धान की खेती: मशीनीकरण और आधुनिक तकनीकी अपनाकर लागत कम करें

लिहाजा, खेती के लिए आधुनिक तकनीकों, उपकरणों तथा वैज्ञानिक तौर-तरीकों को अपनाना बेहद जरूरी हो जाता है। (Pti)
Publish Date:Fri, 13 Aug 2021 05:17 PM (IST)Author: Author: Ashish Deep

नई दिल्‍ली, ब्रांड डेस्‍क। आज देश में धान की खेती करने वाले किसानों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ पानी की समस्या है तो दूसरी तरफ खेती की बढ़ती लागत। नतीजतन, धान की खेती करने वाले किसानों को अपेक्षित मुनाफा नहीं मिल पा रहा है। लिहाजा, खेती के लिए आधुनिक तकनीकों, उपकरणों तथा वैज्ञानिक तौर-तरीकों को अपनाना बेहद जरूरी हो जाता है। गौरतलब हैं कि आज कृषि क्षेत्र में मशीनीकरण का महत्त्व बढ़ता ही जा रहा है। बावजूद देश में अधिकतर किसान धान या दूसरी फसलों की खेती के लिए परंपरागत कृषि यंत्रों और उपकरणों का ही प्रयोग कर रहे हैं। जिसमें मेहनत, समय और खर्च ज्यादा लगता है, वहीं अपेक्षित उत्पादन भी नहीं मिल पाता है। ऐसे में अगर आधुनिक कृषि यंत्रों, उपकरणों तथा पद्धितियों को अपनाकर धान या दूसरी फसलों की खेती जाए तो लागत कम करके के उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। 

मशीनीकरण से लागत में 30 फीसदी कमी संभव

कृषि विशेषज्ञों का कहना हैं कि आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा ट्रैक्टर उत्पादक देश है। इसके बावजूद खेती के लिए देश में ट्रैक्टर एवं बड़ी मशीनों का प्रयोग सीमित है। बदलते वक्त के साथ आज खेती में यांत्रिकीकरण एवं मशीनीकरण बेहद जरुरी है। विशेषज्ञों का कहना हैं कि खेती में मशीनीकरण के प्रयोग से खेती की लागत में 25 से 30 फीसदी कमी लाई जा सकती है। वहीं मशीनीकरण के सही प्रयोग से बीज, खाद एवं उर्वरक के खर्च में 15 से 20 फीसदी बचत की जा सकती है। ऐसे में किसानों को आधुनिक कृषि यंत्रों और उपकरणों की मदद से खेती करना चाहिए।

 

बचत ही किसानों का असली मुनाफा

आज आधुनिक कृषि यंत्रों और उपकरणों के बगैर खेती की कल्पना नहीं की जा सकती है। ऐसे में किसानों को अधिक से अधिक कृषि यंत्रों और उपकरणों का प्रयोग करके खेती करना चाहिए। दरअसल, पिछले कुछ सालों में खेती के लिए श्रमिक संसाधन और मजदूरों की संख्या काफी घट गई है। ऐसे में पारंपरिक खेती आज महंगी होती जा रही है। ऐसे में किसानों को आधुनिक कृषि यंत्रों और उपकरणों का अधिक से अधिक उपयोग करके लाभ कमाना चाहिए। कृषि वैज्ञानिकों का भी यही मानना हैं कि कृषि यांत्रिकीकरण और मशीनीकरण के जरिये ही किसानों के श्रम, समय और पैसों की बचत करके उन्हें अच्छा मुनाफा दिलाया जा सकता है।

आधुनिक तकनीकों ने बनाई जगह

कृषि क्षेत्र में भी आज आधुनिक तकनीकों ने जगह बना ली है। आज खेती के लिए रोबोट, ड्रोन, मोबाइल, कस्टमाइज्ड इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस आदि का प्रयोग खेती के लिए किया जाने लगा है। यही वजह हैं कि कृषि वैज्ञानिक आज खेत की जुताई, बुआई, कटाई आदि में काम आने वाले छोटे-छोटे कृषि यंत्रों, उपकरणों और मशीनों को किसानों को आसानी से उपलब्ध कराने के लिए प्रयासरत है। आज पॉवर हैरो, कल्टीवेटर, रोटावेटर, डिस्क हल, लेजर लेवलर, लीजर, सीड ड्रील, धान ट्रांसप्लांटर, सब्जी ट्रांसप्लांटर, मिनी टिलर, पॉवर टिलर, पोस्ट हार्वेस्ट उपकरण है जिन्होंने खेती को आसान बना दिया है।

धान की खेती के लिए अपनाएं मेडागास्कर विधि?

आज धान के किसानों को खेती की बढ़ती लागत के कारण अपेक्षित मुनाफा नहीं मिल पा रहा है। वहीं जिन क्षेत्रों में धान की खेती की जाती है, वहां पानी की भी बेहद कमी है। इस वजह फसल का अधिक उत्पादन भी नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में धान किसानों को कृषि यांत्रिकीकरण और मशीनीकरण के साथ धान की आधुनिक पद्धितियों को भी अपनाना होगा, तभी उन्हें अधिक मुनाफा मिल पाएगा। ऐसे में धान की खेती के लिए किसानों को मेडागास्कर या एसआरआई (System of Rice Intensification) विधि अपनाने की जरुरत है। जो किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। दरअसल, इस विधि को अपनाकर 30 से 80 फीसदी तक उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है।

