अजय कुमार राय। देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। इस दौरान हम सब वर्तमान की समस्याओं के समाधान अतीत में जाकर खोजने का प्रयास कर रहे हैं। राज खन्ना की पुस्तक 'आजादी के पहले, आजादी के बाद' भी पाठक को अतीत में ले जाती है और इतिहास की घटनाओं की पड़ताल कर उन वजहों की तलाश करती है, जिनके कारण वर्तमान में सामाजिक व नैतिक पतन हुआ।

पुस्तक तीन अध्यायों में बंटी हुई है- 'आजादी की अलख', 'जो भुला दिए गए' और 'आजाद भारत'। आजादी की लड़ाई के नायक होने के नाते सबसे अधिक सवाल-जवाब महात्मा गांधी से ही जुड़े हैं। पहले अध्याय में चौराचौरी की घटना के बाद असहयोग आंदोलन की वापसी, क्रांतिकारियों के रास्ते से उनकी असहमति, सरदार भगत सिंह की फांसी रोकने की आधी-अधूरी कोशिशें, सुभाष चंद्र बोस से उनके तल्ख रिश्ते, जिन्ना से उनकी मुलाकातें तथा विभाजन रोकने में नाकामी और उसके बाद के घटनाक्रम में उनकी भूमिका का जिक्र किया गया है। इसके अलावा कश्मीर समस्या, रजवाड़ों का विलय, विभाजन की त्रासदी आदि विषयों से जुड़े कई अछूते पहलुओं को भी उठाया गया है, जो इतिहास की किताबों में छूट गए हैं।

देश में आजादी की अलख जगाने वालों का रास्ता साफ था। वे आजादी चाहते थे। क्यों और किसके लिए चाहते थे, यह भी स्पष्ट था। जब यह कहा गया कि स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है तो इसके पीछे उनकी एक दृष्टि थी। अंग्रेज आक्रांता थेे। उन्होंने हमारे देश पर राज करने का अधिकार बल और छलपूर्वक हमसे छीन लिया था। वे व्यापारी बनकर आए थे और हमारी कमजोरियों का लाभ उठाकर हमारे शासक बन बैठे थे।

हमारे बीच के ही कुछ लोगों ने अपने पद, प्रतिष्ठा और वैभव की लिप्सा के चलते अंग्रेजों की मदद की। क्रांतिकारी देश की मुक्ति चाहते थे। अपने इस सपने को पूरा करने लिए उन्होंने संघर्ष के जो रास्ते अपनाए गए थे, उनको लेकर भी उनकी समझ स्पष्ट थी। क्रांतिकारियों के रास्ते अलग-अलग जरूर थे, लेकिन सबका ध्येय एक था। भारत हमारा था, हमारा है, हमारा रहेगा। अंग्रेजों को यहां से जाना पड़ेगा। शांति से या बल से। मुक्ति के इस सपने के साथ एक भारत का सपना भी क्रांतिकारियों ने देखा था। एक भारत, जहां सब बराबर हों, सबको विकास के सारे अधिकार हों, जाति-संप्रदाय को लेकर भेदभाव न हो, हर नागरिक मनुष्य की तरह समझा जाए, लोक की सत्ता हो और सत्ता में लोक हो। सवाल है कि आज हम आजाद हैं, लेकिन इस मुक्तिकामना से संघर्ष करने वाले, बलिदान देने वाले क्रांति योद्धाओं के सपने कहां गए?

पुस्तक के दूसरे अध्याय में देश को आजादी दिलाने वाले क्रांतिकारियों की बलिदान कथाओं का समावेश है और तीसरे अध्याय में आजादी के बाद देश के बदलते राजनीतिक घटनाक्रम और देश की लंबी पतन कथा के विकराल दौर का आख्यान है। इसमें गदर पार्टी के गुमनाम शहीदों-दारिस चेंच्याह, चंपक रमन पिल्लई, विष्णु गणेश पिंगले, सदाशिव पांडुरंग खंखोजे, जतिंदर लाहिड़ी, तारक नाथ दास, मौलवी बरकतुल्लाह, करतार सिंह सराबा, पंडित परमानंद के महान योगदान की चर्चा की गई है। काकोरी के शहीदों-अशफाक उल्ला, राजेंद्र लाहिड़ी, शचींद्र नाथ बक्शी, चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, केशव चक्रवर्ती, मुरारी लाल, बनवारी लाल और मुकुंदी लाल के बारे में बताया गया है। आजादी की अलख जगाने में इनके त्याग और बलिदान ने ऊर्जा का काम किया।

असेंबली बम विस्फोट पर एक पूरा लेख है। इसके अलावा नेताजी सुभाष चंद्र बोस, चापेकर बंधु, खुदीराम बोस, मदनलाल ढींगरा, जतींद्र नाथ दास, दुर्गा भाभी, भगवती चरण बोहरा, ऊधम सिंह, सरदार भगत सिंह, पंडित जवाहर लाल नेहरू, पुरुषोत्तम दास टंडन, आचार्य नरेंद्र देव, लाल बहादुर शास्त्री, गणेश शंकर विद्यार्थी, दीनदयाल उपाध्याय, राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण, चंद्रशेखर और इंदिरा गांधी तक को इस पुस्तक में शामिल किया गया है। बाद में चंद्रशेखर का एक बड़े नेता के रूप में उदय और क्रांति से उपजी व्यवस्था के पतन तक की इस पुस्तक में चर्चा की गई है। आपातकाल को याद करते हुए जेपी आंदोलन और इस बहाने एक बार फिर आजादी के आंदोलन की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के जागरण की बात कही गई है। दरअसल स्वाधीनता के मूल्य को समझने का यह एक बड़ा अवसर था।

पुस्तक : आजादी से पहले, आजादी के बाद

लेखक : राज खन्ना

प्रकाशक : प्रतीक बुक्स, दिल्ली

मूल्य : 500 रुपये

Edited By: Sanjay Pokhriyal