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    Book Review: पुस्तक 'माटी की मूरतें' में विलीन होती जाती मनुष्यता की मार्मिक शिनाख्त, रामवृक्ष बेनीपुरी के लेखन ने जीता दिल

    By Pooja SinghEdited By:
    Updated: Sun, 19 Sep 2021 11:06 AM (IST)

    भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाने वाले साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी ने वर्षों तक स्वाधीनता संघर्ष के लिए जेल में भी अपना समय बिताया था। उनका लेखन भारतीयता के उच्चतम आदर्शों में भीगा हुआ है जिस पर सामाजिक दृष्टि से भी समकालीन अर्थों में विमर्श संभव है।

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    पुस्तक 'माटी की मूरतें' में विलीन होती जाती मनुष्यता की मार्मिक शिनाख्त

    यतीन्द्र मिश्र। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाने वाले साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी ने वर्षों तक स्वाधीनता संघर्ष के लिए जेल में भी अपना समय बिताया था। उनका लेखन भारतीयता के उच्चतम आदर्शों में भीगा हुआ है, जिस पर सामाजिक दृष्टि से भी समकालीन अर्थों में विमर्श संभव है।

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    ‘माटी की मूरतें’ में इन किरदारों की कथा पर उकेरी गई

    आजादी की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर उनकी अमर कृति ‘माटी की मूरतें’ के बारे में आज का स्तंभ समर्पित है, जो पहली बार 1946 में प्रकाशित हुई थी। जब 1953 में इसका नवीन संस्करण प्रकाश में आया तो लेखक ने स्वयं यह सूचना दी कि पिछले छह सालों में इसकी 60 हजार से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं। ‘माटी की मूरतें’ ऐसी कहानियों का कोलाज है, जिसमें जीवन से जुड़े उन किरदारों की कथा उकेरी गई है, जो हमारे रोजमर्रा के संबंधों में आज भी अपनी पूरी सदाशयता के साथ मिल जाया करते हैं।

    पिछले वर्ष इस किताब का हुआ पुन: प्रकाशन

    बेनीपुरी जी इसकी भूमिका में लिखते हैं- ‘मैं साफ कह दूं, ये कहानियां नहीं, जीवनियां हैं। ये चलते-फिरते आदमियों के शब्द चित्र हैं। मानता हूं, कला ने उन पर पच्चीकारी की है, किंतु मैंने ऐसा नहीं होने दिया कि रंग-रंग में मूल रेखाएं ही गायब हो जाएं।’ इसी आलोक में ऐसे सशक्त और संवेदनशील रेखाचित्रों को पढ़ना एक सुखद अनुभव है, जिसके चलते हम मनुष्यता के प्रति विनीत बनने का भाव अपने भीतर नए सिरे से सिरजता हुआ पाते हैं। पिछले वर्ष प्रभात प्रकाशन ने इस किताब का पुन: प्रकाशन करके हिंदी की दुनिया को एक दुर्लभ सौगात दी है। जिंदगी के नजदीक और जिंदगी से उपजे हुए अनुभवों को एक मनुष्य का किरदार, किस तरह से दूसरों के लिए प्रेरक और सार्थक बनता है, इन कहानियों से गुजरकर देखा जा सकता है।

    12 रेखाचित्रों का है संग्रह

    12 छोटे-छोटे रेखाचित्रों का यह संग्रह विविधता से भरा है, जिनके 12 किरदार- ‘रजिया’, ‘बलदेव सिंह’, ‘सरजू भैया’, ‘मंगर’, ‘रूपा की आजी’, ‘देव’, ‘बालगोबिन भगत’, ‘भौजी’, ‘परमेसर’, ‘बैजू मामा’, ‘सुभान खां’ और ‘बुधिया’ हैं। ‘बालगोबिन भगत’ की कहानी में भगत जैसे उम्दा गायक के सामने उसके बेटे की मृत्यु और उस मृत्यु पर संयत भाव से विजय प्राप्त करने की कोशिश देखना असाधारण है। कहानी का सबसे सार्थक बिंदु यह है कि भगत अपनी युवा बहू को मनाते हुए उसे दूसरे विवाह के लिए राजी करता है। सादगी भरे जीवन की मनुष्यता की ऊंचाई पर पहुंचती हुई कहानी, जिसमें संगीत और विरह, विश्वास और आस्था, सभी कुछ प्रासंगिक ढंग से एक किरदार का बड़ा स्वभाव रचते हैं।

