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    कभी चीन के लोगों के लिए दिल खोल कर की थी सेवा, अब व्‍यवहार से दुखी है डॉ कोटनिस का परिवार

    By Dhyanendra SinghEdited By:
    Updated: Wed, 24 Jun 2020 11:15 PM (IST)

    महाराष्ट्र के कोंकण में जन्मे डॉ. द्वारकानाथ कोटनिस 1937 में रेड क्रॉस मिशन की टीम के सदस्य थे और भारत से चीन गए डॉक्टरों के एक दल का नेतृत्व कर रहे थे।

    कभी चीन के लोगों के लिए दिल खोल कर की थी सेवा, अब व्‍यवहार से दुखी है डॉ कोटनिस का परिवार

    ओमप्रकाश तिवारी, मुंबई। लद्दाख की गलवन घाटी में भारतीय सैनिकों पर धोखे से हमला करने के चीन के व्यवहार से डॉ. द्वारकानाथ कोटनिस का परिवार भी आहत है, जिन्होंने 1937 में चीन जाकर हजारों चीनियों की जान बचाई थी।

    डॉ. कोटनिस की पौत्री डॉ. निर्मला कोटनिस इन दिनों नासिक में रहती हैं और देश में बैडमिंटन की एकमात्र हिंदी कमेंटेटर हैं। अपने भाई डॉ. नीलेश के साथ इंडो-चाइना फ्रेंडशिप एसोसिएशन नामक संगठन के जरिये दोनों देशों के बीच शांति की मुहिम चलानेवाली निर्मला कहती हैं कि जब भी किसी देश को जरूरत पड़ी है, भारत ने हमेशा मदद का हाथ बढ़ाया है। इस तरह का एक उदाहरण हमारे परिवार से डॉ. द्वारकानाथ कोटनिस का है। यह बात चीन को हमेशा याद रखनी चाहिए कि उसके संकटकाल में भारत से आए चिकित्सकों की एक टीम ने उसे कितनी बड़ी मदद पहुंचाई थी। चीन को कोई भी बड़ा कदम उठाने से पहले यह सोचना चाहिए कि भारत ने हमारे बुरे समय में हमारा साथ दिया था।

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    विदेश मंत्री एस जयशंकर ने डॉ कोटनिस को किया था याद

    मंगलवार को विदेशमंत्री एस. जयशंकर द्वारा चीन और रूस के विदेश मंत्रियों के साथ बातचीत के दौरान डॉ. कोटनिस को याद करने की सराहना करते हुए डॉ. निर्मला कहती हैं कि विदेश मंत्री ने ऐसे मौके पर उन्हें याद करके वैश्विक स्तर पर भारत के त्याग, बलिदान एवं मित्रता की भावना को रेखांकित किया है। डॉ. निर्मला नसीहत देते हुए कहती हैं कि चीन को गलवन घाटी जैसी हरकतें करने के बजाय अपने यहां से दुनिया भर में फैली कोविड-19 महामारी के दौरान उसे अच्छा काम करके दुनिया में अपनी छवि सुधारने का प्रयास करना चाहिए।

    भारत से चीन गए डॉक्टरों का किया था नेतृत्व

    बता दें कि महाराष्ट्र के कोंकण में जन्मे डॉ. द्वारकानाथ कोटनिस 1937 में रेड क्रॉस मिशन की टीम के सदस्य थे और भारत से चीन गए डॉक्टरों के एक दल का नेतृत्व कर रहे थे। उन दिनों जापान ने चीन पर हमला कर दिया था। तब चीन के तत्कालीन जनरल छू ते ने भारत में आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभा रही कांग्रेस के नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू से घायल सैनिकों के इलाज के लिए चिकित्सकों का एक दल भेजने का अनुरोध किया था। नेहरूजी ने इंडियन मेडिकल मिशन टु चाइना के तहत डॉ. कोटनिस के नेतृत्व में चिकित्सकों का एक दल चीन भेजा था।

    युद्ध समाप्त होने के बाद बाकी डॉक्टर भारत लौट आए, लेकिन डॉ. कोटनिस वहीं रुक गए। इसी दौरान उन्होंने चीन की महिला गुओ क्विंग लांग से विवाह कर लिया था। जब उनके यहां पुत्र का जन्म हुआ तो उसका नाम उन्होंने यिनहुआ रखा। इसका शाब्दिक अर्थ- यिन का मतलब भारत, और हुआ का मतलब चीन। इससे वह चीनी जनमानस के और नजदीक आ गए। 32 वर्ष की अल्पायु में उनका मिर्गी से निधन हो गया। चीन में अब भी डॉ. द्वारकानाथ कोटनिस का नाम काफी सम्मान से लिया जाता है। उनके नाम पर संग्रहालय है। उनके बारे में पाठ्य पुस्तकों में भी पढ़ाया जाता है।