नई दिल्ली [जागरण विशेष]। उर्दू के मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, भारत व पाकिस्तान में ही नहीं पूरी दुनिया में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उनकी क्रांतिकारी रचनाओं में इंकलाबी और रूमानी रसिक भाव का मेल है। फ़ैज़ के शेरों में जितने रंग दिखाई देते हैं, उनकी निजी जिंदगी के भी उतने ही आयाम हैं। फ़ैज़ ब्रिटिश सेना में कर्नल रहे, पाकिस्तान के दो प्रमुख अखबारों के संपादक रहे। उन्होंने राजनीति भी की और पाकिस्तानी सरकार में तख्ता पलट के लिए पांच साल जेल में भी गुजारे। देश से निकाले गए और फिर पाकिस्तान समेत दुनिया भर में सम्मान प्राप्त किया। आज ही के दिन 20 नवंबर 1984 को फ़ैज़ का निधन हुआ था। उनकी पुण्यतिथि पर हम आपको उनकी जिंदगी के कुछ ऐसे पहलुओं से रूबरू करा रहे हैं, जिनके बारे में कम ही लोग जानते हैं।

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का जन्म 13 फरवरी 1911 को सियालकोट के एक गरीब परिवार में हुआ था, जो उस वक्त भारत के पंजाब प्रांत का हिस्सा हुआ करता था। अब ये पाकिस्तान में है। वर्ष 1936 में वह प्रेमचंद, मौलवी अब्दुल हक, सज्जाद जहीर और मुल्क राज आनंद द्वारा स्थापित प्रगतिशील लेखक संघ में शामिल हुए। फ़ैज़ प्रतिबद्ध मार्क्सवादी थे। 1930 में उन्होंने ब्रिटिश महिला एलिस से प्रेम विवाह किया था।

फ़ैज़ का करियर
फ़ैज़ के शेरों का पहला संग्रह 1936 में ‘नक्श-ए-फरयादी’ के नाम से प्रकाशित हुआ। इस दौरान वह ‘अदब-ए-लतीफ’ के संपादक भी रहे। 1940 में वह लाहौर के हैली कॉलेज ऑफ कॉमर्स में लेक्चरर बने। वर्ष 1942-1947 तक वह ब्रिटिश सेना में कर्नल रहे। सेना की नौकरी में मन नहीं लगा तो उन्हें इस्तीफा दे दिया और पाकिस्तान टाइम्स व इमरोज अखबारों में बतौर संपादक, पत्रकारिता की। वह राजनीति में भी सक्रिय रहे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजदूरों की आवाज उठाई।

शांति पुरस्कार मिला और निर्वासन भी
पाकिस्तान में अपनी कटाक्ष लेखनी की वजह से उन्हें वर्ष 1951 से 1955 तक जेल में भी रहना पड़ा। जेल में उन्होंने कई कविताएं और शेर लिखे, जो ‘दस्ते सबा’ और ‘जिंदानामा’ में प्रकाशित हुईं थीं और दुनिया भर में उन्हें मशहूर कर दिया। जेल से निकलकर 1962 तक वह लाहौर में पाकिस्तान आर्ट्स काउंसिल के सदस्य रहे। वर्ष 1963 में सोवियत-संघ (रूस) ने उन्हें लेनिन शांति पुरस्कार प्रदान किया।

वह नोबल पुरस्कार के लिए भी नामित किए गए थे। 1965 भारत-पाक युद्ध के समय वह पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय विभाग में अधिकारी थे। लियाकत अली खां की सरकार के तख्तापलट के लिए उन्हें 1977 में कई बरसों के लिए मुल्क़ से बेदख़ल कर दिया गया। 1978 से लेकर 1982 तक का दौर उन्होंने निर्वासन में गुज़ारा।

सांडर्स की हत्या के चश्मदीद गवाह थे
भगत सिंह और उनके साथियों ने जब लाहौर में सांडर्स की गोली मारकर हत्या की और फिर वहां से भाग निकले, तो क्रांतिकारियों की पिस्तौल से चली गोली की आवाज सुनने और उन्हें भागते हुए देखने वालों में फ़ैज़ भी शामिल थे। उस वक्त वह अपने कॉलेज के हॉस्टल की छत पर टहल रहे थे। इसी दौरान उन्हें गोली की आवाज सुनाई दी और वह इस ऐतिहासिक पल के चश्मदीद गवाह बन गए। आजादी के साथ पाकिस्तान अलग हो गया, लेकिन फ़ैज़ के लिए धरती पर सबसे पसंदीदा और प्रभावित करने वालों में भगत सिंह का नाम हमेशा शामिल रहा।

उनकी लोकप्रिय नज्में...
दिल में अब यूँ तेरे भूले हुये ग़म आते हैं
दिल में अब यूँ तेरे भूले हुये ग़म आते हैं
जैसे बिछड़े हुये काबे में सनम आते हैं
इक इक कर के हुये जाते हैं तारे रौशन
मेरी मन्ज़िल की तरफ़ तेरे क़दम आते हैं
रक़्स-ए-मय तेज़ करो, साज़ की लय तेज़ करो
सू-ए-मैख़ाना सफ़ीरान-ए-हरम आते हैं
कुछ हमीं को नहीं एहसान उठाने का दिमाग
वो तो जब आते हैं माइल-ब-करम आते हैं
और कुछ देर न गुज़रे शब-ए-फ़ुर्क़त से कहो
दिल भी कम दुखता है वो याद भी कम आते हैं

वो लोग बहुत खुश-किस्मत थे
वो लोग बहुत खुश-किस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे
हम जीते जी मसरूफ रहे
कुछ इश्क़ किया, कुछ काम किया
काम इश्क के आड़े आता रहा
और इश्क से काम उलझता रहा
फिर आखिर तंग आ कर हमने
दोनों को अधूरा छोड दिया

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Posted By: Amit Singh

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