धान की खेती में पोषक तत्वों और सिंचाई का प्रबंधन कैसे करें

जैविक खाद के लगातार प्रयोग से मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति की जा सकती है।
Publish Date:Mon, 16 Aug 2021 04:58 PM (IST)Author: Author: Ankit Kumar

नई दिल्ली, ब्रांड डेस्क। धान समेत विभिन्न फसलों में आवश्यक पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए रासायनिक उर्वरकों का उपयोग तेजी से बढ़़ा है। इस वजह से खेती की लागत काफी बढ़ गई है। ऐसे में मिट्टी में पोषक तत्वों के स्थायी प्रबंधन की बेहद आवश्यकता है। जैसा कि आप जानते हैं कि धान की खेती में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, जिंक समेत अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की जरूरत पड़ती है। मिट्टी में स्थायी रूप से पोषक तत्वों की पूर्ती के लिए समन्वित खाद प्रबंधन (Integrated Nutrient Management) प्रणाली बेहद कारगर साबित हो सकती है। इसको संक्षिप्त में आईएनएम अवधारणा कहा जाता है। इस प्रणाली में जैविक खाद, खेती के अवशेषों, हरी खाद, वर्मी कम्पोस्ट, जैव उर्वरक और फसल चक्र को अपनाकर धान की फसल के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ती की जा सकती है।

आर्गेनिक खाद का उपयोग

जैविक खाद के लगातार प्रयोग से मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति की जा सकती है। वहीं इसके इस्तेमाल से मिट्टी की जल ग्रहण करने की क्षमता भी बढ़ती है। इसके लिए धान की रोपाई के 25 से 30 दिनों पहले प्रति हेक्टेयर 10 से 15 टन गोबर की सड़ी खाद डालना चाहिए। गोबर खाद को पूरे खेत में अच्छी तरह से मिलाने के लिए एक जुताई कर दें। इससे खेत के हर हिस्से में पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होने में मदद मिलेगी।

हरी खाद का उपयोग

भूमि की उपजाऊ क्षमता बढ़ाने के लिए हरी खाद का प्रयोग बेहद कारगर माना जाता है। इसके लिए हरी खाद की फसल को खेत में उगा सकते हैं। जिसके बाद इसे हरी खाद के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा बंजर भूमि में मौजूद हरी खाद के स्त्रोतों से हरी पत्तियां निकालकर इस्तेमाल करें। हरी खाद के लिए ढैंचा, सनई, लोबिया, पिलीपेसर, ग्वार, सेसबानियां रोस्ट्रेटा समेत कई फसलें है जो मिट्टी में पोषक तत्वों की पूर्ति के लिए उपयोगी है। यह सभी फसलें 50 से 60 दिनों बाद हरी खाद के तौर पर इस्तेमाल की जा सकती है।

जैव उर्वरक का प्रयोग

इसके अलावा अजोला समेत कुछ जैविक उर्वरक तौर पर इस्तेमाल किए जा सकते हैं। जो बैक्ट्रीरिया की मदद से मिट्टी में जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण में मदद करते हैं। बता दें कि अजोला, एजोस्पाइरिलम जैसे कई जैव उर्वरक है जो कि वायुमंडलीय नाइट्रोजन के सेवन में मददगार है। धान की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए अजोला, एजोस्पाइरिलम के अलावा नीली हरी शैवाल, फाॅस्फोबैक्ट्रीया तथा माइकोराइजा जैसे जैव उर्वरक का उपयोग करें।

अकार्बनिक उर्वरक प्रबंधन कैसे करें?

धान की विभिन्न किस्मों के मुताबिक ही खाद एवं उर्वरक प्रबंधन किया जाता है। धान की कम अवधि किस्मों के लिए प्रति हेक्टेयर 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 ग्राम फास्फोरस तथा 40 किलोग्राम पोटाश डालना चाहिए। वहीं धान की मध्यम अवधि की किस्मों के लिए प्रति हेक्टेयर 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस तथा 50 किलोग्राम पोटाश पर्याप्त होता है। वहीं लंबी अवधि की किस्मों के लिए प्रति हेक्टेयर 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस तथा 80 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता पड़ती है। बता दें कि धान की रोपाई के समय फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा डाल देना चाहिए। वहीं नाइट्रोजन को चार बराबर भागों में बांटकर अलग अलग समय पर डालना चाहिए। नाइट्रोजन की पहली खुराक रोपाई के समय, दूसरी खुराक रोपाई के 40-60 दिनों बाद, तीसरी खुराक फ्लावरिंग ( 45-90 दिनों बाद) तथा चौथी व अंतिम खुराक फसल की हेडिंग स्टेज (75-120 दिनों बाद) में देना चाहिए।

