कार्यस्थल में क्या है स्त्री के अधिकार
कसी व्यवसाय, नौकरी या प्रोफेशन को करने का अधिकार हर भारतीय को है। यह मौलिक अधिकार है। यदि जीने का अधिकार है तो इज्जत से जीने का, अपनी मर्जी से कार्य करने का अधिकार भी इसमें ही शामिल है। पर यह तभी हो सकता है, जब कार्यस्थल 'सुरक्षित' हो, अनावश्यक परेशानियों से मुक्त हो।

किसी व्यवसाय, नौकरी या प्रोफेशन को करने का अधिकार हर भारतीय को है। यह मौलिक अधिकार है। यदि जीने का अधिकार है तो इज्जत से जीने का, अपनी मर्जी से कार्य करने का अधिकार भी इसमें ही शामिल है। पर यह तभी हो सकता है, जब कार्यस्थल 'सुरक्षित' हो, अनावश्यक परेशानियों से मुक्त हो।
स्त्रियों के संदर्भ में यह असुरक्षा तब और बढ़ जाती है, जब दैहिक या लैंगिक आधार पर उन्हे परेशान किया जाता है। यदि ऐसा माहौल कार्यस्थल में हो तो यह काम करने के माहौल को नष्ट करता है, साथ ही उनकी कार्यक्षमता और ऊर्जा को कम करता है।
विशाखा बनाम राजस्थान का केस
इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए आज से ठीक दस वर्ष पहले 'विशाखा बनाम राजस्थान' के मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने एक फैसला दिया था, जिसकी चर्चा तो बहुत ज्यादा हुई, लेकिन अमल उस हिसाब से नहीं हुआ। खुद सर्वोच्च न्यायालय एवं अन्य न्यायालयों में भी ऐसी कमेटियों का निर्माण नहीं किया गया, जिनकी सिफारिश इस फैसले में की गई। फिर भी कई कार्यालयों में इनका निर्माण हो गया है। एक जागरूकता स्त्रियों में यह आई कि वे ऐसी विपरीत स्थिति में क्या करे या दफ्तरों में होने वाले यौन उत्पीड़न का सामना कैसे करे।
क्या है यौन उत्पीड़न
अगर लड़कियां नई नौकरी में है तो यह जानना जरूरी है कि यौन उत्पीड़न है क्या?
यह वास्तव में ऐसी हरकतें हैं, जिनके प्रति कोई भी स्त्री असहज महसूस करती है, जिनके चलते वह काम नहीं कर पाती। इस संबंध में कार्यालयों में यदि इनमें से किसी भी स्थिति का सामना स्त्री को करना पड़े, जैसे-
1. शारीरिक छेड़छाड़ या आगे बढ़ने की चेष्टा
2. शारीरिक संबंध बनाने की मांग या प्रार्थना
3. द्विअर्थी वाक्यों का प्रयोग
4. अश्लील तसवीरे दिखाना
5. अवांछनीय शारीरिक, शाब्दिक या इशारा
तो ये सारी बातें यौन उत्पीड़न के अंतर्गत आती है यानी वे सारी हरकतें जो काम करने, महीनावार मानदेय लेने, नौकरी पाने, प्रोन्नति पाने में मुश्किलें पैदा करें, नकारात्मक माहौल बनाएं, वे सब इसमें शामिल की जा सकती है।
नियोक्ता की ़िजम्मेदारी
किसी भी नियोक्ता की यह जिम्मेदारी बनती है चाहे वह सरकारी हो या ़गैर-सरकारी, यौन प्रताड़ना को रोकने के लिए समुचित कदम उठाए, पीड़िता की मदद करे।
नियोक्ता को इसके लिए निम्नलिखित उपाय करने पड़ेगे-
1. उपरोक्त दिशा-निर्देश कार्यालय की नियमावली में लगाए जाने चाहिए और उसकी पहुंच सब तक होनी चाहिए। साथ ही निषेधात्मक कृत्य करने पर उचित सजा का प्रावधान होना चाहिए।
2. जहां नियमावली न हो, वहां उचित जगह निर्देश चिपकाए जाने चाहिए कि सभी जानें कि अच्छा माहौल कैसे बनाया जाता है। यदि कोई गलती करे तो उसकी सजा क्या होगी?
3. प्राइवेट नियोक्ता के विषय में यह सब इंडस्ट्रियल इंप्लॉयमेंट एक्ट, 1946 में शामिल होगा।
4. स्त्री को मालूम हो कि उसके काम के घंटे, विश्राम के घंटे और सहज रहने का माहौल उसके अनुरूप है, पुरुषों से कम नहीं है।
आपराधिक कार्यवाही
यदि कोई सहकर्मी, बॉस ऐसी हरकत करता है तो उसके विरुद्ध भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत मुकदमा हो सकता है। इसके लिए बॉस (यदि अभियुक्त नहीं है तो) या कार्यालय द्वारा बनाई गई कमेटी खुद भी मुकदमा फाइल कर सकती है या मुकदमा फाइल करने में मदद करेगी।
बात बढ़ने पर पीड़िता ट्रांसफर की बात कर सकती है, जो उसे दिया जाएगा। अभियुक्त के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही हो सकती है। कार्यालय में एक कम्प्लेंट कमेटी होनी चाहिए, जो ऐसे मामलों का निष्पादन करे। इस कमेटी मे महिला शीर्ष पर हो, इसमें एक थर्ड पार्टी जैसे एन.जी.ओ. भी हो। इसके अलावा यदि स्त्री कर्मचारी को बाहर का कोई व्यक्ति कार्यालय आने-जाने में तंग करता है तो कार्यालय को उसकी सुरक्षा के उपाय एवं मुकदमा लड़ने की सुविधा देनी चाहिए।
(1997 में लीगल जर्नल (स्केल) वॉल्यूम 5, पेज-453 में उल्लिखित)
कमलेश जैन
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