सुरेंद्र प्रसाद सिंह, नई दिल्ली। आयात निर्भरता घटाने और कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ाने के लिए आगामी वित्त वर्ष 2023-24 के आम बजट में विशेष प्रोत्साहन की संभावना है। इसके लिए कई तरह की नई योजनाएं शुरु की जा सकती हैं। दलहन व तिलहन की कमी से जूझ रही सरकार इससे निजात पाने की दिशा में अहम कदम उठा सकती है। इसके साथ बागवानी उत्पादों के निर्यात की संभावनाओं के दोहन पर विशेष बल दिया जा सकता है। सरकार का पूरा जोर कृषि निर्यात पर है, जिसके लिए हर संभव उपाय किए जा सकते है। किसानों को वाजिब मूल्य दिलाना भी आम बजट की प्राथमिकता में होगा। कृषि क्षेत्र में दलहनी और तिलहनी फसलों की पैदावार को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष स्कीम लाने की घोषणा हो सकती है।

मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआइ) की शुरुआत की है, जिसका प्रदर्शन शानदार रहा है। इसी के मद्देनजर सरकार दलहनी व तिलहनी फसलों के लिए अलग तरह की स्कीम ला सकती है। खाद्य तेलों और दालों की आयात निर्भरता को खत्म करना सरकार के समक्ष एक बड़ी चुनौती है। सालाना इस पर तकरीबन एक लाख करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। इससे निजात पाने की चुनौती से सरकार जूझ रही है। तिलहनी फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए पिछले आम बजट में 11 हजार करोड़ रुपए से अधिक की योजना शुरु की गई है, जिसमें आयल पाम की खेती को प्रोत्साहन किया जाना है।

इसी तरह पिछले कई वर्षों से दलहनी फसलों की पैदावार बढ़ाने की कोशिशों के बावजूद घरेलू खपत के लिए अभी भी 25 लाख टन दालें आयात करनी पड़ रही हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से प्रोत्साहन की स्कीम भी अब कारगर साबित नहीं हो रही है। इसलिए किसानों का रुझान अब इन फसलों की ओर थम गया है।दूसरी तरफ बागवानी उत्पादों के सहारे विश्व बाजार में निर्यात की संभावनाएं हैं, जिसका लाभ उठाने की कोशिशें तेज कर दी गई हैं। प्राकृतिक, जैविक और रसायनमुक्त कृषि उपज को बढ़ाने के क्लस्टर आधारित खेती पर बल दिया जा रहा है।

इसके लिए देश के विभिन्न हिस्सों में क्लस्टर आधारित खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है। बागवानी उत्पादों के निर्यात को बढ़ाने और घरेलू मांग को पूरा करने के लिए हार्टिकल्चर क्लस्टर विकास कार्यक्रम को आगे बढ़ाने पर जोर है। पूर्वोत्तर के हिमालयी राज्यों समेत अन्य राज्यों को भी इसमें शामिल करने की योजना है।इसके लिए देश के चिन्हित 55 क्लस्टर विकसित किए जाएंगे।

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इसमें अरुणाचल प्रदेश, असम, पश्चिम बंगाल, मणिपुर, मिजोरम, झारखंड और उत्तराखंड को भी शामिल किया जाएगा। इंडियन काउंसिल आफ एग्रीकल्चरल रिसर्च से जुड़े संस्थानों की खाली पड़ी जमीनों का उपयोग कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम को फसल डायवर्सिफिकेशन और उसकी उपज बिक्री के लिए बाजार से लिंक करने पर जोर दिया जाएगा।

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Edited By: Shashank Mishra

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