नई दिल्ली (जेएनएन)। टिड्डी दल लगातार आगे बढ़ रहा है और किसानों समेत आमजन के लिए भी समस्‍या बनता जा रहा है। राजस्थान के रास्ते मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में भी इन टिड्डी दलों ने आतंक मचाया हुआ है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बार इनका हमला पहले से जल्‍दी हुआ है और इस बार इनका दल भी पहले की अपेक्षा काफी बड़ा है। वहीं विशेषज्ञ ये भी मानते हैं कि लॉकडाउन की वजह से इस बार इनको रोकने के लिए या इन्‍हें खत्‍म करने के लिए जो हर बार उपाय किए जाते थे वो नहीं हो सके। यही वजह है कि इस बार ये समस्‍या पहले से अधिक बड़ी हो गई है। प्रवेश कर गए हैं। इस बार इनका आकार बड़ा भी है। लॉकडाउन के चलते पूरी तरह से रोकथाम नहीं हो पाने से इनका मूवमेंट भी बढ़ा है। इनकी वजह से मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, पंजाब और हरियाणा ने अलर्ट जारी किया गया है। इनकी रोकथाम और इनसे होने वाले नुकसान को लेकर दैनिक जागरण ने एग्रीकल्‍चर एक्‍सटेंश के असिसटेंट प्रोफेसर डॉक्‍टर सुरजीत कुमार अरुण से बातचीत की।

लगातार बनी हुई है समस्‍या

डॉक्‍टर अरुण के मुताबिक पहले ये दल राजस्‍थान और पंजाब तक ही ज्‍यादातर सीमित रहता था, लेकिन इस बार इनकी पहुंच यूपी समेत दिल्‍ली एनसीआर तक हो गई है। उनकी मानें तो टिड्डियों की ये समस्‍या काफी समय से लगातार बनी हुई है। किसानों की खेतों में खड़ी फसल के लिए ये सबसे अधिक खतरनाक होते हैं। उनके मुताबिक टिड्डियों के एक सामान्‍य दल जिसमें कुछ हजार टिड्डियां हो सकती हैं एक दिन में करीब दस हाथी के बराबर खाना खा सकती हैं। वहीं यदि इनके बड़े दलों की बात की जाए तो कई हेक्‍टेयर में खड़ी फसलों को कुछ ही दिनों में चट कर सकती है। इनके आतंक से न तो कोई फसल ही बचती है और न ही कोई पेड़।

लोगों को भी दी जाती है हिदायत

डॉक्‍टर अरुण के मुताबिक इनके दांत इस कदर नुकीले होते हैं कि ये मजबूत पेड़ को भी कुछ ही देर में खत्‍म कर देते हैं। 15-20 किमी की स्‍पीड से उड़ने वाले ये दल ज्‍यादातर हवा के रुख के साथ आगे बढ़ते जाते हैं और इनका पहला शिकार खेतों में खड़ी फसलें ही होती हैं। एक दिन में ये टिड्डी दल 150-200 किमी की दूरी तय कर लेता है। इन टिड्डियों का बड़ा दल लोगों के दिलों में दहशत तक पैदा कर सकता है। ये टिड्डी दल जितना फसलों के लिए नुकसानदेह है उतना ही इंसानों के लिए भी खतरनाक है। यही वजह है कि राजस्‍थान समेत कुछ दूसरे राज्‍यों में इनसे बचने के लिए बाकायदा लोगों को हिदायत दी जाती है कि वे घरों के दरवाजे-खिड़की बंद करके रखें। उनके मुताबिक इनके बड़े दलों में एक अरब तक टिड्डियां हो सकती हैं। हॉर्न ऑफ अफ्रीका समेत कुछ दूसरे अफ्रीकी देश जिनमें सुडान, इथियोपिया, केन्‍या और सोमालिया समेत मिडिल ईस्‍ट के देशों और दक्षिण एशियाई देशों में इनका कहर लगभग हर वर्ष टूटता है। 

पारंपरिक तरीके के अलावा कीटनाशक का छिड़काव

इन टिड्डी दलों से बचाव के सवाल पर डॉक्‍टर अरुण का कहना था कि भारत में किसान काफी समय से पारंपरिक तरीकों का इस्‍तेमाल इसके लिए करते आए हैं। इनमें थाली बजाना, खेतों में धुआं करना शामिल है। हालांकि अब इन्‍हें भगाने के लिए कुछ जगहों पर डीजे की तेज आवाज का भी इस्‍तेमाल किया जा रहा है। इन उपायों के पीछे वे बताते हैं कि टिड्डी दल आवाज की कंपन को बेहद जल्‍द और तेज महसूस करते हैं। इसकी वजह से वे भाग जाते हैं। उनका ये भी कहना है कि ये इस तरह की तेज आवाज की कंपन को काफी दूर से भांप लेते हैं और अपना रास्‍ता बदल लेते हैं। इसके अलावा क्‍लोरफाइरीफास, हेस्‍टाबीटामिल और बेंजीएक्‍स्‍टाक्‍लोराइड दवा का छिड़काव भी खेतों में किया जाता है। उनके मुताबिक इन दवाओं का इस्‍तेमाल सरकार भी कराती है और स्‍थानीय स्‍तर पर किसान मिलकर भी इसको करते हैं। कंपनियां काफी तादाद में इसको तैयार करती हैं और ये आम किटनाशक स्‍टोर पर मिल जाती हैं।

खेतों में पानी भर कर खत्‍म किए जा सकते हैं अंडे

हालांकि वे ये भी मानते हैं कि इनका दल काफी बड़ा होता है ऐसे में स्‍थानीय स्‍तर पर किए गए छिड़काव से कम ही फायदा होता है। उन्‍होंने बताया कि सरकार की तरफ से लगभग हर साल इन दवाओं का छिड़काव किया जाता है। ये दवाएं पाउडर और लिक्विड की शक्‍ल में आती हैं जो टिड्डियों से फसलों को बचाने में सहायक हैं। उनके मुताबिक टिड्डी दल बड़ी तादाद में खाली पड़े खेतों में अंडे देता है। इसलिए ये जरूरी है कि इनसे बचने के लिए खेतों की गहरी जुताई कर उनमें पानी भर दिया जाए। ऐसा करने से अंडे खत्‍म हो जाते हैं। लेकिन खड़ी फसलों में केवल दवा के छिड़काव करने से ही बचा जा सकता है।

इस बार समस्या ज्यादा व्यापक 

राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब और उत्तर प्रदेश में टिड्डियों के हमले के कारण फसलों को बर्बादी का सामना करना पड़ रहा है। दक्षिण अफ्रीका में अधिक बारिश के कारण बड़ी संख्या में टिड्डियों ने प्रजनन किया। इसके अलावा बलूचिस्तान, पाकिस्तान और ईरान में इनके प्रजनन में बढ़ोतरी हुई। यही कारण है कि इस बार समस्या ज्यादा व्यापक है।

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Posted By: Kamal Verma

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