लक्ष्मी शंकर यादव। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में यह कहा है कि निजी क्षेत्र को रक्षा क्षेत्र में भी पूरी दुनिया में भारत का परचम लहराने के लिए आगे आना होगा। वे रक्षा क्षेत्र के संदर्भ में आयोजित एक वेबिनार को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि देश रक्षा क्षेत्र में कैसे आत्मनिर्भर बने यह अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। अब रक्षा के पूंजीगत बजट में भी घरेलू खरीद के लिए एक हिस्सा रिजर्व कर दिया गया है। इसलिए निजी क्षेत्र को आगे आकर विश्व में अपना परचम लहराना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत के पास हथियार एवं सैन्य उपकरण बनाने का सदियों पुराना अनुभव है, जिसका लाभ लिया जाना चाहिए। 

इससे पहले बेंगलुरू में एयर इंडिया शो के दौरान रक्षा मंत्रियों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि हिंद महासागर क्षेत्र के देशों को भारत मिसाइल एवं इलेक्ट्रॉनिक युद्धक प्रणाली सहित विभिन्न प्रकार की हथियार प्रणालियों की आपूर्ति करने को तैयार है। इससे पहले केवल आकाश मिसाइल के निर्यात को मंजूरी प्रदान की गई थी, परंतु अब हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल अस्त्र, एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल नाग और क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस भी निर्यात के लिए तैयार हैं। आकाश सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली है और कम दूरी की हवाई सुरक्षा प्रदान करती है।

आने वाले समय में अस्त्र मिसाइल को भी लड़ाकू विमानों के साथ एकीकृत किया जाएगा। ब्रह्मोस मिसाइल सेना, नौसेना तथा वायु सेना के द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली एक सुपरसोनिक मिसाइल है। इस मिसाइल को जहाजों, मोबाइल लांचर, पनडुब्बियों एवं एयरक्राफ्ट से छोड़ा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि सामरिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए रक्षा उपकरणों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करना महत्वपूर्ण है। रक्षा मंत्री ने अधिकारियों से इनोवेशंस फॉर डिफेंस एक्सीलेंस यानी रक्षा उत्कृष्टता के लिए नवोन्मेष के तहत स्टार्ट-अप को मिलने वाले अनुदान को भी बढ़ाने को कहा।

रक्षा उत्पादों का बढ़ता दायरा : निस्संदेह रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता वर्तमान समय की सबसे बड़ी जरूरत है। देश में रक्षा उत्पादों का दायरा बढ़ाने से आने वाले दिनों में हम हथियारों का बड़ा निर्यातक बन सकते हैं। दूसरा यह भी कि जब देश में हवाई जहाज या अन्य अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण तेज होगा तो उसके लिए आवश्यक कल-पुर्जे और अन्य जरूरी सामान भी तैयार होंगे। ऐसे में उद्योगों और रोजगार के अवसरों में बढ़ोतरी होगी। इस तरह के निर्माण के लिए हमें उच्च प्रकार का शोध एवं गुणवत्ता मानक भी तैयार करना होगा।

सरकार की योजना के मुताबिक इस लक्ष्य को दो-तीन साल में पूरा करना है। विदित हो कि अर्जुन टैंक एवं एलसीए तेजस जैसी परियोजनाओं को पूरा करने में कई साल लग गए। गंभीरता से देखा जाए तो वर्ष 2021-22 के लिए जो रक्षा बजट जारी किया गया उसमें पिछले वर्ष की तुलना में की गई केवल 1.4 फीसद की वृद्धि पर्याप्त नहीं है। डीआरडीओ के लिए पूंजीगत आवंटन को बढ़ाकर 11,375 करोड़ रुपये किया गया। यह पिछले वर्ष की तुलना में मात्र आठ प्रतिशत ही बढ़ाया गया है। विकास योजनाओं को देखते हुए यह कम ही है।

पर्याप्त नहीं रक्षा बजट में बढ़ोतरी : वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए बजट में वित्तीय वर्ष 2021-22 के लिए रक्षा बजट को बढ़ाकर 4,78,195 करोड़ रुपये किया गया है, जबकि पिछला रक्षा बजट 4,71,378 करोड़ रुपये का था। स्पष्ट है कि पिछले साल की तुलना में 6,817 करोड़ रुपये की मामूली वृद्धि ही की गई है। जबकि पिछले वर्ष की तुलना में भारत की रक्षा चुनौतियां काफी बढ़ गई हैं।

