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    Environment News: सालों में विकसित जंगल को कुछ ही समय में खाक कर देती है एक छोटी सी चिंगारी

    By Monika MinalEdited By:
    Updated: Wed, 13 Apr 2022 04:31 PM (IST)

    वनाग्नि या दावानल एक ऐसी पर्यावरणीय समस्या है जो अल्प समय में ही किसी क्षेत्र विशेष की जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों को लील लेती है। जिस जंगल को विकसित होने में वर्षो लग जाते हैं उसे एक छोटी-सी चिंगारी कुछ ही समय में स्वाहा कर देती है।

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    सालों में विकसित जंगल को कुछ ही समय में खाक कर देती है एक छोटी सी चिंगारी

    नई दिल्ली [सुधीर कुमार]। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की एक हालिया एक रिपोर्ट में आने वाले वर्षो में दावानल की घटनाओं की आवृत्ति और उसकी गहनता बढ़ने की आशंका जताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2030 तक दावानल की घटनाओं में 14 प्रतिशत, 2050 तक 30 प्रतिशत, जबकि इस शताब्दी के अंत तक 50 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। वनाग्नि या दावानल एक ऐसी पर्यावरणीय समस्या है, जो अल्प समय में ही किसी क्षेत्र विशेष की जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों को लील लेती है। जिस जंगल को विकसित होने में वर्षो लग जाते हैं, उसे एक छोटी-सी चिंगारी कुछ ही समय में स्वाहा कर देती है। दुखद तो यह भी है कि आग की लपटों के बुझ जाने के लंबे समय बाद तक भी कुछ निर्धन देश उसके नुकसान की आंच ङोलने को अभिशप्त होते हैं।

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    इसलिए आवश्यक है जंगलों की रक्षा

    जंगलों की रक्षा इसलिए भी आवश्यक है, जिससे इन समुदायों की सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा संभव हो सके। जंगल की आग किसी भी राष्ट्र की आर्थिक, सामाजिक और सतत विकास की दिशा में अवरोध खड़े कर देती है। चिंता की बात यह है कि जलवायु परिवर्तन के कारण एक ओर जहां दावानल की घटनाओं में वृद्धि हुई है, वहीं दावानल की बढ़ती घटनाओं से जलवायविक दशाएं भी कठोरतम होती जा रही हैं। एक तरफ संयुक्त राष्ट्र 2021-2030 की अवधि को पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के दशक के रूप में आयोजित कर पारितंत्र के संरक्षण और पुनरुद्धार का आह्वान कर रहा है, तो दूसरी तरफ यह रिपोर्ट भविष्य की गंभीर चुनौती की ओर इशारा भी कर रही है। ऐसे समय में जब दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन का संकट गहराता जा रहा है, तब दुनिया के किसी भी हिस्से में जंगल में आग लगना पूरे विश्व के लिए बड़े खतरे का संकेत समझा जाना चाहिए। बेशक दावानल को लगने से प्राकृतिक तौर पर रोका नहीं जा सकता, लेकिन आपदा प्रबंधन पर जोर देकर उसके विकराल स्वरूप लेने और उससे होने वाली क्षति को कम जरूर किया जा सकता है।

    प्राकृतिक कारणों से जंगलों में लगती है आग

    जंगल में आग अमूमन गर्मी के दिनों में प्राकृतिक कारणों-जैसे बिजली गिरने, शुष्क हवाओं के चलने तथा पेड़ों के आपस में टकराने से स्वत: लगती रही है। भारत के जंगलों में 95 प्रतिशत आग लगने के पीछे प्राकृतिक वजहें ही जिम्मेदार मानी जाती हैं, लेकिन हाल के वषों में कुछ मानवीय करतूतों की वजह से भी जंगलों को सुलगना पड़ा है, जिन पर शायद पर्याप्त गौर नहीं किया जाता।जंगल की आग अत्यंत खतरनाक होती है, जो प्राणि जगत और वनस्पितयों के लिए काल बनकर उभरती है और इनकी एक लंबी श्रृंखला पलभर में ही समाप्त हो जाती है। अत: भारत समेत दुनिया के सभी देशों को दावानल पर ठोस नीति बनानी होगी, तभी जाकर पर्यावरण को सही मायनों में संरक्षित किया जा सकेगा।

    (लेखक बीएचयू में शोधार्थी हैं)