नई दिल्ली, जेएनएन। भारत में आईएएस बनने का सपना कई छात्रों के दिलों में होता है। ऐसा सपना जब कोई पत्रकारिता का स्टूडेंट देखता है, तो उसके सामने समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह है कि पत्रकारिता एवं जनसंचार से ग्रेजुएट होने वाले छात्र इस विषय को देश और राज्य स्तरीय सिविल सर्विस परीक्षाओं के लिए बतौर ऑप्शनल विषय नहीं चुन सकते हैं। सवाल यह है कि आजादी से पहले पढ़ाए जाने वाले इस कोर्स को संघ लोक सेवा आयोग (Union Public Service Commission) में अबतक ऑप्शनल विषय का दर्जा नहीं मिला है।

1941 से मिल रही है डिग्री
भारत में पत्रकारिता की पढ़ाई सबसे पहले पंजाब विश्वविद्यालय में शुरू हुई थी। उस वक्त भारत का विभाजन नहीं हुआ था, तो यह पाकिस्तान के लाहौर में स्थित था। यह साउथ एशिया का सबसे पुराना मास कम्युनिकेशन का डिपार्टमेंट है। इसके अलावा 1965 में  भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) की स्थापना पत्रकारिता को देखते हुए की गई। भारत के कुल 43 जनरल केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से 39 विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता एवं जनसंचार अथवा मीडिया अध्ययन के विभाग हैं। वहीं, भोपाल का माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय और रायपुर का कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं में सिर्फ पत्रकारिता एवं जनसंचार ही पढ़ाया जाता है। इसके अलावा देश में लगातार पत्रकारिता के प्राइवेट संस्थान भी खुल रहे हैं। ऐसे में हर साल भारी मात्रा में ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट छात्र ऐसे संस्थान से बाहर आ रहे हैं।

48 विषयों में नहीं मिला स्थान
संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा देने के लिए कुल 48 विषयों को ऑप्शनल सूची में रखा गया है, लेकिन इसमें पत्रकारिता या जनसंचार को शामिल नहीं किया गया है। अब जो बच्चे ग्रेजुएशन के तीन साल और पोस्ट ग्रेजुएशन के दो साल इस विषय को देते हैं, उनके लिए UPSC की तैयारी करना मुश्किल हो जाता है। उन्हें अपने विषय से हटकर दूसरे विषय की तैयारी करनी पड़ती है।

परेशान हैं छात्र
इसको लेकर छात्रों में एक किस्म की नाराजगी नजर आ रही है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से ग्रेजुएशन कर रहे अभिनव कुमार का कहना है,'मैं आईएएस आधिकारी बनना चाहता हूं। ऐसा न होने पर मुझे दूसरे विषय को ऑप्शनल विषय के रूप में चुनना पड़ेगा। इस वजह से सोच रहा हूं कि मास्टर राजनीति विज्ञान में कर लूं। हालांकि, अगर मास कम्युनिकेशन को ऑप्शनल सूची में शामिल किया जाता है, तो आसानी होती।' अभिनव अभी स्नातक के छात्र हैं। उनके सामने पोस्ट ग्रेजुएशन करने का मौका है। सबसे ज्यादा दिक्कत पोस्ट ग्रेजुएशन कर चुके छात्रों को करना पड़ता है।  

Edited By: Rajat Singh

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