उज्‍जैन, योगेंद्र शर्मा। शिवप्रिया अनादि काल से इस मोक्षपुरी में समय-समय पर देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों के दर्शन करते रहे हैं। अवंतिकीपुरी को देवादिदेव महाकाल की नगरी के नाम से भी पुकारा जाता है। कभी राज्य की अभिलाषा तो कभी शत्रुओं को परास्त करने का प्रयोजन। कभी देवताओं की पूजा तो कभी महाकाल के संग में कुछ पल बिताने की चाहत, लेकिन मोक्षपुरी उज्जैन को दुर्लभतम क्षण तब मिला जब भूतभवन महाकाल की नगरी में स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण अध्ययन करने आए। यदुकुलश्रेष्ठ ने शिप्रा के तट पर शिक्षा प्राप्त की और कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान से दुनिया को गीता का ज्ञान दिया।

5500 साल पहले अवंतिकापुरी आए थे श्रीकृष्ण

जब मथुरा में उनकी शिक्षा की चर्चा हुई तो कुलगुरु गर्गमुनि से परामर्श कर श्रीकृष्ण को अवंतिकापुरी महर्षि सांदीपनि के आश्रम में अध्ययन के लिए भेजने का निर्णय लिया गया। पांच हजार पांच सौ वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण अवंतिकापुरी आए और कुछ ही दिनों में उन्होंने वेदों और पुराणों से सभी प्रकार का ज्ञान प्राप्त कर लिया। ऐसा माना जाता है कि श्री कृष्ण ने 18 पुराणों का ज्ञान 18 दिनों में, 4 वेदों को 4 दिनों में, 6 शास्त्रों को 6 दिनों में, 16 कलाओं को 16 दिनों में और गीता का ज्ञान 20 दिनों में प्राप्त किया था।

64 दिनों में पाया 64 कलाओं का ज्ञान

श्री कृष्ण ने गुरु सांदीपनि से छह अंगों, उपनिषद, संपूर्ण वेद, मंत्र, धनुर्वेद, मनुस्मृति, धर्मशास्त्र, मीमांसा, तर्क, यान, आसन, वैद्य, संधि विग्रह, छह भेदों के साथ राजनीति का अध्ययन से किया।

भगवान श्री कृष्ण ने इसके साथ ही 64 कलाओं का अध्ययन किया, जिसके तहत नृत्य, नाट्य कला, गायन, वाद्य यंत्र बजाना, पेंटिंग, बेल-बूटे, चावल और फूलों से पूजा का उपहार बनाना, फूलों की क्यारियां बनाना, कपड़े और आंगनों को रंगना, रत्नों का फर्श, शय्या बनाना, जल बांधना, वस्त्र और आभूषण बनाना, फूलों के आभूषणों से सजाना, सुगंध, इत्र, तेल बनाना, जादूगरी, मनचाहा भेष बनाना।

इसके अलावा विचित्र सिद्धियां दिखाना, हार बनाना, कान और नुकीले फूलों के आभूषण बनाना, विभिन्न व्यंजन बनाना, पेय पदार्थ बनाना, कठपुतली बनाना, पहेलियां बनाना, मूर्तियां बनाना, कूटनीति, पाठ पढ़ाने की युक्ति, नाट्य रचना, समस्या समाधान, पट्टी, घंटी, तीर बनाना, कालीन बनाना, बढ़ईगीरी की कारीगरी, सोने जैसी धातुओं की जांच करना और चांदी और रत्न जैसे हीरे और पन्ना, सोना और चांदी बनाना, रत्नों के रंगों को पहचानना शामिल है।

साथ ही भेड़, मुर्गा, बटेर आदि से लड़ने की विधि, खानों की पहचान, पेड़ों की चिकित्सा, बोलना तोता-मैना की बोलियां आदि, उच्चाटन की विधि, बालों को साफ करने का कौशल, मन को जानना, अपशकुन को पहचानना, प्रश्नों के उत्तर देकर सौभाग्य बताना, विभिन्न प्रकार के मातृकायंत्र बनाना, रत्नों को तराशना, सांकेतिक भाषा बनाना, ज्ञान सभी खजानों में, छल-कपट का काम, जुआ खेलना, दूर के मनुष्य या वस्तुओं को आकर्षित करना, बेताल को वश में करने की विधि सम्मिलित है।

अवंतिकापुरी में महर्षि सांदीपनि के आश्रम में जहां श्री कृष्ण जीवन के गूढ़ रहस्यों से परिचित हुए, तो राजनीति और राजशाही के राज्य धर्म की भी शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने महाकालेश्वर नगरी से प्राप्त ज्ञान का प्रयोग कर विश्व कल्याण किया। पुण्यसालिला शिप्रा के तट पर बसे उज्जैन शहर के कण-कण में योगेश्वर श्रीकृष्ण की दुर्लभ स्मृतियों की सुगंध विद्यमान है।

Edited By: Babita Kashyap