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    जर्मन राजदूत बोले- अफगानिस्तान मुद्दे पर भारत-जर्मनी का रुख एक जैसा, दोनों देश करेंगे करीबी सहयोग

    भारत में जर्मनी के राजदूत वाल्टर जे. लिंडनर ने रविवार को कहा कि अफगानिस्तान के मुद्दे पर भारत और जर्मनी का रुख एक जैसा है और दोनों देश इस संबंध में करीबी सहयोग करेंगे। उन्होंने कहा कि हमारी कुछ शर्तें हैं जिनके आधार पर तालिबान से बात करते हैं।

    By TaniskEdited By: Updated: Sun, 03 Oct 2021 10:57 PM (IST)
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    भारत में जर्मनी के राजदूत वाल्ट जे. लिंडनर।

    नई दिल्ली, प्रेट्र। भारत में जर्मनी के राजदूत वाल्टर जे. लिंडनर ने रविवार को कहा कि अफगानिस्तान के मुद्दे पर भारत और जर्मनी का रुख एक जैसा है और दोनों देश इस संबंध में करीबी सहयोग करेंगे। जर्मनी के एकीकरण की 31वीं वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रम में लिडंनर ने कहा, 'भारत, वहां (अफगानिस्तान में) बहुत बड़ा किरदार है और कई विकास परियोजनाओं में शामिल रहा है जबकि जर्मनी गत 20 साल में वहां बहुत सक्रिय रहा है। अत: हम दोनों काफी हद तक समान सिद्धांत को साझा करते हैं।' इस अवसर पर उन्होंने दिल्ली के पहाड़गंज स्थित शीला सिनेमाघर की विशाल दीवार पर भारत और जर्मनी की दोस्ती को प्रतिबिंबित करती सांकेतिक पेंटिंग का उद्घाटन भी किया।

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    लिंडनर ने कहा कि दोनों देशों ने अफगानिस्तान की पूर्ववर्ती सरकार का समर्थन किया था और वहां की स्थिति खासतौर पर महिलाओं की स्थिति सुधारने की कोशिश की थी। उन्होंने कहा, 'हम तालिबान को तेजी से मिली बढ़त से आश्चर्यचकित हैं। अब हमें इस स्थिति से निपटना है। हमें अब भी तालिबान से बातचीत कर वहां मौजूद लोगों को निकालना हैं। हमें अब भी संयुक्त राष्ट्र के जरिये अफगानिस्तान में मानवीय संकट को रोकना हैं।'

    लिंडनर ने कहा, 'हमारी कुछ शर्तें हैं जिनके आधार पर हम तालिबान से बात करते हैं- एक समावेशी सरकार, जो अब तक वहां नहीं है। इसके बावजूद इन बिंदुओं पर प्रगति करने के लिए हमें किसी न किसी तरह का संवाद रखना है। भारत की भी स्थिति बहुत कुछ ऐसी ही है। अत: हम एक दूसरे के साथ करीबी सहयोग देखते हैं।'

    जर्मन राजदूत ने कहा कि अर्थव्यवस्था, पर्यावरण संरक्षण, हरित ऊर्जा, छात्रों का अदान-प्रदान, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस अहम क्षेत्र होंगे जिन पर भारत और जर्मनी की साझेदारी आगे बढ़ेगी। भारत और ब्रिटेन के बीच कोरोना टीकाकरण प्रमाणपत्र को लेकर चल रहे गतिरोध के सवाल पर लिंडनर ने कहा, 'मैं नहीं जानता कि वास्तव में क्या मामला है.. क्यों ब्रिटेन भारत के एप को मान्यता नहीं दे रहा है।

    हफ्तों पहले, हमने कोविशील्ड को मान्यता दे दी थी। मैंने स्वयं कोविशील्ड टीका लगवाया है। ऐसे में जिन लोगों ने कोविशील्ड लगवाया है उन्हें क्वारंटाइन में जाने (जर्मनी में) या अन्य किसी तरह की पांबदी का सामना करने की जरूरत नहीं है।' राजदूत ने कहा कि कोवैक्सीन को चूंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मान्यता नहीं दी है, इसलिए इस टीके की डोज लेने वालों को क्वारंटाइन में रहना होगा। एक बार विश्व स्वास्थ्य संगठन भारत बायोटेक द्वारा उत्पादित टीके को मान्यता दे दे तो जर्मनी अगला कदम उठाएगा और देखेगा कि क्या इसे मान्यता दी जा सकती है।

    भारत को भी वर्ष 2050 तक कार्बन न्यूट्रैलिटी का लक्ष्य प्राप्त करना चाहिए

    जर्मन राजदूत ने कहा कि भारत को भी वर्ष 2050 तक कार्बन न्यूट्रैलिटी का लक्ष्य प्राप्त कर लेना चाहिए। कार्बन न्यूट्रैलिटी उस विचार को कहा जाता है जिसमें ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और प्राकृतिक रूप से अवशोषित इस गैस की मात्रा में संतुलन स्थापित हो तथा कुल उत्सर्जन शून्य हो। दुनिया के 110 से अधिक देशों ने पहले ही वर्ष 2050 तक कार्बन न्यूट्रैलिटी का लक्ष्य प्राप्त करने का वादा किया है। उन्होंने कहा कि यूरोपीय संघ ने 2050 में और जर्मनी ने 2045 में इस लक्ष्य को प्राप्त करने का संकल्प व्यक्त किया है। जल्द ही यह भारत द्वारा भी हासिल किया जा सकता है।