धान की खेती में जल प्रबंधन

धान की खेती के लिए सही जल प्रबंधन की सबसे ज्यादा जरुरत होती है। दरअसल, आजकल देश के हिस्सों में जल की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। इससे धान का उत्पादन प्रभावित होता है। वहीं अनियमित वर्षा के कारण भी धान की फसल को पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हो पाता है। ऐसे में संग्रहीत जल के जरिये फसल में सही जल प्रबंधन करना चाहिए।

धान की फसल के लिए जल का महत्व

गौरतलब है कि मीठे जल का 70 फीसदी हिस्सा कृषि क्षेत्र में उपयोग किया जाता है। धान या अन्य फसलों के उत्पादन में जल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। धान के पौधों के समूचे विकास के लिए जल की उपलब्धता बेहद जरूरी है। यदि खेत में पर्याप्त नमी नहीं हो तो बीजों का अंकुरण नहीं हो पाता है।

बाढ़ का प्रभाव

धन के पौधों की वृद्धि के लिए खेतों में पानी भरकर रखा जाता है। देश के कई क्षेत्रों में धान की कटाई के 7 से 10 दिनों पहले बाढ़ आने की संभावनाएं बढ़ जाती है। ऐसे में बाढ़ से फसल को बचाने के लिए सही प्रबंधन करना जरूरी है। हालांकि कई अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि खरीफ सीजन में धान की फसल की जलमग्न होने की स्थिति में कोई खास नुकसान नहीं होता है। वहीं रबी सीजन में धान की अच्छी पैदावार के लिए खेत में 5 सेंटीमीटर जल भराव करना चाहिए।

जल की बचत कैसे करें

बता दें धान अर्द्धजलीय पौधा है जिसकी खेती के लिए अन्य फसलों की तुलना में अधिक पानी की जरूरत पड़ती है। विभिन्न अध्ययन में यह बात सामने आई हैं कि धान की फसल में सिंचित जल का 50 से 60 फीसदी पानी भूमि में गहराई तक रिसने से नष्ट हो जाता है। ऐसे में जल रिसाव से बचने के लिए उचित प्रबंधन किया जाना चाहिए।

  • जल रिसाव रोकने के लिए चिकनी मिट्टी में चावल की खेती करना चाहिए।
  • खेत की लैवलिंग के लिए रोटावेटर की मदद लेना चाहिए। इसके लिए महिंद्रा का Tez-E ZLX Plus का प्रयोग करना चाहिए। या इलेक्ट्रिक रोटावेटर है जो खेत को बेहतर तरीके से लेवलिंग करने में मददगार है।
  • साथ ही पडलिंग करके खेत को अच्छी तरह से करना चाहिए।

धान के लिए उचित जल प्रबंधन कैसे करेंः

धान की फसल में विभिन्न चरणों में खेत में पर्याप्त नमी होना चाहिए। तो आइए जानते हैं धान में कब कितने जल की जरूरत पड़ती हैः

1. पौधों के ट्रांसप्लाटिंग (रोपाई) के समय खेत में 2 सेंटीमीटर तक जल भराव रहना चाहिए।

2. ट्रांसप्लांटिंग के 3 दिनों बाद खेत में लगभग 5 सेंटीमीटर तक जल स्तर पर्याप्त होता है।

3. रोपाई के 15 दिनों बाद खेत से 3 दिनों के लिए पानी को निकाल देना चाहिए।

4. रोपाई के 40 से 60 दिनों बाद खेत में 2 सेंटीमीटर जल भराव होना चाहिए।

5. टिलरिंग स्टेज से फ्लॉवरिंग के बीच खेत में 5 सेंटीमीटर तक जलभराव होना चाहिए।

5. फ्लॉवरिंग के 21 दिनों बाद खेत से धीरे-धीरे पानी निकाल देना चाहिए।

(लेखकः शक्ति सिंह)

नोटः यह आर्टिकल ब्रांड डेस्क द्वारा लिखा गया है। 

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