नई दिल्ली (अतुल पटैरिया)। दिल्ली स्थित हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह में अबकी दीवाली खास रही। औलिया के मुरीदों ने उनके दर पर आस्था के रंगों से खूबसूरत रंगोली सजाई। श्रद्धा के जमगमाते दीयों से पीर के दर को रोशन किया। भारतीय संस्कृति को रोशन करती गंगा-जमुनी तहजीब की इन बोलती तस्वीरों को सोशल मीडिया पर भी अब जमकर तरजीह मिल रही है। सुसंस्कृत और तहजीबदार लोगों के दिल खुश हो उठे हैं, तो कुछ ने जहर उगलना शुरू कर दिया है। दरगाह कमेटी से जुड़े सदस्यों का कहना है कि यह तो सदियों से होता आ रहा है।

दरगाह में दीवाली, होली, बसंत पंचमी सभी लोग साथ मिलकर मनाते हैं। 14 नवंबर को औलिया के 803वें जन्मदिवस पर और फरवरी में बसंत पंचमी पर होने वाले कार्यक्रमों की तैयारियां अभी से शुरू हो चुकी हैं। दरगाह कमिटी से जुड़े दरगाह के सज्जादा- नशीं सूफी अजमल निजामी ने बताया कि सूफी विधा में इस्लाम के विरुद्ध कुछ भी नहीं है, बल्कि यह तो इस्लाम की खूबी है। सूफी संत जहां भी गए, उन्होंने उस जमीं, उस तहजीब की सभी अच्छाइयों को आत्मसात किया। ये वही बातें, वही खूबियां थीं, जो इस्लाम से टकराती नहीं थीं।

वल्र्ड सूफी फोरम के अग्रणी सदस्य सूफी अजमल निजामी कहते हैं कि दीवाली, होली और बसंत पंचमी ये सभी त्योहार दरगाह में मिलजुल कर मनाए जाते रहे हैं। ऐसा 14वीं सदी से होता आया है। लेकिन इस बार जब दीपोत्सव की तस्वीरें हमने सोशलमीडिया पर शेयर कीं, तो इस्लाम की गलत तस्वीर पेश करने वाले कुछ लोग भड़क उठे। बरेली स्थित सुन्नी पंथ की एक प्रमुख शाखा रजा खानी (रजवी) ने इस पर कड़ा एतराज जताया। बकौल अजमल, उन्होंने हमसे कहा कि आप दरगाह में दीये जला रहे हैं, कल को मूर्ति लगा देंगे क्या। हमने उन्हें समझाया कि भाई, मूर्ति क्यों लगाएंगे, यह तो सभी को पता है कि इस्लाम में मूर्तिपूजा नहीं होती है। लेकिन इस्लाम किसी को दीये जलाने से नहीं रोकता है। वल्र्ड सूफी फोरम के प्रमुख सदस्य की हैसियत से सूफी अजमल निजामी कहते हैं कि अरब के एक देश की सोची समझी रणनीति के तहत इस्लाम की सच्ची सीख को सामने नहीं आने दिया गया।

आज भी यही हो रहा है। इसी से निबटने वल्र्ड सूफी फोरम गठित हुआ है। हम सभी मिलकर एक वैश्विक प्रयास कर रहे हैं ताकि जो है, वही सामने आए। यह पूरी दुनिया और इंसानियत के लिए आज बहुत जरूरी हो गया है। निजामी कहते हैं, सूफियों ने जो सदियों पहले समझा और समझाया, उसे कुछ लोग अब जाकर समझ पा रहे हैं। अब तक खुद को इस्लाम का पैरोकार बताते आए ये लोग अब लोगों को समझा रहे हैं कि इस्लाम में औरतें भी मांग में सिंदूर भर सकती हैं। रंगीन कपड़े पहन कर नमाज पढ़ी जा सकती है। निजामी ने कहा कि नई पीढी को खुद भी पहल करनी चाहिए और वास्तिवक तथ्यों को और वास्तविकता को समझने की कोशिश करनी चाहिए। सब कुछ लिखा हुआ है, किसी से पूछने की भी जरूरत नहीं है।

मनती है होली और बसंत पंचमी भी
सूफी अजमल निजामी ने बताया कि निजामुद्दीन औलिया की दरगाह गंगा-जमुनी तहजीब का मुख्य केंद्र रही है। इसे आप इस इस तहजीब की प्रथम पाठशाला कह सकते हैं। यहां होली भी मनाई जाती है और बसंत पंचमी भी। उन्होंने इसका इतिहास भी बताया। वह बताते हैं कि 14वीं सदी में जब अलाउद्दीन खिलजी का राज था, औलिया की यह खानकाह सामाजिक समरसता के एक प्रभावी केंद्र के रूप में स्थापित हो चुकी थी। औलिया के परम शिष्य अमीर खुसरो ने होली के दिन ही अपने गुरू को प्राप्त किया था। निजामी बताते हैं कि खुसरो ने उस क्षण के बारे में लिखा है, आज रंग है री मांहा रंग है री..., मेरे महबूब के घर रंग है री...। इसी तरह यहां बसंत पंचमी की शुरुआत भी हुई। तब से लेकर आज तक सदियां गुजर गईं, लेकिन परंपराएं उसी तरह कायम हैं।

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Posted By: Srishti Verma