छतरपुर, राज्य ब्यूरो। बुंदेलखंड के तानसेन कहे जाने वाले पं. देशराज पटेरिया का शनिवार को निधन हो गया। लोकगीत सम्राट के रूप में उन्होंने बुंदेली बोली को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई थी। शुक्रवार को दिन में उन्हें दिल का दौरा पड़ा तो मिशन अस्पताल में भर्ती किया गया। स्थिति ज्यादा बिगड़ने पर उन्हें गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल के लिए रेफर किया गया, लेकिन इसके पहले ही 67 वर्षीय देशराज पटेरिया का निधन हो गया।

देशराज के रूप में शून्य में विलीन हो गया बुंदेलखंड का 'राग'

'कुल दिनन नई रै है, जौ तन माटी में मिल जै है' जैसे लोकगीत से जीवन की सच्चाई को देशराज पटेरिया सबके सामने सुरों में बांधकर गाते थे तो लोग एकाग्रचित्त होकर इसमें खो जाते थे।

मंचीय कार्यक्रमों में हजारों दर्शकों की भीड़ रातभर पटेरिया के लोकगीत सुनने के लिए जमी रहती थी

मंचीय कार्यक्रमों में हजारों दर्शकों की भीड़ रातभर उनके लोकगीत सुनने के लिए जिस तरह से जमी रहती थी ऐसा आकर्षण कम ही कलाकारों में होता है। 'उठो गोरी बोल रओ मंगरे पै कउआ, लगत तोरे मायके से आ रए लुबउआ' जैसे कई हास-परिहास के लोकगीतों का रंग जब मंचीय कार्यक्रमों में छलकता था तो दर्शक भी सुरों के साथ ताल देकर मैदान में थिरकने लगते थे।

देशराज पटेरिया की गायकी के कायल थे श्रोता 

देशराज पटेरिया के बुंदेली लोकगीतों की प्रस्तुतियों में ऐसा स्नेह, बुंदेली लोक से ऐसा जुड़ाव सब कुछ एक साथ देखने को मिलता था। उन्होंने बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विविधता व सभ्यता को बुंदेली लोक गायन के माध्यम से लोकगीत, फाग, दिवारी मौनिया, आल्हा गायन, राई नृत्य गायन सहित भजन गायन जैसे हर मोती को सुर-संगीत की माला में इस तरह से पिरोया कि श्रोता उनकी गायकी के कायल हो गए।

जब सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने कहा था-बुंदेली कलाकार आया है उसे बुलाओ

देशराज पटेरिया कई मंचों से एक रोचक किस्सा सुनाया करते थे। वे कहते थे हमेशा से मेरी ख्वाहिश लता मंगेशकर से मिलने की थी। एक बार वे किसी कार्यक्रम में भाग लेने मुंबई गए थे। वे लता दीदी के सामने पहुंचकर कहने वाले थे मैं बुंदेलखंड खजुराहो से लोकगीत कलाकार हूं, लेकिन उनके बोलने से पहले ही लता दीदी ने अपने पास खड़े एक व्यक्ति से कहा कि वो एक कलाकार है देशराज पटेरिया। बहुत अच्छा गाता है। उसको बुलाओ। देशराज पटेरिया ने कहा कि यह सुनकर मेरी आंखों में आंसू आ गए और मैंने कहा दीदी मैं देशराज पटेरिया हूं। दीदी ने सुना और उन्होंने हमें नेह भरी आंखों से देखा।

देशराज पटेरिया ने लोकगीतों का गायन 1972 में शुरू किया था, 10 हजार से ज्यादा लोकगीत गाए

10 हजार से ज्यादा लोकगीत गाए। वर्ष 1972 में देशराज पटेरिया ने मंचों से लोकगीत गाना शुरू कर दिया था, लेकिन उनको असली पहचान वर्ष 1976 में छतरपुर आकाशवाणी ने दी। जब उनके लोकगीत आकाशवाणी से प्रसारित होने लगे तो बुंदेलखंड में उनकी पहचान धीरे-धीरे बढ़ने लगी।

1980 में देशराज पटेरिया के लोकगीतों का जादू बुंदेलखंडवासियों की जुबान पर छा गए 

वर्ष 1980 आते-आते उनके लोकगीतों के ऑडियो कैसेट बाजार में आ गए। बुंदेलखंड में फिल्मी गीतों की जगह बुंदेली गीत बजने लगे या कहें देशराज पटेरिया के लोकगीतों का जादू बुंदेलखंडवासियों की जुबान पर दिखने लगा। वे दस हजार से ज्यादा लोकगीत गा चुके थे।

देशराज पटेरिया दिन में सरकारी नौकरी करते थे और रात में बुंदेली लोकगीतों का मंच सजाते थे

उनका जन्म 25 जुलाई 1953 में छतरपुर जिले की तिंदनी गांव में हुआ था। उन्होंने प्रयाग संगीत समिति से संगीत में प्रभाकर की डिग्री हासिल की। उनकी नौकरी स्वास्थ्य विभाग में लग गई थी, लेकिन मन बुंदेली लोकगीत गाने में ज्यादा रहता था। इसी कारण वे दिन में नौकरी करते थे और रात में बुंदेली लोकगीतों का मंच सजाते थे।

Edited By: Bhupendra Singh