धान की वैज्ञानिक खेती : रोपाई से पहले ऐसे करें खेत की तैयारी, ये हैं प्रमुख फायदें

धान की मुख्यतः तीन उप-प्रजातियां है इंडिका, जैपोनिका और जावनिका।
Publish Date:Tue, 03 Aug 2021 03:25 PM (IST)Author: Author: Ankit Kumar

नई दिल्ली, ब्रांड डेस्क। धान दुनिया की मुख्य खाद्यान्न फसल है जो कि 60 फीसदी आबादी का भोजन है।। ऐसा माना जाता है कि दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों भारत, म्यांमार और थाईलैंड में सबसे पहले धान की खेती शुरू हुई थी। धान की मुख्यतः तीन उप-प्रजातियां है इंडिका, जैपोनिका और जावनिका। जहां इंडिका प्रजाति का चावल आकार में लंबा होता है वहीं जैपोनिका प्रजाति का धान गोल तथा जावनिका प्रजाति का धान मध्यम आकार का होता है। 

भारत समेत दुनिया के 100 से अधिक देशों में धान की खेती होती है। आज दुनियाभर में 156 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती होती है जिससे हर साल 5,98,852 हजार टन धान का उत्पादन होता है। बता दें कि दुनिया का 90 फीसदी चावल का उत्पादन तथा उपभोग एशियाई देशों में किया जाता है। चीन के बाद भारत में सबसे ज्यादा धान का उत्पादन होता है। जहां चीन में दुनियाभर के कुल उत्पादन का लगभग 31.37 प्रतिशत उत्पादन होता है। वहीं भारत में लगभग 44.6 मिलियन हेक्टेयर रकबे पर धान की खेती की जाती है। जो कि दुनिया के कुल उत्पादन का 22.40 फीसदी है। इसके अलावा इंडानेशिया, बांग्लादेश, वियतनाम, थाईलैंड और म्यांमार प्रमुख धान उत्पादक देश है।

प्रति हेक्टेयर उत्पादन में भारत पीछे

भारत भले ही दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा धान उत्पादक देश है लेकिन प्रति हेक्टेयर के औसत उत्पादन में बहुत पीछे हैं। इस मामले में मिस्र सबसे आगे हैं। मिस्र में प्रति हेक्टेयर से औसत उत्पादन 9086 किलोग्राम ( 9 टन) धान का उत्पादन होता है। वहीं यूएसए दूसरे स्थान पर है। यहां प्रति हेक्टेयर से औसत उत्पादन 7037 (7 टन) किलोग्राम होता है। जापान 6702 (6 टन) किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उत्पादन के साथ तीसरे पायदान पर है। वहीं भारत में प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन 3000 (3 टन) किलोग्राम ही है। इसकी सबसे बड़ी वजह हैं आज भी देश में परंपरागत तरीके से ही धान की खेती की जा रही है। ऐसे में उत्पादन को बढ़ाने के लिए किसानों को वैज्ञानिक तरीके से धान की खेती करना होगी।

प्रमुख धान उत्पादक राज्य

आज भारत की 65 फीसदी आबादी पूरी तरह से या आंशिक रूप से धान पर निर्भर है। वहीं देश के महज 6 राज्य आंध्र प्रदेश, असम, केरल, उड़ीसा, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल कुल उत्पादन का 80 फीसदी धान उपभोग करते हैं। वहीं सबसे ज्यादा धान का उत्पादन पश्चिम बंगाल में होता है। यहां कुुल 54.34 लाख हेक्टेयर में धान की खेती होती है जिससे सालाना लगभग 146.06 लाख टन धान का उत्पादन होता है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, पंजाब, बिहार तथा छत्तीसगढ़ राज्य प्रमुख धान उत्पादक प्रांत है।

कैसे करें खेती की तैयारी?

धान के पौधे पहले नर्सरी में तैयार किए जाते हैं इसके बाद खेत की तैयारी पूरी करके रोपाई की जाती है। धान के बेहतर उत्पादन के लिए खेत की तैयारी आधुनिक कृषि मशीनरी की मदद से करना चाहिए जिससे लागत काफी कम हो जाती है। दरअसल, अन्य फसलों की तरह आज धान की खेती काफी खर्चीली है। ऐसे में वैज्ञानिक सुझावों को अपनाकर सही तरीके से मशीनरी का उपयोग किया जाता है तो खर्च कम हो जाता है वहीं उत्पादन में इजाफा होता है। धान उत्पादन को बढ़ाने के लिए खेत की सही तरीके से जुताई करना बेहद आवश्यक है। बता कि दें खेत को सही तरीके से तैयार करने से पौधे की जड़ें आसानी वृद्धि करेगी और पौधे का समूचा विकास होगा। वहीं खरपतवार नियंत्रण में भूमि की तैयारी बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके अलावा पौधे को पोषक तत्वों को ग्रहण करने में आसानी होती है। आइए जानते हैं खेत की तैयारी के लिए किन कृषि यंत्रों का उपयोग कब और कैसे करें-

