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    प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए सरकार का मेगा प्लान, इस तरह खत्म होगा गाड़ियों का धुआं

    By Ashish PandeyEdited By:
    Updated: Thu, 11 Nov 2021 03:20 PM (IST)

    सरकार ने प्रदूषण की समस्या का हल तलाशने के लिए एक मेगा प्लान बनाया है। इसमें इलेक्ट्रिक गाड़ियों की ब्रिक्री बढ़ाने के साथ पेट्रोल और डीजल के विकल्पों पर ध्यान देना शुरु किया है। इसी के तहत देश में इलेक्ट्रिक सड़कें भी बनाई जाएगी।

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    इलेक्ट्रिक गाड़ियों की ब्रिक्री बढ़ाने और पेट्रोल-डीजल के विकल्पों पर ध्यान देने के साथ इलेक्ट्रिक सड़कें भी बनाई जाएगी।

    नई दिल्ली, अनुराग मिश्र/ विवेक तिवारी। हवा में फैल रहे प्रदूषण का एक बड़ा स्रोत गाड़ियों से निकलने वाला धुआं है। आईआईटी कानपुर की रिपोर्ट में इस बात की तस्दीक की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में कुल प्रदूषण में गाड़ियों से निकलने वाले धुएं की हिस्सेदारी 36 फीसद है। सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक देश में बिकने वाले 30% वाहन इलेक्ट्रिक हों। सरकार ने प्रदूषण की समस्या का हल तलाशने के लिए एक मेगा प्लान बनाया है। इसमें इलेक्ट्रिक गाड़ियों की ब्रिक्री बढ़ाने के साथ पेट्रोल और डीजल के विकल्पों पर ध्यान देना शुरु किया है। इसी के तहत देश में इलेक्ट्रिक सड़कें भी बनाई जाएगी। इसका मकसद एक तरफ प्रदूषण को खत्म करना है तो दूसरी तरफ इलेक्ट्रिक गाड़ियों को प्रोत्साहित करना है। इन सड़कों के बनने से प्रदूषण के स्तर में भी कमी लाई जा सकेगी तो गाड़ियां भी सड़कों पर चार्ज हो जाएंगी।

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    यहां बनेगी सड़क

    एक लाख करोड़ की लागत से बन रहे दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस-वे पर एक लेन ई-हाईवे की होगी। यह ई-लेन करीब 1300 किलोमीटर लंबी होगी। इससे लॉजिस्टिक का खर्च 70 फीसद तक कम हो जाएगा। नितिन गडकरी ने बताया है कि इन ई-रोड पर उसी तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा, जिस तकनीक से जर्मनी में ई-हाईवे बनाए गए हैं। जर्मनी और भारत दोनों जगहों पर सीमेंस ई-रोड बना रही है।

    सीमेंस ने सबसे पहले जर्मनी के फ्रैंकफर्ट शहर में मई 2019 में इस तकनीक से सड़क बनाई। छह मील लंबी इस सड़क के ऊपर बिजली के विशाल केबल लगे हैं। इन केबल में 670 वोल्ट का करेंट होता है। इनके नीचे से गुजरने वाले इलेक्ट्रिक ट्रक इन केबल से ऊर्जा हासिल करके अपनी बैटरी को रिचार्ज करते हैं। इन रोड पर वाहन 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकेंगे और प्रदूषण भी बेहद कम होगा।

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    इस तकनीक का होगा इस्तेमाल

    ट्रांसपोर्ट रिसर्च लैबोरेट्री के मुताबिक इलेक्ट्रिक रोड में मुख्य रूप से तीन तकनीक का इस्तेमाल होता है। पहला गाड़ियों के ऊपर पावर लाइन होती है जैसा भारत में होता है। वहीं जमीन पर पटरी या अंडरग्राउंड क्वाएल से भी बिजली की आपूर्ति की जाती है। ओवरहेड केबल सबसे उन्नत तकनीक है लेकिन गैर व्यावसायिक वाहनों के लिए ये कारगर नहीं है क्योंकि कार की ऊंचाई बेहद कम होती है और ये बेहद ऊपर मौजूद केबल से ऊर्जा हासिल नहीं कर पाएंगे जबकि ई-ट्रक के लिए ये केबल पहुंच में होंगे। वहीं जमीन से मिलने वाली बिजली जैसे रेल से आसानी से ज्यादा ऊर्जा मिल जाएगी। वहीं चार्जिंग क्वाएल की तकनीक में कम पॉवर मिलेगी और ज्यादा उपकरण भी लगेंगे।

    परिवहन सुधरेगा तो हवा भी होगी बेहतर

    यूमास (द मेसाचुएट्स अंडर ग्रेजुएट जर्नल ऑफ इकोनॉमी) की रिपोर्ट के मुताबिक अगर सरकारी नीतियां इलेक्ट्रिक व्हीकल की खरीद में 2024 तक अपना 25 फीसद लक्ष्य पूरा कर लेती हैं तो विभिन्न तरह के करीब 500,000 इलेक्ट्रिक व्हीकल सड़कों पर होंगे।

    इससे दिल्ली में करीब 159 टन पीएम 2.5 और 4.8 मिलियन टन कॉर्बन डाइ ऑक्साइड उत्सर्जन में कमी आएगी। इससे करीब एक लाख पेट्रोल कारों द्वारा पूरे जीवन भर के कॉर्बन डाइ ऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी आएगी। हमें सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना होगा जिससे लोग अपने वाहनों को घर पर ही छोड़ें।