    सहज शब्दावली आपको पीड़ा के सारे अनुभव कराएगी

    बेनीपुरी जी की भाषा, सहज शब्दावली में भी आपको पीड़ा के वे सारे अनुभव करा देती है, जिसके लिए बड़े उपन्यास के लंबे आख्यान भी अक्सर कारगर नहीं होते। ‘परमेसर’ कहानी का दृश्य देखिए- ‘निस्संदेह परमेसर आवारा था, किंतु उसकी आवारागर्दी एक ऐसी आग थी, जो खुद को जलाती है, लेकिन दूसरे को रोशनी और गरमी ही देती है।’ इन्हीं पंक्तियों से पूरे चरित्र की बुनावट को समझा जा सकता है, जिसमें दूसरों के लिए अनुराग और खुद से वैराग्य का सामंजस्य विन्यस्त है।

    लेखक इन रेखाचित्रों में इस तथ्य को गंभीरता से पकड़े हुए है कि उनके द्वारा किसी भी व्यक्तित्व के बारे में कोई निर्णयात्मक कथन न लिखा जाए। खुले मैदान की तरह, सबके हित-अहित की भावना का ध्यान रखते हुए वह तटस्थ ढंग से उन परिस्थितियों का चित्रण करते हैं, जिसे उन्होंने वास्तविकता में देखा और अनुभूत किया है। एक तरह से ये ‘माटी की मूरतें’ समाज में मौजूद उन नींव की ईंटों की तरह हैं, जो किसी इमारत के बनने में तो अपना सर्वस्व न्यौछावर करती हैं, मगर आगे बढ़कर अंधकार में कहीं विलीन भी हो जाती हैं। विलीन होती जाती मनुष्यता की मार्मिक बानगी का दस्तावेज है यह किताब, जो भारतीय नवजागरण काल और स्वाधीनता पाने की उत्कंठा में त्याग की मिसाल रचने वाले समाज के बीच से निकलकर आई है। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ शायद इसीलिए बेनीपुरी जी को ऐसे विचारक के रूप में देखते थे, जिनके लेखन की आग राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों को जन्म देती है।

    रोचकता से भरपूर भाषा का इस्तेमाल

    ये जीवनियां भाषा और शिल्प की दृष्टि से भी उस दौर की रचनात्मकता का पता देती हैं, जब हिंदी में भाषा के स्तर पर ढेरों बदलाव हो रहे थे। शब्दों के आंचलिक प्रयोग, बयान की संक्षिप्ति, कहीं-कहीं बड़े वाक्यों में अद्र्ध और अल्प विराम के साथ, छोटे-छोटे वाक्यों का लंबा विन्यास पढ़ने में रोचक लगता है। बड़े से बड़े विचार को भी साधारण ढंग से रखने का सौजन्य, यह सब इस किताब की उपलब्धियों में शामिल है। कुछ पुराने शब्द पढ़ते हुए दादी-नानी के दौर की बतकही भी याद आती है, जो अब सिर्फ हमारी स्मृतियों का हिस्सा है, जैसे ‘जवार’, ‘बबुआ’, ‘खुर्दबीन’, ‘सुधुआपन’, ‘दोनों जून’, ‘खांची’, ‘दुपलिया’, ‘गुस्सावर’।

    इन 12 जीवनीपरक रेखाचित्रों में समाज और जीवन का वह सब कुछ पूरी उदात्तता के साथ शामिल है, जिसे पढ़ना मानवता के सच्चे सरोकारों से भेंट करने सरीखा है। नई पीढ़ी अगर इस बात से आश्वस्त होना चाहती है तो एक बार उसको रजिया, पहलवान बलदेव सिंह, गायक बालगोबिन भगत, सत्याग्रही देव और सुभान खां से मिलना चाहिए।