नई दिल्ली [शशांक द्विवेदी]। आज से 50 साल पहले यानी 15 अगस्त 1969 को प्रसिद्ध वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के निर्देशन में राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो का गठन किया गया था। जिस देश में कभी साइकिल और बैलगाड़ी पर रखकर रॉकेट ले जाए जाते थे उसी देश ने आज चांद और आसमान पर कब्जा करना सीख लिया है।

19 अप्रैल 1975 को इसरो द्वारा स्वदेश निर्मित उपग्रह आर्यभट्ट का सफल प्रक्षेपण किया गया था। इसरो का सफर आज उस मुकाम पर पहुंच गया है जहां भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में दुनिया के सबसे शक्तिशाली पांच देशों में से एक है। पिछले दिनों अंतरिक्ष की दुनिया में भारत ने इतिहास रचते हुए अपने दूसरे चंद्र मिशन, चंद्रयान-2 को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर दिया। 15 फरवरी, 2017 को इसरो ने एक साथ 104 सेटेलाइट प्रक्षेपित करके अंतरिक्ष की दुनिया में इतिहास रच दिया था।

भारत में सेटेलाइट की कॉमर्शियल लॉन्चिंग दुनिया में सबसे सस्ती पड़ती है। भारत के जरिये सेटेलाइट लॉन्च करना अमेरिका, चीन, यूरोप से कई गुना तक सस्ता पड़ता है। लेकिन समय आ गया है जब इसरो व्यावसायिक सफलता के साथ साथ अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की तरह अंतरिक्ष शोध और अन्वेषण पर भी ज्यादा ध्यान दे। इसके लिए सरकार ने इसरो का सालाना बजट जरूर बढ़ाया, पर अब भी यह नासा के मुकाबले काफी कम है।

भारी विदेशी उपग्रहों को अधिक संख्या में प्रक्षेपित करने के लिए अब हमें पीएसएलवी के साथ साथ जीएसएलवी रॉकेट का भी उपयोग करना होगा। चंद्रयान 2 के लिए जीएसएलवी रॉकेट का ही प्रयोग किया गया है। वैसे तो भारत के पहले सफल चंद्र मिशन और मंगल मिशन के बाद से ही इसरो व्यावसायिक तौर पर काफी सफल रहा है और इसरो के प्रक्षेपण की बेहद कम लागत की वजह से दुनिया भर के कई देश अब इसरो से अपने उपग्रहों को प्रक्षेपित करा रहे हैं।

अंतरिक्ष बाजार में भारत के लिए संभावनाएं बढ़ रही हैं, इसने कई बड़े देशों का एकाधिकार तोड़ा है। असल में इन देशों को यह लगता रहा है कि भारत यदि अंतरिक्ष के क्षेत्र में इसी तरह से सफलता हासिल करता रहा तो उनका न सिर्फ उपग्रह प्रक्षेपण के कारोबार से एकाधिकार छिन जाएगा, बल्कि मिसाइलों की दुनिया में भी भारत इतनी मजबूत स्थिति में पहुंच सकता है कि बड़ी ताकतों को चुनौती देने लगे। भविष्य में अंतरिक्ष में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, क्योंकि यह अरबों डॉलर का बाजार है।

बीते 27 मार्च को भारत ने मिशन शक्ति के अंतर्गत जमीन से मिसाइल दागकर पृथ्वी की निचली कक्षा में 300 किमी की रेंज पर मौजूद एक सेटेलाइट को मार गिराने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया था। बीते पांच दशकों में इसरो ने सफलता के कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं और वह दिन दूर नहीं जब भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में विश्व का सबसे ताकतवर देश बन जाए। 

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