ऋषि गुप्ता। हाल में नेपाल इलेक्ट्रिसिटी अथारिटी ने एक वक्तव्य में कहा कि पिछले चार महीनों में नेपाल ने 56 मिलियन डालर कीमत की बिजली भारत को बेची है, जिसे आने वाले दिसंबर महीने में 234 मिलियन डालर तक पहुंचने का अनुमान है। यह पहली बार है जब नेपाल इतनी ज्यादा मात्रा में भारत को बिजली की बिक्री कर रहा है।

नेपाल के पास जल स्रोत अधिक हैं, जिनमें लगभग 6,000 नदियां भी शामिल हैं, लेकिन निवेश का अभाव, निजी सेक्टर की अल्प रुचि एवं तकनीकी मोर्चे पर पिछड़ेपन के चलते नेपाल अपनी अनुमानित 47,000 मेगा वाट बिजली की क्षमता का दस प्रतिशत भी उत्पादन नहीं करता है। हालांकि पिछले सात वर्षों में भारत और चीन ने नेपाल के कई विद्युत उत्पादन संयंत्रों में निवेश किया है, लेकिन अभी भी नेपाल की अस्थिर राजनीति ने पन बिजली के उत्पादन से होने वाले आर्थिक फायदे को रोक रखा है।

बांग्लादेश एक मजबूत आर्थिक शक्ति बनकर उभर रहा

इस वर्ष अप्रैल के महीने में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नेपाल की यात्रा की थी। तब भारत-नेपाल के बीच विद्युत क्षेत्र में सहयोग पर एक संयुक्त विजन वक्तव्य जारी हुआ था। उसमें दोनों देशों को पावर सेक्टर से होने वाले पारस्परिक फायदे की बात कही गई थी। बिजली क्षेत्र में हुआ करार न केवल भारत और नेपाल के संबंधों को मजबूत करता है, बल्कि यह नेपाल और बांग्लादेश के बीच विद्युत व्यापार को स्थापित करने में भी मदद करता है। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने हाल में अपनी भारत यात्रा के दौरान भारत के जरिये नेपाल और भूटान से बिजली की आपूर्ति का अनुरोध किया था। दक्षिण एशियाई देशों में बांग्लादेश एक मजबूत आर्थिक शक्ति बनकर उभर रहा है। इस गति को बनाए रखने के लिए उसे बिजली की ज्यादा मात्रा में आवश्यकता है। यदि बांग्लादेश भारत के रास्ते नेपाल और भूटान से अपनी विद्युत की मांग को पूरा कर पाया तो इससे न केवल भारत को विद्युत संप्रेषण से आय अर्जित करने में मदद मिलेगी, बल्कि दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने में भारत की भूमिका भी बढ़ेगी।

चीन नेपाल में विद्युत क्षेत्र में निवेश करने को सक्रिय

ज्ञात है कि दक्षिण एशिया क्षेत्रीय व्यापार के मामले में बहुत कम जुड़ा हुआ है। दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (दक्षेस) आज मरणासन्न अवस्था में है, जिसका मुख्य कारण पाकिस्तान का आतंकवाद को बढ़ावा देना है। 2014 के बाद से दक्षेस देशों की एक भी सालाना बैठक नहीं हुई है। पाकिस्तान के बिगड़ते स्वरूप के चलते भारत ने क्षेत्रीय सहयोग में आ रही कमी को तमाम माध्यमों से पूरा करने का अथक प्रयास किया है जिनमें बिम्सटेक (बंगाल की खाड़ी बहु-क्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग पहल), बीबीआइएन (बांग्लादेश-भूटान-भारत-नेपाल मोटर वाहन समझौता) जैसे मंचों का काफी योगदान रहा है। इन्हीं प्रयासों को आगे ले जाते हुए अगर भारत नेपाल और भूटान को बांग्लादेश तक बिजली आपूर्ति करने में मदद करता है तो यह क्षेत्रीय सहयोग को एक नई दिशा देने वाला कदम होगा।

भारत, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश के बीच विद्युत क्षेत्र में यह सहयोग कई अन्य तरह के समीकरणों को भी साधेगा, जिसमें पड़ोसी देशों के अलावा भी अन्य शक्तियां शामिल हैं। ज्ञात हो कि फरवरी महीने में नेपाल ने अमेरिका के साथ 500 मिलियन डालर के सहयोग वाले एमसीसी (मिलेनियम चैलेंज कारपोरेशन) समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस सहायता के अंतर्गत अमेरिका नेपाल में गरीबी उन्मूलन और विकास के साथ पावर ट्रांसमिशन लाइंस का भी निर्माण करेगा, जिससे नेपाल को भारत को विद्युत की आपूर्ति करने में काफी मदद मिलेगी। हालांकि चीन भी नेपाल में विद्युत क्षेत्र में निवेश करने को लेकर काफी सक्रिय है, लेकिन यह केवल नेपाल की घरेलू खपत तक ही सीमित रहेगा, क्योंकि भारत चीन द्वारा पैदा की जाने वाली बिजली को अपने बाजार में लाने को लेकर सहज नहीं है, जिसके तमाम कारण हैं।

ऐसे में चीनी सहयोग से उत्पादित अतिरिक्त पावर सप्लाई बाजार की कमी के चलते चीन के लिए एक घाटे का सौदा साबित होगी। कुल मिलाकर भारत-नेपाल के बीच बिजली क्षेत्र में बढ़ती नजदीकी दोनों देशों के बीच परंपरागत ‘खास संबंधों’ को और मजबूती प्रदान करेगी। कई दशकों से नेपाल भारत के साथ व्यापार घाटे के मुद्दे को उठाता रहा है, लेकिन नेपाल में मैन्यूफैक्चरिंग की कमी के चलते इसका कोई मजबूत समाधान नहीं निकला जा सका है। अब विद्युत के निर्यात से नेपाल भविष्य में भारत के साथ व्यापार में बराबरी कर पाएगा।

[रिसर्च फेलो, एशिया सोसायटी पालिसी इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली]

Edited By: Sanjay Pokhriyal

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