ज्ञान का प्रवाह है उपनिषद गंगा

दूरदर्शन पर मार्च से आरंभ होगा डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी लिखित और निर्देशित 'उपनिषद गंगा' का प्रसारण। इस धारावाहिक के कथ्य, शिल्प और प्रस्तुति के बारे में बता रहे हैं डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी
भारत की आध्यात्मिक धरोहर
उपनिषद को मैं भारत की आध्यात्मिक धरोहर मानता हूं। उस समय के चिंतकों जिन्हें हमलोग ऋषि कहते हैं, उन्हें मैं सामाजिक वैज्ञानिक कहता हूं। उनके विचारों में भारत एक भौगोलिक इकाई के रूप में नहीं रहता। वे समग्र विश्व समुदाय पर विमर्श करते हैं। उनके चिंतन में संघर्ष-द्वंद्व की समाप्ति और संपूर्ण मानव जाति के सुख के विषय होते थे। पूरे ब्रह्माण्ड में वे एक ऐसी कल्पना को ढूंढ रहे हैं, जिससे उसकी एकात्मता को सिद्ध किया जा सके। यह एकात्मता उनकी कल्पना है या यथार्थ है, इस संदर्भ में ऋषियों का समग्र चिंतन और चिंतन के कारण मानवता के समक्ष खड़े प्रश्नों के उत्तर ढूंढने की कोशिश ही वेदांत है। वेदांत के बाद तमाम लोगों ने उस पर भाष्य और कई चीजें लिखीं, जो एक वृहद प्राचीन भारतीय साहित्य बना। यह साहित्य समय के साथ लुप्त हो रहा है। चिन्मय मिशन की क्रिएटिव विंग चिन्मय क्रिएशन ने इसे संरक्षित करने का प्रयास किया है।
गंगा शब्द क्यों
मैंने धारावाहिक के लिए उपनिषद गंगा शीर्षक चुना क्योंकि भारत की पूरी वैचारिक धरोहर का विकास गंगा के किनारे हुआ है और जैसे गंगा का प्रवाह अनवरत है, उसी प्रकार चिंतन का यह प्रवाह अनवरत है। वैदिक काल के याज्ञवल्क्य हों या मुगल काल के दारा शिकोह हों या आधुनिक युग के रामकृष्ण परमहंस-विवेकानंद हों या स्वामी चिन्मयानंद हों..सभी उसी से अपनी प्रेरणा पाते हैं और उस विचार को अभिव्यक्त करते हैं। संक्षेप में उपनिषद भारतीय चिंतन का मूल स्रोत है। चूंकि उसका प्रवाह रुक गया है, इसलिए नए सिरे से कोशिश हो रही है कि प्रवाह जारी रहे। उपनिषद में अवधारणाएं हैं। दृश्य-श्रव्य माध्यम के लिए उसमें पर्याप्त कहानियां नहीं हैं, जिनके माध्यम से उन्हें चित्रित किया जा सके। कुछ कहानियां मिलती हैं। कुछ में प्रारंभ है, कुछ में मध्य है और अंत नहीं है। कुल मिलाकर एक कथाचित्र के लिए जैसी कहानियों की आवश्यकता होती है, उस तरह की कहानियां उसमें नहीं हैं।
नया शिल्प
काफी सोच-विचार करने के बाद मुझे लगा कि क्यों न अवधारणाएं उपनिषदों से ली जाएं और उन अवधारणाओं को व्याख्यायित एवं चित्रित करने लायक कहानियां पूरे भारतीय साहित्य से ढूंढी जाएं। इस तरह प्राचीन से वर्तमान भारतीय साहित्य तक ऐसी कहानियां ढूंढी गई। ये अवधारणाएं इतनी गूढ़ हैं कि उनके लिए एक सूत्रधार की आवश्यकता थी। प्राचीन भारतीय नाट्य परंपरा से हमने सूत्रधार, विदूषक, अभिनेत्री और नटी लिए। संस्कृत नाटक की परिपाटी का शिल्प चुना गया। इस परिपाटी में हम सबसे पहले विचार का आह्वान करते हैं, सारे कलाकार मंच पर आते हैं। संस्कृत नाटकों में जैसे नांदी गायी जाती है, वैसे सारे कलाकार उपनिषद या समवर्ती ग्रंथों से विचार और अवधारणाएं रखते हैं, बाद में नाटक के रूप में उसका विकास होता है और अचानक हम किसी एक बिंदु पर वास्तविक जगत में चले जाते हैं। मंच की शक्ति के लिए सिनेमा की शक्ति का इस्तेमाल किया गया और मंच को सिनेमा के तौर पर ट्रीट किया गया। दो विधाओं का अच्छा योग दर्शक 'उपनिषद गंगा' में देखेंगे।
मुश्किल रहा लेखन
पहले मेरे मन में इसको लिखने का कोई इरादा नहीं था। मैंने समकालीन प्रसिद्ध लेखकों को 'उपनिषद गंगा' लिखने के लिए आमंत्रित किया था, परंतु उनके पास इसे न लिखने के अलग-अलग कारण थे। आखिरकार मुझे लिखना पड़ा। इस काम में पटना के फरीद खान ने मेरा साथ दिया। लेखन का काम मैंने और फरीद खान ने किया है।
[अजय ब्रह्मात्मज]
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