पीयूष द्विवेदी। स्त्री-हितों की चिंता में दुबले हो रहे वर्तमान भारतीय सत्ता और समाज के समक्ष भाजपा के दो सांसदों अंशुल वर्मा और हरिनारायण राजभर द्वारा पुरुष-हितों की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय पुरुष आयोग के गठन की मांग उठाई गई है। वे संसद में भी इस विषय को उठा चुके हैं और अब उनका कहना है कि वे ‘पुरुष आयोग’ के गठन हेतु लोगों का समर्थन जुटाने के लिए 23 सितंबर को नई दिल्ली में एक कार्यक्रम को संबोधित भी करेंगे। हालांकि सामान्य रूप से यह मांग थोड़ी अटपटी जरूर लग सकती है लेकिन तथ्यों के आधार पर वस्तुस्थिति का अवलोकन करने पर इसका औचित्य स्पष्ट हो जाता है। भारत में स्त्रियों की दुर्दशा पर चर्चा लंबे समय से होती रही है लेकिन इस रूप में कभी पुरुषों की स्थिति पर चर्चा नहीं सुनाई देती। यह एक भयंकर पूर्वाग्रह इस देश में व्याप्त है कि स्त्री-पुरुष के किसी भी संघर्ष में पीड़ित सिर्फ स्त्री ही हो सकती है पुरुष नहीं। पुरुष को हमेशा पीड़क की भूमिका में ही देखा जाता है।

स्‍त्री सुरक्षा के लिए कई कानून
त्रासदी यह है कि हमारे विधि-निर्माताओं ने स्त्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इस पूर्वाग्रह के आधार पर ही अनेक कानून भी बना डाले हैं। दहेज निरोधक कानून, घरेलू हिंसा अधिनियम, दुष्‍कर्म से संबंधित कानून सहित स्त्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए और भी कई छोटे-बड़े कानूनी प्रावधान अमल में लाए गए हैं। इन सब कानूनों की विशेषता यह है कि ये पूरी तरह से एकपक्षीय हैं और इनमें केवल पूर्वाग्रह के आधार पर अपराध होने से पूर्व ही पुरुष को अपराधी मानते हुए उसके प्रति हर प्रकार से कठोरता दिखाई गई है। अपने इस एकपक्षीय स्वरूप के कारण ये कानून स्त्री-हितों की रक्षा में कितने सफल हुए यह तो पता नहीं लेकिन जैसे-जैसे महिलाएं इन कानूनों से परिचित हुईं उन्होंने पुरुषों को धमकाने के लिए इनका इस्तेमाल जरूर शुरू कर दिया। ये कानून स्त्रियों की जिस सुरक्षा के लिए बने हैं वो तो ये प्रभावी रूप से कर नहीं पा रहे, लेकिन दुरुपयोग का उपकरण अवश्य बन गए हैं। आए दिन देश में ऐसे कानूनों के दुरुपयोग के मामले सामने आते रहते हैं।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो
उल्लेखनीय होगा कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक साल 2012 में दहेज निरोधक कानून के तहत दर्ज मामलों में 1,97,762 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें लगभग 25 फीसद महिलाएं थीं। इन महिलाओं में शिकायत करने वाली महिला की सास और ननद भी शामिल थीं। धारा 498ए के तहत दर्ज इन मामलों में चार्जशीट यानी आरोप पत्र दाखिल करने की दर 93.6 फीसद है जबकि आरोपियों पर दोष साबित होने की दर महज 15 फीसद है। घरेलू हिंसा कानून के साथ भी यही स्थिति है। बलात्कार से संबंधित धारा 376 में तो पक्षपात की सभी सीमाएं लांघ दी गई हैं। इस कानून के तहत स्त्री का आरोप लगाना भर आरोपी की गिरफ्तारी के लिए पर्याप्त होता है। इस कानून में आरोप सिद्ध करने की जिम्मेदारी से भी शिकायतकर्ता महिला को मुक्त रखा गया है बल्कि यह जिम्मेदारी आरोपी की होती है कि वह स्वयं को निदरेष साबित करे। नशे में सहमति लेकर बनाए गए संबंध को भी दुष्कर्म माना गया है। ऐसे एकपक्षीय प्रावधानों के बाद इस कानून का दुरुपयोग होना स्वाभाविक ही है। अप्रैल 2013 से जुलाई 2014 के बीच दिल्ली में रेप के 2,753 मामले दर्ज हुए, जिनमें से 1,464 मामले झूठे थे।

