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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 07, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

गृह मंत्रालय का निर्देश, दागी नेताओं के खिलाफ तेजी से निपटाएं केस

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Published: Sun, 07 Sep 2014 10:00 PM (IST)Updated: Sun, 07 Sep 2014 09:04 PM (IST)

केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को दागी सांसदों और विधायकों के खिलाफ मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक ...और पढ़ें

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नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को दागी सांसदों और विधायकों के खिलाफ मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन करने को कहा है। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह और गृह सचिव अनिल गोस्वामी ने सभी मुख्यमंत्रियों और मुख्य सचिवों को इस सिलसिले में अलग-अलग पत्र लिखा है। इससे पहले केंद्रीय कानून मंत्रालय ने सभी हाई कोर्टो से भी दागी नेताओं के खिलाफ मुकदमों में तेजी लाने का अनुरोध किया था।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लेख करते हुए पत्र में दागी सांसदों और विधायकों के खिलाफ उन मुकदमों की सुनवाई में तेजी लाने को कहा गया है, जिनमें दोषी पाए जाने पर सदस्यता रद होने का प्रावधान है। इसके लिए राज्य सरकारों को फास्ट ट्रैक अदालतों में प्रतिदिन की सुनवाई सुनिश्चित करने, विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति करने और मुकदमों की नियमित निगरानी करने को कहा गया है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल दस मार्च को जनप्रतिनिधियों के खिलाफ एक साल के भीतर सुनवाई पूरी कर लेने का निर्देश दिया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 24 जुलाई को गृह मंत्री और कानून मंत्री को ऐसी व्यवस्था विकसित करने का निर्देश दिया था, जिसके तहत सांसदों और विधायकों के खिलाफ मुकदमों का निपटारा एक साल के भीतर किया जा सके। जनप्रतिनिधियों को दो साल या इससे अधिक जेल की सजा होने पर संसद या विधानसभा की सदस्यता के अयोग्य ठहरा दिया जाता है।

केंद्र ने राज्यों से कहा है कि एक बार मुकदमा दर्ज हो जाने के बाद लोक अभियोजक संबंधित मजिस्ट्रेट या सेशन जज से इसकी प्रतिदिन सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक अदालत गठित करने का अनुरोध कर सकते हैं। लोक अभियोजक के अभाव में विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति की जानी चाहिए, ताकि मुकदमे की सुनवाई प्रभावित न हो। बेहतर ये होगा कि राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों के गृह सचिव इन मुकदमों की नियमित तौर पर समीक्षा करते रहें।

गृह मंत्रालय ने कहा है कि गवाह प्रस्तुत करने, मेडिकल और फोरेंसिक रिपोर्ट या केस में जरूरी किसी अन्य दस्तावेज जुटाने के काम को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। पुलिस महकमे को इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए कि किसी जरूरी दस्तावेज या गवाह के अभाव में मुकदमे की सुनवाई बाधित न हो।

जिला स्तर पर मुकदमों की निगरानी के लिए को-आर्डिनेशन कमेटी गठित करने का भी सुझाव दिया गया है।

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