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    मां के संघर्ष से पांच साल बाद मिला दिव्यांग बेटे को न्याय, करंट लगने से हुआ था बड़ा हादसा

    Updated: Sun, 31 Aug 2025 01:00 AM (IST)

    छत्तीसगढ़ के जशपुर नगर में जिला न्यायालय ने करंट लगने से 75 प्रतिशत दिव्यांग उनके राजमिस्त्री बेटे को 13.50 लाख रुपये मुआवजा भुगतान का निर्देश दिया है। कोर्ट ने बिजली विभाग और निर्माणाधीन मकान की मालकिन को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया है। ग्राम कोमड़ो निवासी जसंती बाई का बेटा अनूप भगत राजमिस्त्री का कार्य करता था। मां ने पांच वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ी।

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    मां के संघर्ष से पांच साल बाद मिला दिव्यांग बेटे को न्याय (सांकेतिक तस्वीर)

     जेएनएन, जशपुरनगर। अंतत: एक मां के संघर्ष को सफलता मिली और उनके दिव्यांग बेटे को पांच वर्षों के बाद न्याय मिला। इस बीच बीमार पति के साथ दिव्यांग बेटे की देखभाल के लिए उन्होंने मजदूरी भी की।

    राजमिस्त्री बेटे को मुआवजे का आदेश

    छत्तीसगढ़ के जशपुर नगर में जिला न्यायालय ने करंट लगने से 75 प्रतिशत दिव्यांग उनके राजमिस्त्री बेटे को 13.50 लाख रुपये मुआवजा भुगतान का निर्देश दिया है। कोर्ट ने बिजली विभाग और निर्माणाधीन मकान की मालकिन को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया है।

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    इस तरह बेटा हुआ था हादसे का शिकार

    ग्राम कोमड़ो निवासी जसंती बाई का बेटा अनूप भगत राजमिस्त्री का कार्य करता था। 23 जून 2020 को चिरोडिपा में सावित्री बाई नामक महिला के मकान का निर्माण करते समय वह करंट की चपेट में आ गया। निर्माण स्थल के समीप बिजली के खंभे के पास जमा वर्षा के पानी से करंट फैल गया था।

    जिला चिकित्सालय में प्राथमिक उपचार के बाद गंभीर स्थिति को देखते हुए उसे रायपुर रेफर किया गया। इस दुर्घटना में अनूप की जान तो बच गई, परंतु वह 75 प्रतिशत दिव्यांग हो गया। जिला मेडिकल बोर्ड ने उसे दिव्यांगता प्रमाण पत्र भी जारी किया।

    मां ने पांच वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ी

    मकान मालकिन और बिजली विभाग ने पूरे प्रकरण से पल्ला झाड़ लिया और कोई सहायता नहीं की। इसके बाद मां का संघर्ष शुरू हुआ। दिव्यांग बेटे को न्याय दिलाने के लिए जसंती बाई ने लगातार पांच वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ी।

    कोर्ट ने दिया आदेश

    अधिवक्ता सत्य प्रकाश तिवारी के माध्यम से परिवाद दायर किया। दोनों पक्षों के तर्कों और प्रमाणों का परीक्षण करने के बाद न्यायाधीश शैलेश अचयुत पटवर्धन ने शुक्रवार को फैसले में मकान मालकिन और राज्य विद्युत मंडल को दोषी ठहराया और क्षतिपूर्ति का आदेश दिया।