कानून का दुरुपयोग
महिलाएं इस कानून को पुरुषों से पैसे ऐंठने, अपनी बात मनवाने तथा किसी बात का बदला लेने आदि के लिए इस्तेमाल करती हैं। पिछले महीने ही सर्वोच्च न्यायालय ने 2001 के एक दुष्कर्म केस में दो आरोपियों को बरी कर दिया लेकिन इससे पूर्व वे दोनों आरोपी 10 और सात साल जेल की सजा काट चुके थे। न्यायालय भी अक्सर पुरुषों के खिलाफ इस कानून के दुरुपयोग पर टिप्पणी करते रहे हैं लेकिन पुरुषों को इस संकट से उबारने के लिए किसी की तरफ से कोई पहल नहीं होती बल्कि दिन प्रतिदिन इस कानून का दुरुपयोग बढ़ता ही जा रहा है। अभी हाल ही में सामने आई एक घटना के मुताबिक एक बारहवीं की छात्र ने दोस्त के साथ खूब शराब पी और फिर परिवार की डांट से बचने के लिए दुष्कर्म की झूठी कहानी गढ़ दी। कहानी कच्ची थी इसलिए पुलिस की जांच में लड़की की पोल खुल गई। यह घटना दिखाती है कि धारा- 376 लड़कियों के लिए अब दुरुपयोग से बढ़कर खिलवाड़ की वस्तु बनता जा रहा है। कारण यह कि आरोप झूठा साबित होने पर भी शिकायकर्ता महिला पर कोई कार्यवाही नहीं होती।

महिलाओं पर पुरुषों के अत्‍याचार 
इसमें कोई दो राय नहीं कि देश में महिलाओं पर पुरुषों द्वारा काफी समय से अत्याचार हुए हैं और कमोबेश अब भी हो रहे हैं, इसलिए उन्हें कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पुरुष भी इसी समाज का अंग हैं और सभी पुरुष अपराधी नहीं हैं। समस्या यही है कि हमने अपराध को भी स्त्री-पुरुष के खांचे में बांट दिया है और उसी आधार पर कानून बना बैठे हैं। हमें समझना होगा कि अपराधी सिर्फ अपराधी होता है। सामाजिक विधानों ने पुरुषों को निरंकुश अधिकार देकर स्त्रियों के प्रति अत्याचारी बनाया है लेकिन इसका उत्तर यह तो नहीं कि कानूनी विधानों के द्वारा स्त्रियों को भी निरंकुश शक्ति प्रदान करके पुरुषों के प्रति अत्याचारी बना दिया जाए? सामाजिक विधानों ने पितृसत्ता की स्थापना की जिसके दुष्परिणाम हम देख रहे हैं लेकिन बावजूद इसके कानूनी विधानों के जरिये मातृसत्ता की नींव रखने में लगे हैं।

पितृसत्ता और मातृसत्ता
सत्ता किसी की भी हो वह बुरी ही होती है। अगर पितृसत्ता बुरी है तो मातृसत्ता भी बुरी ही होगी। हमें सत्तात्मक नहीं समतामूलक समाज की स्थापना करने की दिशा में कदम उठाने होंगे और इसके लिए आवश्यक है कि स्त्री-पुरुष के बीच हर स्तर पर समानता लाई जाए। पुरुष कोई परग्रहवासी नहीं हैं कि उनके जीवन में समस्याएं न हों, उनके जीवन में भी अनेक समस्याएं होती हैं। कई मामलों में पुरुषों का जीवन महिलाओं से अधिक कठिन और चुनौतीपूर्ण होता है लेकिन उन पर न के बराबर ही चर्चा होती है। स्त्री-हितों की बात करना गलत नहीं है लेकिन उसके चक्कर में पुरुष-हितों की अनदेखी करना अनुचित है। स्त्री-पुरुष दोनों के यथासंभव समानता की स्थापना में ही समाज का कल्याण निहित है।

[लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं] 

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Posted By: Kamal Verma