Trending

    Move to Jagran APP
    pixelcheck
    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    धूल का बवंडर हर साल ले रहा 70 लाख लोगों की जान, रिपोर्ट में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

    Updated: Mon, 14 Jul 2025 09:47 PM (IST)

    जलवायु परिवर्तन के कारण रेत और धूल भरी आंधी स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए गंभीर समस्या बन रही है। इससे 150 से अधिक देशों के 33 करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित हैं और हर साल 70 लाख लोगों की अकाल मृत्यु हो रही है। वायुमंडल में हर साल लगभग दो अरब टन धूल फैलती है। संयुक्त राष्ट्र ने 2025-2034 को धूल भरी आंधी से निपटने का दशक घोषित किया है।

    Hero Image
    हर साल 70 लाख लोगों को लील जाता है धूल का बवंडर। (फाइल फोटो)

    एएआई, जिनेवा। कभी रूपक की तरह इस्तेमाल होने वाली गांवों की पगडंडियों की उठती धूल आज दुनिया भर के देशों के लिए बड़ी शूल बन चुकी है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के आंकड़े बताते हैं कि साल भर उठने वाले धूल के बवंडर से हमारा वायुमंडल धूसरित हो चुका है।

    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    आलम यह है कि ऑक्सीजन के साथ धूल के कण हमारे फेफड़ों को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा रहे हैं। इसके चलते हर साल 70 लाख लोग कम आयु में ही काल-कवलित हो रहे हैं और 33 करोड़ लोग गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं।

    रिपोर्ट में हुए कई खुलासे

    अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र के विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की एक ताजा रिपोर्ट में उजागर हुआ है कि जलवायु परिवर्तन के कारण रेत और धूल भरी आंधी गंभीर स्वास्थ्य और पर्यावरणीय समस्याएं पैदा कर रही है और 150 से अधिक देशों के 33 करोड़ से ज्यादा लोगों को बुरी तरह प्रभावित कर रही है और इससे 70 लाख लोगों की अकाल मृत्यु होती है।

    संगठन का कहना है कि वर्ष में लगभग दो अरब टन धूल वायुमंडल में फैलती है और इससे स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण को काफी नुकसान हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2025 से 2034 को रेत और धूल भरी आंधी से निपटने के लिए कार्रवाई का दशक घोषित किया है।

    धुल भरी आंधियां बन रहीं बड़ी चुनौती

    महासभा अध्यक्ष फिलेमोन यांग ने कहा, ''जलवायु परिवर्तन, भूमि क्षरण और प्रकृति से छेड़छाड़ के परिणामस्वरूप ये धूल भरी आंधियां तेजी से दूरगामी वैश्विक चुनौतियों में से एक बनती जा रही हैं। इनकी सबसे अधिक अनदेखी की गई।''

    डब्ल्यूएमओ की महासचिव सेलेस्टे साउलो ने कहा कि इनका प्रभाव ²श्यता संबंधी समस्याओं से कहीं आगे तक जाता है। उन्होंने कहा कि ये जन स्वास्थ्य को काफी प्रभावित करती हैं और कृषि, परिवहन और सौर ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्त्रोतों को भी प्रभावित करती हैं।

    हर साल लगभग 70 लाख लोगों की हो रही मौत

    यांग ने इस बात पर जोर दिया कि रेत और धूल भरी आंधियों से हवा में उड़ने वाले कण हर साल लगभग 70 लाख अकाल मौतों का कारण बनते हैं, जिनमें से ज्यादातर मौतें श्वसन और हृदय रोगों के कारण होती हैं। ये फसल की पैदावार को 25 प्रतिशत तक कम कर सकती हैं, जिससे भुखमरी बढ़ती है और पलायन को बढ़ावा मिलता है।

    डब्ल्यूएमओ की प्रतिनिधि लारा पैटरसन ने भी इस समस्या की गंभीरता को दर्शाते हुए कहा कि वर्ष में लगभग दो अरब टन धूल हवा में फैलती है जिसका द्रव्यमान गीजा के लगभग 300 पिरामिडों के बराबर है। उन्होंने बताया कि 80 प्रतिशत से ज्यादा धूल उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व के रेगिस्तानों से आती है जो हजारों किलोमीटर की दूरी तय करके अपने स्त्रोत से दूर के क्षेत्रों को प्रभावित करती है।