क्या है SRI विधि और क्यों धान किसानों के लिए फायदेमंद है

हाल के वर्षो में यह तकनीक भारत में तेजी से प्रचलन में आई है। देश के कई हिस्सों में प्रोग्रेसिव फार्मर इस तकनीक से धान की खेती करके अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। इस विधि को सबसे पहले साल 1983 में हेनरी डी लाउलेनी ने अफ्रीकी देश मेडागास्कर में विकसित किया था। उन्होंने यहां के धान किसानों के साथ मिलकर लगभग 30 से 35 सालों तक अध्ययन किया। वर्तमान में दुनिया के 50 से अधिक देशों में इस तकनीक को अपनाया जा रहा है। यह धान की खेती के लिए एक कारगर तकनीक है। इससे भूमि, श्रम, पूंजी तथा पानी की काफी बचत होती है। हेनरी ने 30 से 35 साल के अपने अध्ययन में यह पाया कि इस तकनीक से यदि धान की खेती की जाए तो 30 से 80 फीसद तक उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। वहीं 40 से 60 फीसदी तक पानी, 70 से 80 फीसदी तक बीज की बचत की जा सकती है। वहीं इस प्रणाली में जैविक तरीके से खेती की जाती है इस वजह से रासायनिक खाद एवं उर्वरक की बचत होती है। जिससे खेती की लागत भी काफी कम आती है। वहीं जैविक उत्पादन के दाम भी बाजार में अधिक मिलते हैं। बता दें कि आजकल जैविक उत्पादों की जबरदस्त डिमांड है।

SRI प्रणाली में नर्सरी कैसे तैयार करें?

इस तकनीक से महज 8 से 10 दिनों में पौधे रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं। एक एकड़ में धान की खेती करने के केवल 20 फीट लंबाई, 4 फीट चौड़ाई की बेड तैयार करना होती है। वहीं बेड की मोटाई लगभग 5 से 6 फीट तक होती है। इस विधि में बेड का निर्माण चार स्तरों में किया जाता है। सबसे पहले प्लास्टिक पॉलीथिन को बेड पर बिछाए। इसके बाद जैविक खाद से डेढ़ से दो इंच की मोटी परत बनाते हैं। दूसरी लेयर डेढ़ इंच मोटी मिट्टी से तैयार करते हैं। तीसरी लेयर फिर से जैविक खाद से बनाई जाती है। अंतिम लेयर मिट्टी से निर्मित की जाती है जो दो इंच मोटी होती है। अब इस बेड पर धान के बीजों की बुवाई की जाती है। जब धान के बीजों में अंकुरण हो जाए उसके बाद विभिन्न जैविक पदार्थो को बेड के ऊपर डाल देते हैं।

पारंपरिक प्रणाली से कैसे अलग है SRI विधि

1. बीजमात्रा-धान की यह एक उन्नत तकनीक है जिसमें नर्सरी के लिए बेड का निर्माण किया जाता है। वहीं पारंपरिक तरीके से समतल खेत में नर्सरी तैयार की जाती है। इससे बीज की खपत अधिक होती है। पारंपरिक नर्सरी में एक एकड़ के लिए 18 से 20 किलोग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है। एक एकड़ के लिए महज 2 किलो बीज पर्याप्त होता है।

2. खेत समतलीकरण-जहां पारंपरिक विधि में खेत को समतल बनाने के लिए हल एवं बैल की प्रयोग किया जाता है वहीं इसमें आधुनिक कृषि उपकरणों की मदद से खेत का समतल किया जाता है। इससे अत्यधिक श्रम तथा समय की बचत होती है। Mahindra 275 DI TU XP Plus धान की खेती के लिए बेहद उपयोगी ट्रैक्टर है। इसका जानदार और दमदार इंजन धान की खेती के लिए विभिन्न कार्यों को करने में मददगार है। रोटावेटर की मदद से ये खेत के समतलीकरण का कार्य आसानी करता है और मिट्टी को भुरभुरी बनाता है। यह कम समय में खेत की जुताई करने में सक्षम है, दूसरे ट्रैक्टर द्वारा किए गए एक घंटे के कार्यों को ये केवल 40 मिनट में कर देता है। दूसरे ट्रैक्टरों के मुकाबले इसमें ईंधन भी कम खर्च होता है। वहीं इसके रखरखाव में भी कम खर्च आता है जिससे खेती की लागत घटती है। इसके अलावा महिंद्रा XP Plus सीरीज के अन्य ट्रैक्टर भी धान की खेती करने वाले किसानों बीच काफी लोकप्रिय है।

3. पौधे लगाने के लिए मॉर्किंग-इस विधि में मॉर्किंग करके पौधों को लगाया जाता है। वहीं पारंपरिक विधि में मॉर्किंग की जरूरत नहीं पड़ती है। बांस या मेटल की मदद से मार्कर का निर्माण किया जाता है। मार्किंग के जरिए पौधे लगाने से पौधों के बीच पर्याप्त दूरी होती है जिससे हर पौधे को पर्याप्त पोषक तत्व मिलते हैं। वहीं पारंपरिक विधि से एक ही जगह पर दो से तीन पौधे लगाए जाते हैं जिससे सभी को पौधों को पर्याप्त पोषक तत्व नहीं मिल पाते हैं। यही वजह कि श्री विधि से अधिक उत्पादन मिलता है।

4.कोनो वीडर का उपयोग-पारंपरिक विधि में कोनो वीडर का उपयोग नहीं किया जा सकता। जबकि इसमें कोनो वीडर का उपयोग करके खेत के खरपतवारों को जैविक खाद में परिवर्तित किया जा सकता है। जो पौधों की बेहतर ग्रोथ के लिए मददगार है। वहीं पारंपरिक विधि में खरपतवार को निकालकर बाहर फेंकना पड़ता है. वहीं जरूरी पोषक तत्वों के लिए रासायनिक उर्वरक का प्रयोग करना पड़ता है।

(यह आर्टिकल ब्रांड डेस्‍क द्वारा लिखा गया है।)

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