यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 03, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
Supreme Court: लव जिहाद पर टिप्पणियां हटाने की मांग, सुप्रीम कोर्ट का सुनवाई से इनकार; पढ़ें अन्य अहम खबरें
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उस जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा लव ...और पढ़ें

आइएएनएस, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उस जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा लव जिहाद पर की गई कुछ टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटाने की मांग की गई थी। ट्रायल कोर्ट ने कहा था, 'लव जिहाद मतांतरण के मुद्दे को हल्के में नहीं लिया जा सकता और अवैध मतांतरण देश की एकता, अखंडता एवं संप्रभुता के लिए बड़ा खतरा है।
'जस्टिस हृषिकेश राय एवं जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने याचिकाकर्ता से सवाल किया कि क्या सुप्रीम कोर्ट रिट कार्यवाही में साक्ष्य के आधार पर ट्रायल कोर्ट द्वारा की गईं टिप्पणियों को हटा सकता है।
पीठ ने याचिकाकर्ता से सवाल किया
पीठ ने कहा, 'आप इस मामले से कैसे संबंधित हैं। क्या हम अनुच्छेद-32 की याचिका पर इस तरह सुनवाई कर सकते हैं? हम खारिज करें या आप वापस लेंगे?' पीठ का रुख देखते हुए याचिकाकर्ता के वकील ने जनहित याचिका वापस ले ली। उत्तर प्रदेश में बरेली के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के फास्ट ट्रैक कोर्ट-1 ने 30 सितंबर, 2024 के फैसले में उक्त टिप्पणी की थी।
सरकारी कर्मचारियों पर हमला करने के आरोपी के खिलाफ एफआईआर खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ड्यूटी पर तैनात सरकारी कर्मचारियों पर हमला करने के आरोपित एक व्यक्ति के खिलाफ 2015 की एफआइआर खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि कथित अपराध की जांच में शुरुआती चरण से ही कानूनी खामियां थीं।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ सितंबर 2023 के इलाहाबाद हाइकोर्ट के आदेश के खिलाफ एक अपील पर सुनवाई कर रही थी। इसमें वाराणसी के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा अपीलकर्ता बीएन जान के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के निर्देश के खिलाफ याचिका खारिज कर दी गई थी।
पीठ ने कहा, ''हम संतुष्ट हैं कि अपीलकर्ता वाराणसी के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष अपीलकर्ता के खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही को रद करने का मामला बनाने में सक्षम है।'' पीठ ने उल्लेख किया कि एफआइआर में भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) की धारा 353 (किसी लोक सेवक को उसके कर्तव्य निर्वहन से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल का प्रयोग) के तहत किसी विशिष्ट कृत्य का उल्लेख नहीं था और इसमें केवल इतना कहा गया था कि जान और उनके सहयोगी ''उपद्रव पैदा कर रहे थे''।
सुप्रीम कोर्ट ने की जम्मू-कश्मीर कैट के लिए स्थायी भवन और स्टाफ की वकालत
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को जम्मू-कश्मीर केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) के लिए स्थायी भवन और स्थायी स्टाफ की वकालत करते हुए कहा कि सरकार के लिए यह बुद्धमिानीभरा कदम होगा कि वह न्यायिक और अर्ध-न्यायिक निकायों में आउटसोर्स स्टाफ की तैनाती न करे।जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ को केंद्र सरकार की तरफ से जानकारी दी गई कि कैट जम्मू के कामकाज के लिए एक भवन किराये पर लिया गया है और वहां आउटसोर्स कर्मचारियों की तैनाती की जाएगी।
