएगा, तीनों सेनाओं के बीच सैन्य अभ्यास किया जाएगा। सूचनाओं के आदान प्रदान के लिए संयुक्त कर्मचारी स्तर पर नए संवाद ढांचे की स्थापना की जाएगी। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मानवीय और आपदा राहत कार्यों के लिए तीनों सेनाओं के बीच सहयोग होगा। साथ ही आतंकवाद के विरुद्ध व साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भी सेनाओं के बीच सहयोग पर जोर दिया जाएगा।

    संयुक्त रणनीतियां विकसित होंगी

    रक्षा सहयोग का एजेंडा बहुत ही व्यापक है। इसमें रासायनिक, जैविक और रेडियोलाजिकल खतरों से निपटने के लिए संयुक्त रणनीतियां विकसित करने की रणनीति की घोषणा भी शामिल है। दोनों देश रक्षा प्लेटफार्मों के रखरखाव और मरम्मत के लिए एक-दूसरे की सुविधाओं का उपयोग भी करेंगे। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांतिपूर्ण समुद्री माहौल सुनिश्चित करने के लिए समुद्री सुरक्षा सहयोग को प्राथमिकता देने की बात है।

    जापान के सेल्फ-डिफेंस फोर्सेस, भारतीय सशस्त्र बलों और उनके तटरक्षक बलों के जहाजों की आवाजाही बढ़ाने पर सहमति बनी है। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों की पहचान करते हुए दोनों देश रक्षा उपकरणों और प्रौद्योगिकियों के सह-विकास और सह-उत्पादन को बढ़ावा देंगे। रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों के बीच भी सहयोग की नई शुरुआत होगी।

    क्वाड जैसे बहुपक्षीय ढांचे को महत्वपूर्ण बताया

    यह भी महत्वपूर्ण बात है कि दोनों प्रधानमंत्रियों की बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में सीधे तौर पर पूर्वी और दक्षिणी चीन सागर में चीन की आक्रामक गतिविधियों और क्षेत्रीय वर्चस्व की कोशिशों की तरफ इशारा किया गया है। दोनों नेताओं ने इसे गंभीर चिंता का विषय माना और एकतरफा कार्रवाइयों का विरोध करते हुए समुद्री विवादों को संयुक्त राष्ट्र के संबंधित कानून के तहत शांतिपूर्ण ढंग से हल करने की वकालत की। इसमें क्वाड जैसे बहुपक्षीय ढांचे को भी महत्वपूर्ण बताया गया है और इसके तहत सहयोग बढ़ाने की बात है।

    विशेषज्ञों ने इस साझा घोषणा-पत्र को भारत-जापान के बीच रक्षा साझेदारी की नई शुरुआत के तौर पर चिन्हित किया है जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और विकास के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। भारत व जापान के प्रधानमंत्रियों ने शुक्रवार को कहा भी कि दोनों देशों के बीच साझेदारी वैश्विक शांति और समृद्धि के लिए भी एक मील का पत्थर है।

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