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उत्तरप्रदेश के फार्मूले पर कर्नाटक फतह की तैयारी में BJP, छोटे जातीय समूहों को जोड़ कर जीत दर्ज करने की कोशिश

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में लंबे अरसे भले ही सत्तारूढ़ पार्टी के जीतने की परंपरा नहीं रही हो और तमाम सर्वे भाजपा की स्थिति को बहुत माकूल नहीं बता रहे हों लेकिन भाजपा को इस बार उत्तरप्रदेश फार्मूले पर भरोसा है।

By Jagran NewsEdited By: Amit SinghPublished: Wed, 29 Mar 2023 08:14 PM (IST)Updated: Wed, 29 Mar 2023 08:14 PM (IST)
उत्तरप्रदेश के फार्मूले पर कर्नाटक फतह की तैयारी में BJP

नीलू रंजन, नई दिल्ली। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में लंबे अरसे भले ही सत्तारूढ़ पार्टी के जीतने की परंपरा नहीं रही हो और तमाम सर्वे भाजपा की स्थिति को बहुत माकूल नहीं बता रहे हों, लेकिन भाजपा को इस बार उत्तरप्रदेश फार्मूले पर भरोसा है। उत्तरप्रदेश की तरह भाजपा इस बार कर्नाटक में लिंगायत और वोकालिग्गा के बड़े राजनीतिक वोटबैंक के अलावा छोटे-छोटे जातीय समूहों को जोड़ने में जुटी है।

कर्नाटक में अधिक सीटें जीतने का दावा

उत्तरप्रदेश फार्मूले पर भरोसा जताते हुए भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कर्नाटक में बहुमत के लिए जरूरी 113 सीटों से भी 10-15 सीटें अधिक जीतने का दावा किया। उत्तरप्रदेश में 2014 से लगातार भाजपा की ऐतिहासिक जीत के पीछे छोटे राजनीतिक दलों के साथ तालमेल और हाशिये पर रही ओबीसी व दलित वर्ग की छोटे जातीय समूहों की गोलबंदी की अहम भूमिका रही। बिहार समेत अन्य राज्यों में भाजपा इस फार्मूले को समय समय पर आजमा चुकी है और उसके नतीजे बेहतर आए है। अब पहली बार भाजपा ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव में इस फार्मूले को आजमाने की तैयारी में है।

कर्नाटक में मुस्लिम बड़ा वोटबैंक

दरअसल कर्नाटक में लिंगायत, वोकालिग्गा, दलित, आदिवासी, ओबीसी और मुस्लिम बड़े वोटबैंक के रूप में देखे जाते हैं। इनमें से भाजपा का मुख्य जनाधार लिंगायत और जेडीएस का वोकालिग्गा है। इसके अलावा कांग्रेस पिछले पांच दशक से ओबीसी, दलित, आदिवासी और मुस्लिम वोटबैंक की राजनीति करती आ रही है। आदिवासी वोटबैंक में आधार का असर पार्टी गुजरात में दिखा चुकी है। भाजपा ने इस बार मुस्लिम को छोड़कर सभी वोकबैंक में सेंध लगाने के साथ ही इन जातीय समूहों में मौजूद उपजातियों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश में जुटी है।

सत्ता में हिस्सेदारी का भरोसा

विभिन्न जातीय समूहों और उनकी उपजातियों को जोड़ने के लिए भाजपा उनके गौरव के प्रतीकों के साथ ही सत्ता में हिस्सेदारी का भरोसा दे रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नवंबर में वोकालिग्गा समाज के लिए गौरव के सबसे बड़े प्रतीक केंपे गौड़ा की 108 फुट प्रतिमा का अनावरण किया। उसके बाद से भाजपा नेता विभिन्न क्षेत्रों में अब तक 16 मूर्तियों का अनावरण कर चुके हैं या बनाने का ऐलान कर चुके हैं। सरदार बल्लभ भाई पटेल, महादेश्वर स्वामी, देवी भुवनेश्वरी, अक्का महादेवी, कन्नड़ अभिनेता राजकुमार से लेकर शिवाजी महाराज तक की प्रतिमाएं शामिल हैं।

नए समीकरण साधने की कोशिश

बेलगावि में जहां शिवाजी की प्रतिमा लगाई वहां आसपास उनको मानने वालों की अच्छी खासी संख्या है। इसी तरह से बिदर के जिस इलाके में सरदार बल्लभ भाई की प्रतिमा लगाई गई है, उसे हैदराबाद के निजाम के अत्याचार से मुक्त करने में सरदार पटेल की अहम भूमिका थी। अमित शाह वहां के लोगों के इसे याद दिलाने से भी नहीं चूके। गौरव के प्रतीकों की स्थापना के साथ ही भाजपा ने आरक्षण के आजमाए हथियार के सहारे भी नए समीकरण साधने की कोशिश कर रही है। इसके तहत मुस्लिम को मिलने वाले चार फीसद आरक्षण को खत्म कर उसे दो-दो फीसद वोकालिग्गा और लिंगायत में बांट दिया गया है। कांग्रेस इसे मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है, लेकिन भाजपा इसे चुनावी फायदे के रूप में देख रही है।

एससी-एसटी कांग्रेस का पुराना वोटबैंक

इसके अलावा कर्नाटक सरकार एससी के मिलने वाले 15 फीसद आरक्षण को पहले ही 17 फीसद और एसटी को मिलने वाले तीन फीसद आरक्षण को सात फीसद कर चुकी है। ओबीसी, एससी और एसटी कांग्रेस का पुराना वोटबैंक रहा है। इसके अलावा भाजपा एससी की 101 जातियों में जनसंख्या के हिसाब से बराबर भागीदारी देने का वायदा कर रही है। जाहिर है आरक्षण के लाभों से वंचित रही एससी जातियां इसका स्वागत कर रही है। यही स्थिति ओबीसी और एसटी आरक्षण की भी है। यह देखना दिलचस्प होगा कि उत्तरप्रदेश फार्मूला कर्नाटक में कमल खिलाने में कितना कामयाब हो पाता है।


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