सुरेंद्र प्रसाद सिंह, नई दिल्ली। कृषि क्षेत्र पर जलवायु परिवर्तन के बढ़ते संकट को देखते हुए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को और कारगर बनाने की कोशिश की जाएगी। आगामी वित्त वर्ष 2023-24 के आम बजट में फसल बीमा योजना के कलेवर में समुचित बदलाव की उम्मीद जताई जा रही है। इसके लिए साढ़े पंद्रह हजार करोड़ रुपए के आवंटन का प्रविधान किया जा सकता है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) के मौजूदा स्वरूप पर कई राज्यों ने आपत्तियां जताते हुए इससे खुद को अलग कर लिया है, जिसमें पर्याप्त संशोधन की दरकार है। ऐसा करके इसमें बाकी राज्यों को फिर से इसमें शामिल करने का मौका दिया जा सकता है।

चालू वित्त वर्ष 2022-23 के आम बजट में भी पीएमएफबीवाई के लिए 15,500 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया था। जबकि योजना में और राज्यों के शामिल होने के बाद इसके लिए और अधिक बजट आवंटन की दरकार होगी। दरअसल फसल बीमा योजना के कार्पस में 6000 करोड़ रुपए का फंड पड़ा हुआ है, जिसका उपयोग अतिरिक्त जरूरतों के लिए किया जा सकता है। कृषि मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक फसल बीमा योजना में कुछ ऐसे बदलाव किए जाएंगे, जिससे बाकी राज्यों को भी शामिल करने में मदद मिलेगी। वैसे तो पीएमएफबीवाई में गैर ऋणी किसानों की संख्या में पिछले पांच छह सालों में पौने तीन सौ फीसद की बढ़ोतरी हुई है। लेकिन फसल बीमा योजना अभी भी अपेक्षित किसानों की हिस्सेदारी नहीं है।

आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और गुजरात ने इसकी खामियां गिनाते हुए इससे खुद को बाहर कर लिया था। उनका कहना था कि इसमें क्षतिपूर्ति की इकाई का निर्धारण और भुगतान में विलंब बड़ी चुनौती है। इसमें संशोधन कर योजना की लागत में कटौती की जा सकती है। इसके स्वरूप में भी परिवर्तन की संभावना है। हालांकि बीते खरीफ सीजन-2022 में आंध्र प्रदेश ने इसके कुछ संशोधनों पर संतुष्टि जताते हुए योजना में खुद को शामिल कर लिया है। फसल बीमा योजना में फिलहाल केवल 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश हैं। जबकि फसल बीमा योजना में कुल 10 प्राइवेट और सरकारी कंपनियां शामिल हैं। फसल बीमा योजना में बीमा प्रीमियम का रबी फसलों पर 1.5 फीसद, खरीफ फसलों के लिए 2 फीसद और नगदी फसलों की खेती पर पांच फीसद का प्रीमियम किसानों से वसूला जाता है।

जबकि प्रीमियम का बाकी हिस्सा केंद्र व राज्य सरकारों को बराबर-बराबर देना पड़ता है। जबकि पूर्वोत्तर राज्यों को केंद्र व राज्यों के बीच की हिस्सेदारी 90 और 10 फीसद के अनुपात में होती है। प्रस्तावित आम बजट में कई नए प्रविधानों को जोड़ा जा सकता है, जिससे राज्यों की आपत्तियों का निराकरण हो सके। फसलों की बोआई से खलिहान तक लौटने की श्रृंखला को इसके दायरे में लाने का प्रयास होगा। बैंकों से ऋण लेने वाले किसानों पर फसल बीमा योजना जबरन थोपने की शर्तों को हटाकर इसे स्वैच्छिक किया जाएगा। योजना के लाभ को देखते हुए गैर ऋण किसानों को भी इसमें शामिल होने का मौका दिया जा रहा है।

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Edited By: Shashank Mishra

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