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    Gandhi Jayanti 2023: गांधी जी ने इंग्लैंड से लेकर ऐसे तय किया भारत की आजादी तक का सफर

    By Jagran NewsEdited By: Narender Sanwariya
    Updated: Mon, 02 Oct 2023 05:00 AM (IST)

    मोहनदास करमचंद गांधी जब इंग्लैंड से कानून की पढ़ाई कर भारत लौटे तो वह बैरिस्टर कहलाए। उनका विचार था कि वह राजकोट में ही वकालत करें लेकिन मित्रों की सलाह पर उन्होंने मुंबई से वकालत करने और अनुभव प्राप्त करने का निश्चय किया। गांधी जी को परिवार के लोगों ने समझाया कि किसी भी क्षेत्र में तजुर्बा बहुत मायने रखता है।

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    आज देश गांधी जी की 154वीं जयंती का जश्न मना रहा है।

    नई दिल्ली, ऑनलाइन डेस्क। आज देश गांधी जी की 154वीं जयंती का जश्न मना रहा है। बापू ने ना केवल अंग्रेजों से भारत को आजाद कराया, बल्कि उन्होंने देश और दुनिया को इस बात का लोहा मनवाया कि किसी भी लड़ाई को अहिंसा के बूते जीता जा सकता है। इसलिए गांधी आज नाम नहीं, बल्कि एक विचारधारा है।

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    यूं तो आपने गांधी जी से जुड़ीं सैंकड़ों कहानियां सुनी होंगी जो उनकी महानता और सादगी का बखान करने के लिए काफी हैं। लेकिन आज उनके जीवन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण कहानी हम आपके सामने रख रहे हैं। यह कहानी उस वक्त की है जब गांधी जी ने वकालत के पेशे में कदम रखा था।

    हम जानते हैं गांधी जी ने कानून की पढ़ाई की थी। वह भले ही विदेश से पढ़े मगर वह हिंदुस्तान में वकालत के तौर तरीकों से अनजान थे। उन्हें देश की अदालतों में जिरह करने का कोई अनुभव नहीं थी। 'सत्य के प्रयोग' या आत्मकथा (An Autobiography) में गांधी जी अपने करियर के इस पड़ाव का भी जिक्र करते हैं।

    इंग्लैड से लौटने के बाद शुरू हुई काम की तलाश

    दरअसल, मोहनदास करमचंद गांधी जब इंग्लैंड से कानून की पढ़ाई कर भारत लौटे तो वह बैरिस्टर कहलाए। उनका विचार था कि वह राजकोट में ही वकालत करें, लेकिन मित्रों की सलाह पर उन्होंने मुंबई से वकालत करने और अनुभव प्राप्त करने का निश्चय किया।

    गांधी जी को परिवार के लोगों ने समझाया कि किसी भी क्षेत्र में तजुर्बा बहुत मायने रखता है, इसलिए उन्होंने अनुभव जुटाने और करियर को एक नई दिशा देने के उद्देश्य से वकालत की ओर रुख ले लिया, मगर अदालत में जिरह के लिए प्रैक्टिस मायने रखती है।

    मेरी स्थिति ससुराल गई बहू जैसी हो गई: महात्मा गांधी

    आत्मकथा 'सत्य के प्रयोग' (My Experiments With Truth) में गांधी जी लिखते हैं कि मैंने बैरिस्टर की तख्ती तो लटका ली मगर मुकदमा लड़ने का साहस नहीं जुटा पाया। मेरी स्थिति ससुराल गई नई बहू जैसी हो गई।

    गांधीजी को मुंबई में कोर्ट के नियम कायदों से भी वाकिफ कराया गया। गांधी जी को बताया गया कि मुकदमों के लिए दलालों को भी रुपए देने पड़ते हैं। कोर्ट में बड़े से बड़ा नेता भी जो हर माह तीन चार हजार रुपए कमाता है, वह भी यहां कमीशन देता है, इसलिए आपको भी देना होगा। इस पर गांधी जी ने साफ इंकार कर दिया और वह अंत तक अपनी इस बात पर अडिग रहे। हालांकि बाद में उन्हें एक केस मिला जिसका मेहनताना 30 रुपए था।

