रबी फसलों पर भी मंडराया अलनीनो का संकट! गेहूं, सरसों और चने को लेकर कृषि सचिव की बड़ी चेतावनी
अल-नीनो के प्रभाव से खरीफ फसलों की बुवाई में कमी आई है, और कृषि सचिव ने आगामी रबी सीजन के ...और पढ़ें

रबी फसलों पर भी दिखा अलनीनो का खतरा
HighLights
अल-नीनो से खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित, रबी पर भी संकट।
कृषि सचिव ने गेहूं, दालों, तिलहन पर अल-नीनो के असर की चेतावनी।
किसानों से फसल विविधीकरण अपनाने और आय सुधारने पर जोर।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| अल-नीनो के प्रभाव के चलते खरीफ सीजन की फसलों की बुवाई में कमी देखी गई है, जिसका असर पैदावार में भी देखने को मिलेगा। वहीं कृषि सचिव ने आगामी रबी सीजन की फसलों पर भी अल-नीनो के खतरे की आशंका जताई है। कृषि सचिव आतिश चंद्र ने सोमवार को कहा कि अल नीनो मौसम पैटर्न के कारण आगामी रबी (शीतकालीन) मौसम बारिश आधारित क्षेत्रों के लिए चुनौतीपूर्ण रहने की संभावना है और इससे खाद्यान्न के प्रोडक्शन पर भी प्रभावित देखने को मिल सकता है।
रबी मौसम की तैयारियों पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान अपने संबोधित में कृषि सचिव ने कहा कि खरीफ का मौसम भी बहुत चुनौतीपूर्ण रहा है, खासकर वर्षा से आधारित क्षेत्रों में। कई राज्यों को पहले फसल ढंकने में और बाद में फसलों के की ग्रोथ बनाए रखने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा।
गेहूं और दलहन-तिलहन पर होगा असर?
आतिश चंद्र ने बताया कि भारत ने अनाज के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है, लेकिन वह दालों, तिलहन और कुछ बागवानी उत्पादों का आयात करना जारी रखता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक रबी की फसलें सामान्यतः लगभग 638 लाख हेक्टेयर के कुल क्षेत्रफल में बोई जाती हैं, जिनमें से गेहूं 300 लाख हेक्टेयर से अधिक, दालें 140 लाख हेक्टेयर, तिलहन 87 लाख हेक्टेयर और मोटे अनाज 55 लाख हेक्टेयर में बोए जाते हैं।
फसलों के डायवर्सिफिकेशन पर जोर
चंद्र ने आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए किसानों से फसल विविधीकरण (Crop diversification) अपनाने की अपील की है, हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इसमें रिसर्च मेथन, जलवायु अनुकूलन क्षमता और किसानों की इनकम से जुड़ी बाधाएं शामिल होंगी।
ये भी पढ़ें: भारतीय चीनी को लेकर अमेरिका से आई गुड न्यूड, कम ड्यूटी के साथ बढ़ाया 542 टन निर्यात का एक्स्ट्रा कोटा!
उन्होंने आगे कहा कि डायवर्सिफिकेशन को लगातार कृषि के साथ-साथ चलना चाहिए, जो सरकार की दूसरी प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि 'प्रति बूंद अधिक फसल' और मृदा स्वास्थ्य कार्यक्रमों जैसी पहल शुरू की गई हैं, लेकिन इनका जमीनी स्तर पर मूल्यांकन किया जाना चाहिए, न कि केवल सब्सिडी वितरण के दृष्टिकोण से। इसके असावा कृषि सचिव ने राज्य सरकारों से किसानों की आय में सुधार लाने वाले रिजल्ट पर अधिक ध्यान देने का आग्रह किया।
