पिछले कुछ समय में इंदौर मध्य भारत का एजुकेशन हब बनकर उभरा है, लेकिन यदि इतिहास के पन्नों को पलटा जाए तो पहले भी शिक्षा के क्षेत्र में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता था। जीएसआईटीएस, किंग एडवर्ड मेडिकल कॉलेज (वर्तमान में एमजीएम मेडिकल कॉलेज), होल्कर साइंस कॉलेज की अपनी एक विशिष्ट पहचान है, जो लंबा सफर तय करते हुए आज पूरे मध्य भारत की पहचान बन गई है।

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इंदौर देश का एकमात्र ऐसा शहर है, जहां पर आईआईटी और आईआईएम जैसे देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान हैं। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय से जुड़े कॉलेजों में 2 लाख से भी अधिक स्टूडेंट्स अपना भविष्य संवार रहे हैं। यहां सात प्राइवेट यूनिवर्सिटी भी हैं। इंदौर में बनते नए एजुकेशन हब में सिंबॉयसिस और नरसीमुंजी ने भी अपनी दस्तक दे दी है।

 

कभी इंदौर के विद्यार्थियों को भी मेडिकल और इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षाओं के लिए कोटा या दूसरे शहरों में जाना होता था, लेकिन अब हर साल लाखों बच्चे आंखों में सफलता का सपना लिए यहां पर आते हैं। हर साल इंदौर का नाम ऑल इंडिया रैंकिंग में दिखाई देता है। गत वर्ष की ही बात करें तो नीट और एम्स के टॉप-10 में इंदौर के छात्रों के नाम थे। आईआईटी में भी टॉप-10 में इंदौर अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुका है।

हालांकि यहां पर एक कमी नजर आती है और वह है निरंतरता। सफलता को दीर्घकालिक तब ही माना जाता है जब वह निरंतर हो। किसी एक साल बहुत अच्छे परिणाम और फिर दो साल पर्दे से गायब रहने को हम स्थापित सफलता नहीं कह सकते हैं। यहां पर ऐसी हर सुविधा मौजूद है कि हम निरंतर सफल हो सकें। पिछले कुछ समय में निरंतरता आई है, लेकिन अभी थोड़ी गुंजाइश बाकी है।

स्कूली शिक्षा की बात करें तो यहां करीब 170 स्कूल हैं। इसमें करीब पौने दो लाख बच्चे पढ़ते हैं। उम्दा इंफ्रास्ट्रक्चर, तकनीकी रूप से बेहतर क्लासरूम, प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता से यहां स्कूली शिक्षा के बहुत बेहतर विकल्प मौजूद हैं। यहां पर कमी खलती है तो आसमान को छूती महंगी फीस। प्रदेश में अभी तक कोई भी स्कूल फीस को नियंत्रित करने संबंधी कानून नहीं बना है। इसके कारण हर साल मनमानी फीस वृद्धि के कारण पालकों के मन में एक असंतोष का भाव रहता है।

वहीं मैनेजमेंट बोर्ड की एजुकेशनल बोर्ड में दखल भी एक कमी है। किसी भी शहर के शैक्षणिक ढांचे में स्कूली शिक्षा सबसे अहम हैं, क्योंकि यहां से बच्चे के विकास की नींव तैयार होती है। जब स्कूली शिक्षा मजबूत हो तो बच्चे किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में दूसरों के मुकाबले खुद को आगे खड़ा पाते हैं।

हालांकि कुछ स्कूल ऐसे भी हैं, जिनका नाम प्रदेश के बाहर भी सम्मान के साथ लिया जाता है। फिर भी बेहतर स्कूली शिक्षा को समाज के हर तबके तक पहुंचाने की जरूरत है। मध्यम वर्गीय और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों की पहुंच भी बड़े प्राइवेट स्कूलों तक नहीं है। वहीं आरटीई के तहत एडमिशन लेने वाले गरीब तबके के छात्र भी बड़े स्कूलों के माहौल में खुद को सहज नहीं पाते हैं।

उच्च शिक्षा के मामले में इंदौर देश के अन्य शहरों पर भारी पड़ता है क्योंकि यहां पर आईआईटी और आईआईएम हैं, जिनकी देश में रैंकिंग क्रमश: 24 और 10 है। दोनों संस्थान अपने क्षेत्र में देश के टॉप 25 इंस्टीट्यूट्स में शामिल हैं। वहीं मेडिकल क्षेत्र में 140 साल पहले स्थापित एमजीएम मेडिकल कॉलेज भी देशभर में पहचाना जाता है।

उच्च शिक्षा में कहीं कमी नजर आती है तो वह है व्यवहारिक ज्ञान और रिसर्च की। इंदौर के आसपास बड़े पैमाने में इंडस्ट्री हैं, लेकिन कॉलेजों मे होने वाले रिसर्च का लाभ इंडस्ट्री को नहीं मिलता है। दरअसल, कॉलेजों में शोध को प्राथमिकता नहीं दी जा रही है। पिछले कुछ समय में आईटी के क्षेत्र में जरूर इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स ने एप्लीकेशन बेस्ड काम किया है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है।

यदि परीक्षा परिणामों में निरंतरता, मनमानी फीस पर लगाम, उच्च शिक्षा में शोध को महत्ता, आईआईटी और आईआईएम का शहरी विकास में योगदान बढ़े तो मध्यभारत से निकल कर इंदौर देश के एजुकेशन हब के रूप में विकसित हो सकता है।

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By Krishan Kumar