चीन के साथ एलएसी यानी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर तनाव भले कम हो गया हो, लेकिन जिस प्रकार यह लगभग दस माह तक रहा, उसे देखते हुए सतर्क रहने की जरूरत है। वहीं पाकिस्तान की सीमा पर खतरे एवं चुनौतियां बरकरार हैं। इसके अलावा, समुद्र की तरफ से भी भारत को चुनौतियां मिल रही हैं। यह भी सर्वविदित है कि पाकिस्तान और चीन सहित विश्व के अनेक देश भारत की तुलना में सुरक्षा पर अधिक धन खर्च कर रहे हैं। जबकि सीमा पर तनाव की स्थिति को देखते हुए सैन्य खरीद की विशेष आवश्यकता थी।

सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा ढांचा मजबूत करना भी जरूरी है। इसके अलावा रक्षा क्षेत्र में तकनीकी विकास के लिए भी अधिक धन की जरूरत है। वर्तमान सुरक्षा चुनौतियों के मद्देनजर यह औसत जीडीपी के 2.5 प्रतिशत से ज्यादा होना चाहिए। उल्लेखनीय है कि वैश्विक रक्षा खर्च का मानक 2.25 फीसद है। भारत का रक्षा बजट वैसे तो पांच लाख करोड़ रुपये के नजदीक पहुंच गया है, लेकिन अन्य देशों की तुलना में यह काफी कम है। अमेरिका अपनी जीडीपी का चार फीसद, रूस 4.5 फीसद, इजराइल 5.2 फीसद, चीन 2.25 और पड़ोसी देश पाकिस्तान 3.5 प्रतिशत रक्षा बजट पर खर्च कर रहे हैं।

भारत ने वर्ष 1988 में कुल जीडीपी का 3.18 प्रतिशत रक्षा पर खर्च किया था। उसके बाद लगातार इसमें गिरावट जारी है, जबकि सामरिक खतरों को देखते हुए इसे बढ़ाया जाना चाहिए था। रक्षा बजट में की गई कम बढ़ोतरी से तीनों सेनाओं के आधुनिकीकरण की योजनाओं के प्रभावित होने की आशंका बनी रहेगी। चीन तथा पाकिस्तान की ओर से दी जा रही दो मोर्चो पर युद्ध की चुनौती के लिए सेना को हर समय तैयार रखना जरूरी है। आगामी वित्त वर्ष के लिए आवंटित किए गए 4,78,195 करोड़ रुपये में से यदि सेना के पेंशन मद के खर्च को हटा दिया जाए तो 3.62 करोड़ रुपये की धनराशि बचती है, जबकि पिछले वर्ष यह धनराशि 3.37 करोड़ रुपये थी। चुनौतियों के हिसाब से यह बढ़ोतरी कोई खास नहीं है।

रक्षा बजट में सैन्य आधुनिकीकरण के लिए 1,35,060 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं, जबकि पिछले वर्ष यह धनराशि 1,13,734 करोड़ रुपये थी। सरकार की योजना है कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनते हुए रक्षा उपकरणों का निर्यात किया जाए। इस तथ्य के मद्देनजर यह धनराशि काफी कम होगी। आगामी वर्ष में सेना का खर्च ज्यादा बढ़ने की उम्मीद है, क्योंकि लद्दाख में चीन की चुनौती को देखते हुए करीब 50 हजार सैनिकों की तैनाती की जा चुकी है। इसके अलावा वहां पर टैंकों, विमानों एवं मिसाइलों की तैनाती कर दी गई है ताकि कभी भी युद्ध की स्थिति से निपटा जा सके। ऐसे में और अधिक रक्षा बजट की आवश्यकता थी।

उम्मीद थी कि रक्षा बजट का आवंटन करते समय लद्दाख में सेना की तैनाती को ध्यान में जरूर रखा जाएगा, लेकिन शायद ऐसा नहीं हुआ। अगर मिसाइल क्षेत्र पर नजर डाली जाए तो आकाश मिसाइलों का उत्पादन बढ़ाया जाना है, क्योंकि इन मिसाइलों की तैनाती चीन सीमा के नजदीक लद्दाख क्षेत्र में कर दी गई है। इसके अलावा, न्यू जेनरेशन की आकाश मिसाइलों को विकसित किया जाना है। आकाश और ब्रह्मोस मिसाइलों के निर्यात किए जाने की उम्मीद है। इसलिए निर्माण में तेजी लानी होगी। इन कामों के लिए धन की जरूरत है।

