धान की खेती के लिए पडलिंग या गीली जुताई कैसे करें? आइए जानते हैं इसका महत्व

धान की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु
Publish Date:Thu, 05 Aug 2021 02:29 PM (IST)Author: Author: Nitesh

ब्रांड डेस्क। खरीफ सीजन के लिए धान की खेती (Paddy Farming) जून-जुलाई महीने में की जाती है। इसके चलते खेत की तैयारी मानसून आने से पहले ही पूरी कर लेनी चाहिए। सबसे पहले मई महीने में खेत की गहरी जुताई की जाती है। इसके बाद 2-3 जुताई कल्टीवेटर तथा रोटावेटर से करते हैं। वहीं अंतिम जुताई के समय खेत में गोबर की सड़ी खाद या वर्मीकम्पोस्ट डालना चाहिए।

गौरतलब है कि आज धान के किसानों को खेती की आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करना चाहिए। जो कि धान के अधिक तथा गुणवत्तापूर्ण उत्पादन मददगार है। वहीं वैज्ञानिक पद्धति को अपनाने से समय और श्रम की बचत होती है। इससे खेती लागत कम हो जाती है एवं किसानों को धान की खेती से अधिक मुनाफा मिलता है। बता दें कि किसानों को खेत की तैयारी से लेकर धान की कटाई तक कई बातों का ध्यान रखना चाहिए।

धान की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु

भारत में धान की खेती 20 से अधिक राज्यों में की जाती है। इसकी खेती के लिए उष्ण और उपोष्ण जलवायु उपयुक्त मानी जाती है। इसके पौधे की अच्छी बढ़वार के लिए 25-30 डिग्री सेल्सियस तापमान बेहतर होता है। वहीं फसल पकने के लिए 20-25 डिग्री सेल्सियस तापमान उत्तम माना जाता है। वहीं अच्छे फसल के लिए रात का तापमान 15 डिग्री सेल्सियस तक होना चाहिए। धान की खेती 21 डिग्री सेल्सियस के न्यूनतम तापमान तथा 36 डिग्री सेल्सियस के अधिकतम तापमान पर की जा सकती है।

धान की खेती के लिए भूमि का चुनाव

उच्च जलधारण क्षमता वाली मिट्टी धान की खेती के लिए बेहतर मानी जाती है। वैसे तो धान की खेती विभिन्न प्रकार मिट्टी में की जा सकती है लेकिन बेहतर उत्पादन के लिए दोमट व मध्यम काली मिट्टी उत्तम होती है। वहीं मिट्टी का पी.एच. मान 5.5 से 6.5 के मध्य होना चाहिए। मिट्टी के समुचित सुधार के बाद धान की खेती क्षारीय तथा लवणीय मिट्टी में भी संभव है। धान की वैज्ञानिक खेती के लिए मिट्टी परीक्षण करवाना चाहिए।

अच्छे उत्पादन के लिए फसल चक्र अपनाएं

आज भारत में धान का औसत उत्पादन प्रति हेक्टेयर 3 टन है। जबकि दुनिया के कई देशों में धान का प्रति हेक्टेयर से औसत उत्पादन 9 से 6 टन तक हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह हैं आज भी हमारे देश में धान की पारंपरिक खेती की जाती है। वहीं किसान धान की वैज्ञानिक पद्धतियों से अनजान है। इसके लिए किसानों को कृषि की आधुनिक मशीनरी के साथ-साथ वैज्ञानिक तकनीकों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना होगा। वहीं किसानों को धान की खेती के लिए सही फसल चक्र अपनाना चाहिए। धान की खेती करने वालों को किसानों को उक्त एक वर्षीय फसल चक्र अपनाना चाहिए -

1. धान की खेती अगले वर्ष गेहूं, लोबिया, उड़द या मूंग की खेती करें।

2. सब्जियों में मटर, आलू आदि की खेती की जा सकती है।

3. इसके अलावा चना, मक्का, लाही, बरसीम आदि की खेती की जा सकती है।

4. तीन वर्ष में एक बार धान की खेती के बाद गन्ने की खेती एक आदर्श फसल चक्र है।

धान की खेती के लिए पडलिंग (Puddling) कैसे करें?

दरअसल, धान की खेती सामान्यत: गहरे पानी में की जाती है। धान के पौधों की रोपाई से पहले पडलिंग (Puddling) की प्रक्रिया बेहद जरुरी होती है। यह एक तरह से खेत की गीली जुताई होती है। इसके लिए खेत की अंतिम जुताई के बाद खेत में पानी भरकर देशी हल, प्लाऊ या कल्टीवेटर की मदद से मिट्टी को अच्छी तरह मथा जाता है। इससे मिट्टी नरम हो जाती है तथा रोपाई में आसानी होती है। पडलिंग की प्रक्रिया से पौधों को आवश्यक पोषक तत्वों की उपलब्धता आसानी से हो जाती है। वहीं मिट्टी की उर्वरक क्षमता में इजाफा होता है। पडलिंग के लिए Mahindra के XP Plus सीरीज के ट्रैक्टर बेहद उपयोगी है, जो मजबूत और शक्तिशाली । इसमें Mahindra 575 DI XP Plus पडलिंग के कामों के लिए एक दमदार ट्रैक्टर है।

दरअसल, पडलिंग के काम करने के लिए क्लच असेम्बली में ब्रेक हाउसिंग, फ्रंट एक्सल जैसी चीजें उम्दा होनी चाहिए। इस ट्रैक्टर को पडलिंग के दौरान खेत में आसानी और बेहतर संतुलन के साथ मोड़ा जा सकता है। यह ट्रैक्टर 46.9 HP इंजन क्षमता तथा 42 HP के पीटीओ पॉवर के साथ आता है। इसमें 8 फारवर्ड तथा 2 रिवर्स गियर्स होते हैं, जो पडलिंग के कामों को आसान बनाते हैं।

धान की खेती के लिए पडलिंग का महत्त्व

यह खेत की तैयारी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भूमि में पडलिंग की प्रक्रिया से मिट्टी की गुणवत्ता में स्थायी सुधार होता है। इससे वर्षा के जल के संरक्षण में मदद मिलती है एवं सिंचाई के जल का कुशलता पूर्वक उपयोग किया जा सकता है। वहीं पडलिंग से मिट्टी के कटाव में कमी आती है। इससे पौधों के स्थापित होने में मदद मिलती है। मिट्टी के पडलिंग से धान की रोपाई में सटीकता आती है। इस प्रक्रिया से मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ती है तथा पौधों को समान मात्रा में सिंचाई का जल मिलता है।

यह आर्टिकल ब्रांड डेस्‍क द्वारा लिखा गया है।

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