नई दिल्‍ली, अंशु सिंह। Eco-Friendly Green Homes केरल के कन्नूर जिले के हरि एवं आशा एक ऐसा आशियाना बनाना चाहते थे, जो प्रकृति से जुड़ा हो और टिकाऊ भी। उनकी इस ख्वाहिश को एक आर्किटेक्ट मित्र ने पूरा कर दिखाया। जंगल के मध्य एक ऐसे घर का निर्माण हुआ, जिसकी दीवारें मिट्टी से बनी थीं। जहां बिजली के पंखों की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती थी। रौशनी भी पर्याप्त आती थी। इस तरह बीते 14-17 वर्षों से दोनों इस घर में आनंदपूर्वक रह रहे हैं। हरि बताते हैं कि घर में सोलर पैनल लगे हैं, जिससे टीवी, कंप्यूटर एवं अन्य उपकरण चलते हैं। रसोई भी बायोगैस से संचालित होती है अर्थात् कचरे से ही ईंधन तैयार कर लिया जाता है। इसके अलावा, सब्जियां आदि खुद ही उगा लेते हैं। जब स्वस्थ आहार एवं श्वास लेने के लिए हवा शुद्ध मिले, तो शरीर की व्याधि भी नहीं सताती। कई वर्ष हो गए, दवा की जरूरत तक नहीं पड़ी।

सस्टेनेबल लिविंग का बढ़ा चलन: ‘सस्टेनेबल लिविंग’ एक ऐसी जीवनशैली है, जिसमें इंसान प्रकृति के संग अधिक सद्भावपूर्ण तरीके से जीवन जीता है। प्रकृति से प्राप्त होने वाली चीजों का कम से कम दोहन करता है। तभी इसे‘लिविंग विद नेचुरल हारमनी’भी कहा जाता है। लोग अपने वातावरण को प्रदूषित नहीं करते और उन वस्तुओं से परहेज करते हैं,जिनसे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। वैश्विक जलवायु संकट को देखते हुए इसे अपनाने वाली मिसालें दिन-प्रतिदिन बढ़ रही हैं। जैसे सिलीगुड़ी (बंगाल) की पर्यावरण प्रेमी एवं लाइफकोच वर्षा को ही लें। इन्होंने अपने घर की दीवारों में ईंट की जगह मिट्टी एवं क्ले ब्लॉक्स का प्रयोग किया है। उस पर कोई प्लास्टर या पेंट नहीं लगाया है। फर्श भी कोटा एवं क्ले टाइल्स से बनाये गए हैं। सोलर पैनल्स से ही ऊर्जा की जरूरतें पूरी होती हैं। वह कहती हैं,‘पर्यावरण संरक्षण के प्रति समाज की जिम्मेदारी और भी गंभीर हो गई है। हमें गो ग्रीन, रिड्यूस, रीयूज, रीसाइकिल..‘जैसे नारों या विकल्पों से आगे निकलकर इसे अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाना होगा। मैंने अपने स्तर पर अनेक परिवर्तन लाये हैं। इको फ्रेंडली घर में रहती हूं। किचन गार्डन में ही उपयोग लायक सब्जियां उगा लेती हूं। उसके लिए खाद का इंतजाम भी घर के कचरे से हो जाता है।'इनकी मानें,तो आहिस्ता ही सही, लोग अपने कार्बन फुटप्रिंट को लेकर सचेत हो रहे हैं। पारंपरिक या प्रदूषणकारी उत्पादों के स्थान पर इकोफ्रेंडली वस्तुओं के इस्तेमाल एवं घरों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

बैंबू से टिकाऊ घरों का निर्माण: हैदराबाद के प्रशांत लिंगम एवं अरुणा भी प्रकृति प्रेमी रहे हैं। शादी के बाद जब दोनों अपने घर के लिए इको फ्रेंडली फर्नीचर तलाश कर रहे थे, तो उन्हें काफी मायूसी हाथ लगी। कई तरह की खोजबीन एवं बाजार के अध्ययन के बाद वर्ष 2006 में इन्होंने ‘बैंबू हाउस इंडिया’ की स्थापना की। यहां ये बैंबू (बांस) से इकोफ्रेंडली एवं एनर्जी एफिशिएंट घरों का निर्माण करते हैं। बताते हैं प्रशांत,‘बीते कुछ वर्षों में निश्चित तौर पर सस्टेनेबल निर्माण एवं लिविंग को लेकर एक उत्सुकता देखी जा रही है। लेकिन बैंबू के घर को लेकर लोगों में अब भी उतना भरोसा उत्पन्न नहीं हो सका है। वे इसे एक सस्ता टिंबर मानते हैं, जो शायद उतना टिकाऊ नहीं हो सकता। इसलिए ऐसे घरों के निर्माण पर अधिक ध्यान नहीं देते, जबकि यह धारणा बिल्कुल गलत है। बैंबू के घर न सिर्फ 20 से 25 वर्ष तक टिक सकते हैं, बल्कि इसके निर्माण एवं देखरेख पर न्यूनतम खर्च आता है। जैसे,12 x12 वर्गफीट के एक कमरे को बनाने में तकरीबन डेढ़ लाख रुपये का खर्च आता है। इतना ही नहीं, ऐसे घर कंक्रीट की तुलना में ठंडे (2 से 3 डिग्री कम तापमान) भी होते हैं।