सेना के तीनों अंगों की आवश्यकताएं

यदि थल सेना की जरूरतों की तरफ ध्यान दिया जाए तो बड़ी संख्या में तोपों की खरीद का सौदा हो चुका है। अमेरिका से तोपों एवं असॉल्ट राइफलें खरीदने पर धन खर्च किया जाना है। बड़ी संख्या में होवित्जर एम-777 तोपों की जरूरत पूरी की जानी है। थल सेना के हेलीकॉप्टर बेड़े की मजबूती के लिए हल्के उपयोग वाले हेलीकॉप्टरों की खरीद की जानी है। चीन से लगने वाली उत्तरी एवं पूर्वी सीमा पर ढांचागत विकास तथा धीमी गति से विकसित की जा रही पर्वतीय डिविजन के गठन में तेजी लाने के लिए धन की आवश्यकता है।

यही नहीं, थल सेना की अन्य जरूरतों में मुख्य युद्धक टैंक टी-90 एमएस की बड़ी संख्या में खरीद की जानी है। सेना को बैरेट्टा स्कॉरपियो स्नाइपर राइफलें और एम-95 एमएस बैरेट-50 बीएमजी एंटी मैटेरियल राइफलें चाहिए। बुलेट प्रूफ जैकेटों एवं बुलेट प्रूफ हेल्मेटों की जरूरतों को भी पूरा किया जाना है। थल सेना के लिए कॉम्बैट व्हीकल आइसीवी की बड़ी संख्या में जरूरत है। एंटी टैंक मिसाइलों और पैदल सैनिकों को जंग के मैदान तक ले जाने वाले एफआइसी वाहनों की खरीद की जानी है। ये वाहन टैंक भेदी मिसाइलों और तोपों से लैस होते हैं। सेना को उच्च क्षमता वाले रेडियो रिले एवं बड़ी मात्रा में लाइट मशीन गन भी चाहिए। ये सब आयुध प्रणालियां इस बजट से कैसे पूरी होंगी?

वायुसेना : वायु सेना का खर्च सबसे ज्यादा एवं महत्वपूर्ण है, क्योंकि मिग-27 विमानों के बेड़ों की विदाई हो चुकी है। इनकी जगह लेने के लिए तेजस विमानों के बेड़े तैयार किए जाने हैं। एलसीए तेजस के 83 विमानों को एचएएल से लिए जाने का ऑर्डर अभी हाल ही में दिया गया है, जिनकी कीमत 49,797 करोड़ रुपये है। इसका भुगतान भी किया जाना है। भारत तेजस मार्क-2 को विकसित कर जल्द ही वायु सेना में शामिल करना चाहता है, जिसमें लिए बड़ी रकम की जरूरत होगी।

तेजस विमानों का उत्पादन शुरू करने के अलावा वायु सेना को हेलीकॉप्टरों की जरूरत है। राफेल विमानों की खरीद का भुगतान किया जाना है। अभी ये विमान पूरी संख्या में नहीं प्राप्त हुए हैं। इनकी आपूर्ति जारी है। सुखोई विमानों का बेड़ा बढ़ाने के लिए रूस से खरीदारी होनी हैं। इनका कुछ पैसा दिया जाना बाकी है। चिनूक व अपाचे अभी पूरी संख्या में नहीं मिले हैं। इन पर भी धनराशि खर्च करनी पड़ेगी। ड्रोन विमानों की खरीद की जानी है। इन सबके लिए भी धन की आवश्यकता होगी। इन सबके अलावा एस 400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम, एयर डिफेंस गनों और डोíनयर विमानों पर धन खर्च होगा।

नौसेना : नौसेना की जरूरतों में नए बहुउद्देश्यीय हेलीकॉप्टर और पनडुब्बी निरोधक बम शामिल हैं। छह पनडुब्बी खरीदे जाने का सौदा अभी हाल ही में हुआ है। निकट भविष्य में पुराने चेतक हेलीकॉप्टरों की जगह नए हेलीकॉप्टरों की खरीद की जानी है जो इस बजट से संभव नहीं है। अरिहंत क्लास की पनडुब्बियों, अकुला श्रेणी की न्यूक्लियर अटैक पनडुब्बियों और एसएसएन श्रेणी की परमाणु पनडुब्बियों की संख्या बढ़ाई जानी है। प्रोजेक्ट-75 के तहत भी कुछ पनडुब्बियां निíमत हो रही हैं। एस-5 क्लास की एसएसबीएन परमाणु पनडुब्बियां भी चुनौतियों के हिसाब से चाहिए। यही नहीं, अगली पीढ़ी की मिसाइल पोत भी तैयार की जा रही है। युद्ध पोतों का ब्रह्मोस मिसाइलों का बेड़ा नौसेना को शीघ्र चाहिए। उन्नत तारपीडो डेको सिस्टम पर धन खर्च किया जा रहा है। 

(पूर्व प्रोफेसर, सैन्य विज्ञान विभाग) 

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