    2050 तक यातायात से होने वाला उत्सर्जन दोगुना हो जाएगा। लेकिन अगर हम शहरों के वाहनों को इलेक्ट्रिक कर दें तो शहरों में यातायात से होने वाले कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन को 70 फीसद तक कम किया जा सकता है। वहीं इससे शहरों का कुल प्रदूषण भी 50 फीसद तक कम हो जाएगा। वर्ल्ड इकोनामी फोरम की नई रिपोर्ट में यह दावा किया गया है।

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    इलेक्ट्रिक गाड़ियों से कम होता है प्रदूषण

    पिछले कुछ समय में सड़क पर इलेक्ट्रिक गाड़ियों की संख्या तेजी से बढ़ी है। पेट्रोल और डीजल की तुलना में इन गाड़ियों की संख्या बढ़ना आपकी सेहत के लिए अच्छा है। कनाडा की टोरंटों यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में ये तथ्य सामने आए हैं कि सड़कों पर इलेक्ट्रिक गाड़ियों के बढ़ने से आपकी सेहत बेहतर होगी। टोरेंटो यूनिवर्सटी के शोधकर्ताओं ने एक मॉडल बना कर अध्ययन किया है जिसमें बताया गया है कि बढ़ती इलेक्ट्रिक गाड़ियों से हवा में प्रदूषक तत्वों की कमी आई है। इससे हर साल वायु प्रदूषण के चलते होने वाली मौतों में कमी आएगी।

    इस शोध कार्य का नेतृत्व कर रहीं टोरंटों यूनिवर्सिटी में सिविल एंड मिनरल इंजीनियरिंग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर मैरिएन हेत्ज़ोपोलू के मुताबिक शहरी इलाकों में वायु प्रदूषण की समस्या का असर वहां रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर सीधे तौर पर होता है। उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रिक गाड़ियां की संख्या बढ़ने से हवा में नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर की कमी होती है। इससे हवा की गुणवत्ता काफी बेहतर होती है। इससे लोगों के जीवन पर सीधा असर हाता है।

    कनाडा में हर साल लगभग वायु प्रदूषण के चलते लगभग 14,600 लोगों की समय से पहले मौत हो जाती है। इसमें लगभग 3,000 मौतें ग्रेटर टोरंटो हैमिल्टन एरिया में होती हैं। दिल्ली मेडिकल काउंसिल की साइंटिफिक कमेटी के चेयरमैन नरेंद्र सैनी कहते हैं कि हवा में ज्यादा प्रदूषण होने से निश्चित ही स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। हवा में मौजूद अलग-अलग केमिकल और पार्टिकुलेट मैटर के चलते लोगों में अस्थमा, हाइपरटेंशन, ब्लड प्रेशर, सिर में दर्द, आंखों में जलन, त्वचा पर एलर्जी, सहित कई मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। PM 2.5 बहुत ही छोटे कण होते हैं जो सांस के साथ आपके ब्लड में पहुंच सकते हैं। इससे कई तरह की मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। ज्यादा प्रदूषण में रहने से हार्ट अटैक जैसी दिक्कत भी हो सकती है।

    पैसे की होगी बचत

    मैरिएन हेत्ज़ोपोलू ने एक मॉडल बनाया जिसके जरिए उन्होंने दिखाया कि पेट्रोल और डीजल की तुलना में बढ़ती इलेक्ट्रिक गाड़ियों से एक तरफ जहां हवा की गुणवत्ता सुधरने से लोगों की सेहत अच्छी हो सकती है वहीं हर साल स्वास्थ्य पर खर्च होने वाले लाखों डॉलर भी बचाए जा सकते हैं। उन्होंने बताया कि इस रिसर्च के मिले परिणाम काफी चौंकाने वाले थे। उन्होंने कहा कि सिर्फ एक पेट्रोल या डीजल की गाड़ी को इलेक्ट्रिक गाड़ी से रिप्लेस करने पर देश को 10,000 डॉलर के स्वास्थ्य और सामाजिक फायदे होंगे। इसका फायदा सिर्फ कार खरीदने वाले को नहीं बल्कि उस शहर में रहने वाले हर व्यक्ति को होगा।

    फायदे

    इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए सरकार अब इलेक्ट्रिक रोड बनाने पर भी काम कर रही है। ये रोड अपने ऊपर चलने वाले वाहनों को ऊर्जा की आपूर्ति करते हैं जिससे वाहनों को रिचार्ज होने के लिए कहीं रुकना नहीं पड़ता है।

    इन देशों में बनी ई-रोड

    जर्मनी में 1882 से ही सड़क परिवहन में ओवरहेड पावर लाइन का इस्तेमाल हो रहा है। 2018 के आंकड़ों के मुताबिक बर्लिन में ऐसी 300 ट्राली बस चलती हैं। इसके अलावा कोरिया, स्वीडन, न्यूजीलैंड में ब्रिटेन में ई-रोड बनी है। वहीं तेल अवीव में हाल में बनी ई-रोड में सड़क के नीचे बिछे क्वायल के जरिए बिजली की आपूर्ति की जाती है।

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