ग्रीष्मकालीन जुताई

रबी की फसल कटने के बाद प्लाऊ की मदद से खेत की गहरी जुताई करें व खेत को कुछ दिनों के लिए बिना पाटा दिए छोड़ दें। इससे कई तरह के फायदे हैं। दरअसल, इस जुताई के कारण विभिन्न अवस्था में छुपे कीट व उनके अंडे मिट्टी ऊपरी सतह पर आ जाते हैं। जो कि सूरज की तेज धूप के कारण मर जाते हैं, वहीं इन्हें चिडि़यां या अन्य पक्षी खा जाते हैं। इसके अलावा मिट्टी में कई प्रकार के सूत्र कृमि, फफूंदनाशी भूमि में रहते हैं जो तेज धूप में नष्ट हो जाते हैं। खेत में कोई फसल नहीं होने के कारण कई तरह खरपतवार उग आते हैं जिन पर विभिन्न प्रकार के कीट पैदा हो जाते हैं। इस जुताई के कारण खरपतवार और कीट नष्ट हो जाते हैं। इसके अलावा धान की फसल को सबसे ज्यादा नुकसान चूहे पहुंचाते हैं। गहरी जुताई के कारण चूहों के बिल भी खत्म हो जाते हैं। इस तरह गर्मी के दिनों में की गई इस गहरी जुताई से फफूंदनाशी, कृमिसूत्र तथा कीटनाशी आदि से फसल को बचाया जा सकता है। प्लाऊ के लिए Mahindra 475 DI XP Plus व Mahindra 575 DI XP Plus बेहतर ट्रैक्टर है। इनकी हाइड्रोलिक क्षमता क्रमश: 1500 व 1650 किलोग्राम है। किफायती माइलेज की वजह से यह किसानों के पसंदीदा ट्रैक्टर है। इससे लागत खर्च काफी कम हो जाता है।

हैरोविंग

यह खेत की जुताई का दूसरा चरण होता है। प्लाऊ के बाद पिछली फसल के अवशेष तथा विभिन्न खरपतवार मिट्टी की ऊपरी सतह पर आ जाते हैं। ऐसे दो-तीन जुताई करके खेत को तैयार किया जाता है.

कल्टीवेटर : प्लाऊ के बाद कल्टीवेटर से खेत की एक-दो जुताई करें। इससे पिछली फसल के उपयोगी अवशेष मिट्टी में अच्छी तरह मिलकर जैविक खाद में प्रवर्धित हो जाते हैं। यही वजह है कि मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बढ़ती है। कल्टीवेटर से जुताई करने से मिट्टी की पानी ग्रहण करने की क्षमता में भी इजाफा होता है। वहीं इससे मिट्टी में हमेशा नमी बनी रहती है।

रोटावेटर : रोटावेटर की मदद से खेत को आसानी समतल किया जा सकता है। वहीं यह अनावश्यक खरपतवारों को खेत से बाहर कर देता है। इससे मिट्टी आसानी से भुरभुरी बनाई जा सकती है। जिससे धान की रोपाई आसानी से की जा सकती है। जहां कल्टीवेटर से खेत की दो तीन जुताई करना पड़ती है वहीं रोटावेटर की एक ही जुताई से खेत अच्छी तरह से तैयार हो जाता है। इससे समय तथा लागत खर्च दोनों की बचत होती है। किसानों के लिए Mahindra Tez-e ZLX Rotavator बेहद उपयोगी मशीन है।

वहीं रोटावेटर को चलाने के लिए Mahindra 275 DI TU XP Plus ट्रैक्टर बेहद उपयोगी है। दरअसल, इसका इंजन बेहद दमदार है, जो भारी उपकरण उठाने में भी सक्षम है। वहीं इसका PTO पॉवर शानदार है, जिससे रोटावेटर को चलाने में ट्रैक्टर पर दबाव कम पड़ता है। दबाव कम पड़ने से ईंधन कम खर्च होता है, जिससे खेती की लागत कम आती है। इसका हाइड्रोलिक हाईटेक है जो ट्रैक्टर के चालू करते ही काम शुरू कर देता है। 39 HP का यह ट्रैक्टर कठिन कामों को आसानी से करने में सक्षम है। इसके अंदर 8 फारवर्ड और 2 रिवर्स गियर्स है, जिन्हें आसानी से बदला जा सकता है। इसके गियर बॉक्स लंबे समय तक चलते है वहीं चालक को थकान कम होती है। इस ट्रैक्टर पर महिंद्रा 6 साल और 6000 घंटों की वारंटी देता है। यह एक घंटे में एक लीटर डीजल की बचत करता है, जो किसानों के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो रहा है।

भूमि की तैयारी का महत्व

1. भूमि की तैयारी से खरपतवार नियंत्रण में मदद मिलती है।

2. मिट्टी में पानी तथा पोषक तत्वों को ग्रहण करने की क्षमता बढ़ती है।

3. इससे फसल में उर्वरक का एक समान वितरण होता है जिससे उत्पादन बढ़ता है।

4. पानी के बहाव और वायु संचरण में मदद मिलती है।

Copyright © Jagran Prakashan Ltd & Mahindra Tractors
Registrer Now
This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.Accept