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    Community Radio: मध्य प्रदेश की धरती पर हो रही सामुदायिक रेडियो की क्रांति, बदल रही गांवों की तस्वीर

    By Jagran NewsEdited By: Yogesh Sahu
    Updated: Sun, 12 Feb 2023 06:59 PM (IST)

    बीते एक दशक में हर क्षेत्र हर बोली के लिए अपना अलग रेडियो केंद्र शुरू हुआ है। आदिवासी रेडियो जॉकी बने स्कूल का निजी रेडियो केंद्र छात्राएं चला रही हैं। सामुदायिक रेडियो पर क्रांतिकारियों की गौरव गाथा सुनाई जा रही है।

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    Community Radio: मध्य प्रदेश की धरती पर हो रही सामुदायिक रेडियो की क्रांति, बदल रही गांवों की तस्वीर

    ईश्वर शर्मा, इंदौर। मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल जिले झाबुआ का छोटा-सा गांव गडवाड़ा चार महीने पहले तक भले ही मुर्गे की बांग से जागता था, लेकिन अब यहां के लोग अपने ही गांव में बने कम्युनिटी (सामुदायिक) रेडियो की आवाज से जागते हैं। दरअसल, यहां महान क्रांतिकारी टंट्या मामा के नाम पर सामुदायिक रेडियो शुरू हुआ है, जिस पर यहां की स्थानीय भीली बोली में कार्यक्रम प्रसारित होते हैं, जिन्हें आदिवासी बड़े चाव से सुनते हैं।

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    ठीक इसी तरह बैतूल जिले के चिचोली में गुनेश मरकाम और साथी मिलकर गोंड भाषा में कार्यक्रम बनाते और प्रसारित करते हैं। इस रेडियो केंद्र के कारण गुनेश आसपास के 20 से अधिक गांवों के लिए किसी सुपरस्टार से कम नहीं हैं। यह सब संभव हुआ है, मध्य प्रदेश में घटित हो रही कम्युनिटी रेडियो की स्थानीय क्रांति से। यह क्रांति इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इससे उन लाखों ग्रामीणों, आदिवासियों और वंचित लोगों को आवाज मिल रही है, जिन्हें अब तक अनसुना कर दिया गया था।

    गांवों की तस्वीर पलट रहा रेडियो

    सामुदायिक रेडियो अर्थात अपने समुदाय की बात को, अपने लोगों के बीच में, अपने ही लोगों द्वारा, अपनी भाषा-बोली में बोल सकने का माध्यम। जैसे मप्र का कोई भील आदिवासी व्यक्ति अपनी भीली बोली में अपने गांव का कोई लोकगीत गाना चाहे, तो वह अपने क्षेत्र के कम्युनिटी रेडियो में गा सकता है। कम दूरी और कम लागत के इन रेडियो केंद्रों ने मध्य प्रदेश के दूरदराज के जंगल में बसे गांवों की मानो तस्वीर ही पलट दी है।

    पहले जहां ग्रामीण अपने में सिमटे-सिमटे रहते थे, अब वहीं अपने क्षेत्रों में कम्युनिटी रेडियो केंद्र खुलने से अपनी बोली, अपनी भाषा में दुनिया-जहान के समाचार सुनते हैं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मन की बात सुनते हैं, सरकारी योजनाओं की जानकारी पाते हैं, योजनाओं को समझकर उनके लिए आवेदन करते हैं और लाभ ले पाते हैं।

    मनरेगा, पेंशन योजना की जानकारी से लेकर अपने क्षेत्र की बोली बोलने वाले एनाउंसर की कमेंट्री के साथ लता मंगेशकर व किशोर कुमार के गाने सुनने के लिए गांव वालों के पास अब अपना सामुदायिक रेडियो स्टेशन है। इस तरह सामुदायिक रेडियो ने मप्र के गांवों में जीवन को पहले से बेहतर बना दिया है।

    नौ रेडियो केंद्र तो केवल जनजातियों के

    यदि आप जनजातियों अर्थात आदिवासी बंधु-बांधवों को चुप रहने वाला, कम आत्मविश्वास वाला और आधुनिकता से दूर मानते हैं, तो जरा रुकिए और समय निकालकर मध्यप्रदेश आइए। यहां के आदिवासी अपने क्षेत्रों के कम्युनिटी रेडियो पर वैसी ही धूम मचा रहे हैं, जैसी दिल्ली-मुंबई के आरजे (रेडियो जाकी) मचाते हैं। मप्र में बैगा, भील, सहरिया, गोंड, भारिया और कोरकू जैसी जनजातियों के अपने सामुदायिक रेडियो हैं, जिन पर ये अपनी ही बोली-भाषा में कार्यक्रम बनाते और प्रसारित करते हैं।

