हेमंत कश्यप, जगदलपुर। परलकोट के जमींदार गैंदसिंह को शहीद शिरोमणि की उपाधि हासिल है। ठाकुर गैंदसिंह छत्तीसगढ़ के पहले शहीद हैं। अंग्रेजों और तत्कालीन मराठा शासकों के अत्याचार के विरूद्ध उन्होंने आदिवासियों को एकजुट कर विद्रोह का बिगुल फूंक दिया था। 195 साल पहले 1825 को परलकोट स्थित उनके महल के सामने ही उन्हें फांसी पर लटका दिया गया था।

गैंदसिंह का बलिदान बस्तर की मुक्ति के लिए किए गए संघर्ष की मिसाल है

गैंदसिंह का बलिदान शोषण-अत्याचार के साथ बस्तर की मुक्ति के लिए किए गए संघर्ष की मिसाल है। विडंबना यह है कि आजादी के लिए छत्तीसगढ़ से सबसे पहले वीरगति प्राप्त करने वाले गैंदसिंह को वह सम्मान अब तक नहीं मिल पाया जिसके वे हकदार हैं। परलकोट जमींदार परिवार के सदस्य इस बात से आहत हैं और गुमनामी में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। बस्तर संभाग का वह इलाका जो महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की सीमा से सटा है उसे परलकोट कहा जाता है। परलकोट के इलाके में ही अब पखांजुर शहर और बंगलादेश से विस्थापित होकर आए बंगालियों के गांव हैं।

बंगालियों को दंडकारण्य प्रोजेक्ट के तहत बसाया गया 

बंगालियों को यहां दंडकारण्य प्रोजेक्ट के तहत बसाया गया है। भानुप्रतापपुर-अंतागढ़ मार्ग पर स्थित केवटी से करीब 76 किमी दूर है परलकोट वनांचल। परलकोट जमींदारी बस्तर रियासत के अधीन थी। अंग्रेज अफसर डी ब्रेट के अनुसार परलकोट के जमींदार को भूमिया राजा कहा जाता था। जनश्रुति है कि इनके पितृ पुरुष चट्टान से निकले थे। जमींदार मीनारायणपाटणा किले में रहते थे जिसके अवशेष आज भी वहां मौजूद हैं।

अबूझमाड़ियों को शोषण से बचाने के लिए उठाया था हथियार 

बस्तर में मराठों और ब्रिटिश अधिकारियों की वजह से अबूझमाड़िया आदिवासियों की पहचान संकट में थी। उनकी शोषण नीति से माडि़या तंग आ चुके थे। वह गैंदसिंह के नेतृत्व में अबूझमाड़ में ऐसे संसार की रचना करना चाहते थे जहां लूट खसोट और शोषण न हो। ठाकुर गैंदसिंह के आह्वान पर अबूझमाड़िया आदिवासी 24 दिसंबर 1824 को परलकोट में एकत्र होने लगे। क्रांतिकारी चार जनवरी 1825 ईस्वी तक अबूझमाड़ से चांदा तक छा गए। गैंदसिंह के नेतृत्व में विद्रोहियों ने सबसे पहले मराठों को रसद की पूर्ति करने वाले बंजारों को लूटा फिर मराठा तथा अंग्रेज अधिकारियों पर घात लगाना प्रारंभ कर दिया। यह आंदोलन परलकोट विद्रोह के नाम से इतिहास में दर्ज है।

गैंदसिंह के नेतृत्व में विद्रोही आदिवासी मराठा या अंग्रेज को पकड़कर बोटी-बोटी काट डालते थे

अबूझमाड़िया धंवड़ा वृक्ष की टहनियों को विद्रोह के संकेत के रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजते थे।जिनके लिए संदेश भेजा जाता उन्हें पत्तों के सूखने से पहले विद्रोह में शामिल होना पड़ता था। गैंदसिंह के नेतृत्व में विद्रोही आदिवासी किसी मराठा या अंग्रेज को पकड़ते थे तो उसकी बोटी-बोटी काट डालते थे। विद्रोह का संचालन अलग-अलग टुकडि़यों में क्षेत्र के मांझी करते थे। रात्रि में विद्रोही घोटुल में इकट्ठे होते और अगले दिन की योजना बनाते थे।

विद्रोहियों का लक्ष्य विदेशी सत्ता को धूल चटाना व बस्तर को गुलामी से मुक्त कराना था 

विद्रोहियों का प्रमुख लक्ष्य विदेशी सत्ता को धूल चटाना व बस्तर को गुलामी से मुक्त कराना था। अंग्रेज अफसर मिस्टर एन्यू के निर्देश पर चांदा पुलिस अधीक्षक कैप्टन पेव ने मराठा और अंग्रेज सेना के बल पर 12 जनवरी 1825 तक विद्रोह का बुरी तरह दमन कर दिया था। गैंदसिंह को गिरफ्तार कर 20 जनवरी 1825 को उनके परलकोट स्थित महल के सामने फांसी दे दी गई।

अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम शंखनाद करने वाले गैंदसिंह का बलिदान अविस्मरणीय है

अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम शंखनाद करने वाले परलकोट के जमींदार का बलिदान अनूठा और अविस्मरणीय है। जल-जंगल और जमीन का हक मांगने वाले बस्तरवासी आज भी उनका स्मरण कर गौरवान्वित महसूस करते हैं। इस जमींदारी परिवार के सदस्य आज भी जगदलपुर में अनुपमा टॉकीज के पास निवासरत हैं। जगदलपुर शहर में जहां विशाल जिला पुरातत्व संग्रहालय है, उस स्थान पर ही पहले परलकोट जमींदारी का बाड़ा था। इस बाड़ा में ही मृत्युपर्यंत बस्तर महाराजा प्रवीरचंद भंजदेव की पत्नी महारानी वेदवती निवास करती रहीं।

200वीं पुण्यतिथि को यादगार बनाएं

हल्बा समाज के संभागीय अध्यक्ष अर्जुन नाग तथा बस्तर प्रकृति बचाओ समिति के अध्यक्ष दशरथ सिंह कश्यप ने बताया कि 20 मार्च 2025 को शहीद शिरोमणि गैंदसिंह की 200वीं पुण्यतिथि होगी। बस्तर के इस महानायक की 200वीं पुण्यतिथि मनाने के लिए अभी से सामाजिक व शासकीय तौर पर वृहद योजना बनाने की दरकार है।

Posted By: Bhupendra Singh

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस