अलनीनो का डबल अटैक: खरीफ के बाद अब रबी की फसलों पर मंडराया संकट
अलनीनो का असर खरीफ के बाद अब रबी फसलों पर भी पड़ सकता है, जिससे गेहूं, चना और सरसों की बुवाई व उत्पादकता प्रभावित होगी।

अलनीनो से रबी फसलों की बुवाई और उत्पादकता प्रभावित होने का खतरा

समय कम है?
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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। अगले वर्ष फरवरी तक प्रभावी रहने वाले अलनीनो का असर खरीफ फसलों के बाद अब रबी पर भी पड़ सकता है। कमजोर मानसून से बारिश की कमी, मिट्टी में घटती नमी और सिंचाई के पानी की उपलब्धता में गिरावट से गेहूं, चना एवं सरसों जैसी प्रमुख फसलों की बुवाई और उत्पादकता प्रभावित हो सकती है।
महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में कम बारिश का असर दलहन एवं तिलहन की खेती पर दिखने भी लगा है। ऐसे में कृषि संकट के बीच खाद्य महंगाई को नियंत्रित रखने और किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य दिलाने के बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी।
मिट्टी में नमी की कमी प्रमुख कारण
भारत में कृषि अभी भी मानसूनी बारिश पर निर्भर है। इस साल मानसूनी बारिश सामान्य से 13 प्रतिशत कम हुई है। वर्षा का वितरण भी समान नहीं है। कई क्षेत्रों में वर्षा की कमी 40 से 60 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
इससे खरीफ फसलों के उत्पादन पर दबाव बढ़ा है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और राजस्थान में कम बारिश का असर खासकर दलहन और तिलहन की खेती पर भी पड़ता हुआ दिख रहा है।
इन क्षेत्रों में जलाशयों और मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं होने से रबी की बुवाई भी प्रभावित हो सकती है। महाराष्ट्र में 265 तालुकों में सूखे की घोषणा भी की जा चुकी है।
आम तौर पर किसान खरीफ फसलों की कटाई के बाद रबी फसलों की बुवाई करते हैं। इसके लिए अक्टूबर-नवंबर के महीने को अच्छा माना जाता है। रबी फसलों की बुवाई मिट्टी की नमी एवं सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी पर निर्भर करती है।
कृषि विज्ञानियां का अनुमान है कि नमी कम होने पर किसान बुवाई टाल सकते हैं या रकबा घटा सकते हैं। गेहूं के लिए सर्दियों की अनुकूल परिस्थितियां और पर्याप्त सिंचाई जरूरी हैं।
चना और सरसों जैसी फसलें कम पानी में भी उगाई जा सकती हैं, लेकिन लंबे समय तक नमी की कमी से इनकी पैदावार भी प्रभावित होती है।
महंगाई नियंत्रण सरकार की चुनौती
भारत मौसम विभाग (आइएमडी) ने अलनीनो को अगले वर्ष फरवरी तक प्रभावी माना है। अगर यह अनुमान सही निकला तो वर्षा कम होने की स्थिति में कृषि उत्पादन पर दबाव और बढ़ सकता है।
ऐसी स्थिति में केंद्र एवं राज्य सरकारों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। राज्यों की ओर से सूखा प्रभावित क्षेत्रों में राहत के साथ केंद्र को भी फसल क्षति का आकलन, सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता और किसानों की कर्ज चुकाने की क्षमता पर ध्यान देना होगा।
सरकार ने फसल विविधीकरण की नीति के तहत इस बार गेहूं के एमएसपी में सिर्फ 25 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि की है। गेहूं की खेती में सबसे ज्यादा पानी की जरूरत पड़ती है।
दलहन-तिलहन का उत्पादन बढ़ाने के लिए मिशन चलाए जाने के बावजूद खाद्य तेलों में आयात निर्भरता और दालों के आयात की जरूरत बताती है कि घरेलू उत्पादन बढ़ाने की रणनीति को अधिक प्रभावी बनाने की जरूरत है।
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