जानकारी के अभाव एवं समाज की उदासीनता के बावजूद प्रशांत और अरुणा ने हार नहीं मानी है। विभिन्न कार्यशालाओं एवं अपने वेबसाइट के जरिये वे जागरूकता लाने का प्रयास कर रहे हैं। साथ ही, अपने प्रोडक्ट में निरंतर इनोवेशन कर रहे हैं। मसलन,घर के निर्माण में बैंबू मैट बोर्ड, रीसाइकिल प्लास्टिक बोर्ड्स, पाइन वुड वेस्ट आदि इस्तेमाल किये जा रहे हैं। अब तक ये हैदराबाद, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र में 400 से अधिक घऱ बना चुके हैं।

इको-फ्रेंडली सामग्री से बनाते घर: गुजरात के वडोदरा निवासी मनोज पटेल तड़क-भड़क से दूर सामान्य जीवन जीने में विश्वास करते हैं। साइकिल से या पैदल चलना इन्हें काफी पसंद है। रुचि भी इकोफ्रेंडली होम डिजाइनिंग में है। उसमें दक्षता रखते हैं। गांव की मिट्टी से जुड़े रहने के कारण जुगाड़ तकनीक का अच्छा ज्ञान है। आर्किटेक्चर की पढ़ाई के दौरान इनके पास जब भी डिजाइनिंग की कोई समस्या आती थी, तो वे न्यूनतम साधनों व संसाधनों का उपयोग कर उसका हल निकालने का प्रयास करते थे। घरों को ऐसे डिजाइन करते थे, जिनमें ऊर्जा की खपत कम से कम हो और जो स्थानीय स्तर पर उपलब्ध निर्माण सामग्री (लाल चिकनी मिट्टी आदि) से बन सकते हों। अपनी विशेषज्ञता को और धार देने के लिए अहमदाबाद स्थित सीईपीटी से क्लाइमेट चेंज एवं सस्टेनेबिलिटी में परास्नातक करने वाले और अब तक 37 से अधिक इको फ्रेंडली घरों का निर्माण कर चुके मनोज बताते हैं, ‘हरेक निर्माण सामग्री का पर्यावरण पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। जैसे कोई भी घर बनाते समय हमें ध्यान रखना होता है कि किस तरह की सामग्री का प्रयोग करने से गर्मियों में एसी का कम से कम प्रयोग हो सकेगा, घर में रौशनी के पर्याप्त साधन होंगे, जिससे अधिक लाइट्स जलाने की आवश्यकता न पड़े। इनकी मानें, तो ये जीरो ऑपरेशन कॉस्ट पर लोगों के लिए सस्टेनेबल ग्रीन होम्स डिजाइन करते हैं। निर्माण सामग्री को लेकर इन्होंने कई प्रकार के प्रयोग एवं इनोवेशन किये हैं। जैसे ये रीयूजेबल सामग्री, इकोफ्रेंडली क्ले रूफ टाइल्स (मैंग्लोर क्ले रूफ टाइल्स), टेराकोटा इत्यादि का इस्तेमाल करते हैं, जो न सिर्फ हल्के एवं टिकाऊ होते हैं, बल्कि सीमेंट या सिरामिक टाइल्स की अपेक्षा इनकी इंस्युलेशन (ताप रोधन क्षमता) भी बेहतर होती है। इससे गर्मियों में भी कमरे का तापमान अधिक नहीं होता। वे कहते हैं, ‘हम बाकायदा रिसर्च एवं एक्सपेरिमेंट कर कोई भी नया प्रोडक्ट तैयार करते हैं। इसके बाद ही घर के निर्माण में उनका प्रयोग किया जाता है।‘

पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं बैंबू के घर: हैदराबाद के बैंबू हाउस इंडिया सह-संस्थापक अरुणा ने बताया कि बैंबू (बांस) एक खास किस्म की वनस्पति है, जिससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। अन्य पौधों एवं वृक्षों की अपेक्षा इसकी ग्रोथ जल्दी (चार वर्ष में) होती है। इससे वनों की कटाई जैसी समस्या नहीं आती। यह मिट्टी के कटाव को भी रोकता है। सबसे बड़ी बात यह कि भारत बैंबू का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। बावजूद इसके पूरा क्षेत्र असंगठित होने के कारण कई तरह की कमियां हैं यहां। करीब डेढ़ साल के सर्वे में हमने जाना कि कैसे शोधकर्ता, कारीगर से लेकर अन्य लोग अपने-अपने स्तर पर कार्य कर रहे हैं। बैंबू के फर्नीचर तो खूब बनाए जा रहे हैं, लेकिन जब इससे घर बनाने की बात आती है, तो स्थिति खास उत्साहजनक नहीं दिखाई देती। लोगों को इस बारे में कोई जागरूक करने वाला भी नहीं कि इससे मजबूत घरों का निर्माण हो सकता है। अपने वेंचर के जरिये हमने इसी खाई को दूर करने का प्रयास किया है।

हां, शुरुआत में कुछ चुनौतियां जरूर रहीं। जैसे बैंबू लगाने से लेकर इसे एक से दूसरे राज्य में ले जाना आसान नहीं है। अलग-अलग राज्यों के अपने नियम एवं कानून हैं। वन विभाग से आधिकारिक मंजूरी लेनी पड़ती है। कारीगरों की बात करें, तो वे भी गृह निर्माण से अधिक फर्नीचर बनाने पर जोर देते हैं। लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। उनके लिए रोजगार के नये विकल्प खुले हैं। हमारे साथ हुनरमंद कारीगरों की एक पूरी टीम है, जिनकी आर्थिक स्थिति में काफी सुधार आ रहा है। लोगों को भी कंक्रीट के घर के बीच एक अतिरिक्त इको फ्रेंडली कमरा या स्थान मिल जा रहा। आज कई कॉरपोरेट हाउस, रेस्तरां, कैफे, स्कूल आदि में बैंबू कंस्ट्रक्शन करा रहे हैं।

‘क्ले ब्लॉक्स’ से कम होगी बिजली की खपत: वडोदरा के एमपीडीएस संस्थापक मनोज पटेल ने बताया कि हम अक्सर सुनते हैं कि बड़े शहरों में ग्रामीण इलाकों की तुलना में दिन में गर्मी बहुत ज्यादा रहती है। कई बार रात में भी पारा चढ़ा हुआ ही रहता है। यह ‘अर्बन हीट आइलैंड’ बनने के कारण होता है। शहर में होने वाले निर्माण कार्य, गाड़ियों का प्रदूषण, बड़ी-बड़ी शीशे की इमारतों (एसी युक्त) से निकलने वाली गर्मी वातावरण में बनी रहती है। सूर्य की किरणें भी प्रतिबिंबित होकर इसी वातावरण में रहती हैं, जिससे तापमान में गिरावट नहीं आती है। दूसरी ओर, ग्रामीण क्षेत्रों में मिट्टी की प्रचुरता सूरज के रेडिएशन को सोखने में सहायक होती है। इसलिए हम शहरों में घर बनाते समय ‘क्ले बॉक्स का’ प्रयोग कर रहे हैं, जिससे कि वह गर्मी को सोख सके।

 

नतीजा यह होता है कि घर के अंदर या आसपास उतनी तपिश महसूस नहीं होती और बदले में ऊर्जा की बचत हो जाती है सो अलग। हां, इसके लिए जरूरी है कि देश में ‘क्ले रूफ टाइल्स’ उद्योग को मृतप्राय होने से बचाये जाये। क्योंकि एक समय में अकेले गुजरात में जहां 300 से अधिक फैक्ट्रियां थीं। आज की तारीख में वे मात्र 5 या 6 रह गईं हैं। दूसरी ओर, ग्लास, स्टील, एल्युमिनियम का बहुतायत में उत्पादन किया जा रहा है। मेरा मानना है कि अगर हम इको फ्रेंडली डिजाइन एवं तकनीक को बढ़ावा दें, तो पर्यावरण को होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। फिलहाल, हमारी कोशिश है कि हम अधिक से अधिक आर्किटेक्ट्स के साथ ग्रीन प्रोजेक्ट्स कर, शहरों में विकसित हो रहे ‘अर्बन हीट आइलैंड्स’ को कम कर सकें।

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