    लोकगीत, लोक-कहानियां, भजन से लेकर कविताएं और राजनीतिक परिचर्चा तक इन बोलियों में होती है। दिलचस्प यह कि इनके कार्यक्रमों को सुना भी खूब जाता है। मप्र में केवल जनजातीय क्षेत्रों में ही नौ सामुदायिक रेडियो केंद्र हैं। इनमें आदिवासी बहुल जिला डिंडौरी के चाडा में बैगा रेडियो, धुर नक्सली जिला बालाघाट के बैहर में बैगा सामुदायिक रेडियो, धार के नालछा में भील रेडियो, झाबुआ के मेघनगर में भील सामुदायिक रेडियो व गडवाड़ा गांव में टंट्या मामा रेडियो, आलीराजपुर के भाभरा में भीली रेडियो, श्योपुर के सेसईपुरा में सहरिया रेडियो, बैतूल के चिचोली में गोंड रेडियो, गुना के उमरी में भील रेडियो, छिंदवाड़ा के बिजौरी में भारिया रेडियो और खंडवा के खालवा में कोरकू सामुदायिक रेडियो धूम मचा रहे हैं।

    आखिर होता क्या है सामुदायिक रेडियो

    रेडियो प्रसारण सेवा तीन तरह की होती है- पहली सरकारी, जिसे हम आकाशवाणी के नाम से जानते हैं। दूसरी निजी, जिसके तहत हम शहरों में निजी एफएम चैनल सुनते हैं और तीसरी सामुदायिक रेडियो, जिसके तहत कम दायरे अर्थात केवल पांच से 10 किलोमीटर के दायरे में कार्यक्रमों का प्रसार होता है। सामुदायिक रेडियो स्थानीय लोगों द्वारा अपने ही क्षेत्र के लोगों के लिए चलाए जाते हैं, जिनमें स्थानीय बोली-भाषा में कार्यक्रम, समाचार, लोकगीत, खेती-किसानी की बात, शिक्षा की चर्चा, सरकारी योजना की जानकारी आदि रिकॉर्ड और प्रसारित होते हैं।

    स्कूली छात्राओं का अपना स्टेशन, वे ही आरजे, वे ही प्रोग्रामर

    प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित शासकीय सरोजिनी नायडू कन्या स्कूल में तो कम्युनिटी रेडियो के कारण कमाल ही हो गया है। यहां छात्राएं पढ़ाई के साथ-साथ रेडियो के लिए कार्यक्रम भी बनाती हैं। वे ही समाचार वाचक हैं, वे ही एनाउंसर तथा वे ही प्रोग्राम डिजाइनर हैं। यह मध्यप्रदेश का पहला स्कूल है, जिसके पास अपना स्वयं का कम्युनिटी रेडियो केंद्र है। आरजे अदिति व आरजे तान्या बताती हैं, हमारे केंद्र से स्कूली छात्र-छात्राओं शिक्षा संबंधी कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। छात्राएं समाचार पढ़ती हैं और अन्य विद्यार्थी व आम नागरिक सुनते हैं। फिर कार्यक्रम की रिकार्डिंग को यूट्यूब पर अपलोड कर दिया जाता है, ताकि अन्य विद्यार्थी भी लाभांवित हो सकें।

    क्रांतिकारियों की गौरव गाथा गाता है रेडियो आजाद हिंद 90.8

    मप्र सरकार का स्वराज संस्थान संचालनालय भोपाल से रेडियो आजाद हिंद का संचालन करता है। इस सामुदायिक रेडियो पर देश-प्रदेश के क्रांतिकारियों की गौरव गाथा सुनाई जाती है। लोग जैसे ही 90.8 पर ट्यून-इन करते हैं, उन्हें 1857 की क्रांति से लेकर भारत को स्वतंत्र करवाने में प्राण न्यौछावर कर देने वाले वीरों तक की गर्व से भरी कहानियां सुनने को मिलती हैं। इस रेडियो के कारण प्रदेश के स्कूली बच्चे भारत के स्वतंत्रता संग्राम को सही अर्थों में जानने-समझने लगे हैं।