    पहले केस में ही कांपने लगे थे पांव

    गांधी जी को पहला मुकदमा मिला ममीबाई का, मुंबई के स्मॉल कॉज कोर्ट यानी छोटी अदालत में यह गांधी जी के लिए पहला अवसर था। जिसमें उन्हें प्रतिवादी की ओर से बहस करनी थी। सत्य के प्रयोग में वह लिखते हैं, मैं खड़ा हुआ लेकिन पांव कांपने लगे, चक्कर आने लगे। ऐसा लगा जैसे अदालत घूम रही है। कोई सवाल सूझ ही नहीं रहा था, जज जरूर हंसा होगा। वकीलों को मजा आया होगा। पर, आंखों के सामने अंधेरा छाया हुआ था, मैं क्या ही देखता! तुरंत बैठ गया। मैंने कहा, 'मुझसे नहीं होगा। फीस वापस लें। उस दौरान मुवक्किल जीत गया...

    आगे वह लिखते हैं, उस दौरान मैंने हारा महसूस किया, मैं काफी शरमाया, तय किया कि जब तक पूरी तरह साहस न आ जाए, कोई मुकदमा न लूंगा।'

    पैसे बचाने के लिए चलते थे पैदल

    इसका परिणाम यह हुआ कि परिवार की आर्थिक स्थिति और तंग हो गई। गांधी जी उन दिनों गिरगांव में रहा करते और हाई कोर्ट आते-जाते शायद ही कभी ट्रॉम या गाड़ी भाड़े पर पैसा खर्च करते। अक्सर पैदल ही वह ये रास्ता तय किया करते थे। तकरीबन छह महीने रह कर मुंबई का घर उन्होंने समेट लिया और थक हार वापस राजकोट पहुंच गए। यहां उनका अर्जी दावे लिखने का काम वहां आराम से चल निकला। इसी बीच गांधी जी के भाई के पास पोरबंदर की एक मेमन फर्म से संदेश आया। जिसमें लिखा था, दक्षिण अफ्रीका में हमारा एक बड़ा मुकदमा चल रहा है। भाई को भेज दीजिए।

    अफ्रीका से शुरू किया आगे का सफर

    सन् 1915 में गांधी जी स्टीमर के जरिए अफ्रीका की ओर रवाना हुए और फिर यहीं से शुरू हुआ उनका आगे का राजनीतिक, सामाजिक और सेवा शुश्रषा का सफर। जहां उन्होने पहले दक्षिण भारत में सेवा कर नाम कमाया और फिर भारत में भी अहिंसा के दम पर अत्याचार के खिलाफ, आजादी का अलख जलाया

    सत्य के प्रयोग में उतारा जिंदगी का धरातल

    सत्य के प्रयोग में गांधी जी अपने जीवन से जुड़े सच को सामने रखने से जरा भी नहीं हिचके। हम जानते भी हैं उनका जीवन का स्मारक ही ईश्वर पर विश्वास और सच के आधार पर टिका था, गांधी जी की आत्मकथा में महानतम की छाप तो दिखी। गांधी जी ने अपने कर्मों और उपलब्धियों को ईश्वर की मर्जी माना और सत्याग्रह और अंहिसा को सबसे बड़ा हथियार समझा।

    गांधी जी धर्मों की जिरह में कभी नहीं पड़े। गांधी जी ने किताब सत्य के प्रयोग में न तो किसी धर्म की बुराई की और न ही भलाई, उन्होंने सभी धर्मों को समान माना वह गीता कुरान या बाईवल में कोई भेद नहीं मानते थे, धर्मों को परे रख उन्होंने महज इंसानियत को ही तवज्जो दी और शायद यही कारण रहा है कि गांधी जी की छवि आज भी सभी की आंखों में एक आदर और सम्मान भाव रखती है। आज 154वीं जयंती पर दैनिक जागरण परिवार महात्मा गांधी जी की 154वीं जयंती पर उन्हें शत-शत नमन करता है।

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