यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 01, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
कर्नल बी. संतोष बाबू: वो नायक जिसके हौसले के आगे पस्त हो गया चीन, गलवान घाटी में लिख दी वीरता की इबारत
लेफ्टिनेंट जनरल शौकीन चौहान के अनुसार गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच संघर्ष केवल सैन्य टकराव नहीं ...और पढ़ें

HighLights
- कर्नल संतोष बाबू ने बिना हथियार के भी दुश्मनों को पीछे हटने पर किया मजबूर
- चीन के अवैध निर्माण को हटाने के लिए गलवान में बिना हथियार गए थे कर्नल संतोष
लेफ्टिनेंट जनरल शौकीन चौहान। जून 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय जवान और चीनी सैनिकों के बीच जो हुआ वह सिर्फ सैन्य टकरवा नहीं था, बल्कि यह वह पल था जब भारत ने दुनिया को दिखा दिया कि उसकी चुप्पी उसकी कमजोरी नहीं सयंम है।
यह कहानी है कर्नल बी. संतोष बाबू की, जिन्होंने निहत्थे होकर भी देश की गरीमा की रक्षा की और एक मिसाल बन गए। यह उस क्षण का चित्रण है जब भारत ने शांति को चुना, लेकिन आत्म-सम्मान की कीमत पर नहीं।
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कहां से ताल्लुक रखते थे कर्नल संतोष बाबू?
तेलंगाना के सूर्यापेट में जन्मे कर्नल संतोष बाबू का बचपन सादगी से भरा था। वे एक शांत और अनुशासित बच्चे थे और उनकी आंखों में बचपन से ही एक स्पष्ट सपना था देश की सेवा करना।
देश की सीमाओं की रक्षा का सपना लिए कर्नल संतोष बाबू ने भारतीय सेना में शामिल होने की ठानी। साल 2004 में उन्होंने 16 बिहार रेजिमेंट में कमिशन पाया और सेना में अपनी सेवाएं शुरू की। उनके साथी जवानों के अनुसार, वह हमेशा एक शांत लेकिन मजबूत नेतृत्वकर्ता रहे।
गलवान क्यों है खास?
गलवान घाटी सिर्फ एक खूबसूरत इलाका नहीं, बल्कि बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद यह इलाका और भी संवेदनशील हो गया। यहां भारत ने दर्बुक-श्योक-डौलत बेग ओल्डी सड़क का निर्माण किया, जो उत्तर के अंतिम एयरबेस तक पहुंचती है। इसी कारण चीन बार-बार इस इलाके में निर्माण करता रहा, जिससे तनाव और बढ़ता गया।
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15 जून 2020 की रात, कर्नल संतोष बाबू अपनी टुकड़ी के साथ गलवान घाटी में एक समझौते के तहत चीनी सैनिकों के अवैध निर्णाण को हटाने पहुंचे थे। दोनों देशों के बीच समझौता था कि ऐसे समझौते के दौरान हथियार नहीं लाए जाएंगे।
निहत्थे होने के बावजूद किया सामना
निहत्थे होने के बावजूद कर्नल बाबू ने चीनी सैनिकों से साफ कह दिया कि निर्माण हटाना होगा। जब इसका विरोध हुआ, तो संघर्ष शुरू हो गया। पत्थरों और लोहे की छड़ों से हमला हुआ, लेकिन कर्नल संतोष बाबू ने पीछे हटने के बजाय डटकर मुकाबला किया।
उनकी आवाज गूंजी 'बिहार रेजिमेंट आगे बढ़ों' और इन शब्दों के बाद उनके साथी जवानों ने हौसला नहीं खोया और आगे बढ़ते चले गए। उनकी शहादत की खबर जब परिवार और देश तक पहुंची, तो आंसुओं के साथ गर्व भी था। उनकी बेटी के द्वारा दी गई सैल्यूट की तस्वीरें पूरे देश में प्रेरणा बन गईं। उनके मरणोपरांत उन्हें महावीर चक्र से नवाजा गया।
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उनकी डायरी में लिखी महत्वपूर्ण बात
उनकी डायरी में लिखी एक बात उनके मजबूत नेतृत्व को पूरी तरह से बयां करता है। उन्होंने लिखा, "लीडरशीप का मतलब ऊंची आवाज नहीं, बल्कि मुश्किल वक्त में शांत रहकर आगे बढ़ना होता है।"
(लेखक- लेफ्टिनेंट जनरल शौकिन चौहान, पीवीएसएम, एवीएसएम, वाईएसएम, एसएम, वीएसएम, पीएचडी)
