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    MP Crime: चर्च में आगजनी करने वालों को पांच साल की जेल, यूपी के लड़कों ने दिया था वारदात को अंजाम

    Updated: Wed, 13 Aug 2025 07:56 AM (IST)

    मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले के आदिवासी बहुल क्षेत्र केसला के चौकीपुरा गांव स्थित चर्च में आगजनी के दो साल पुराने मामले में सत्र न्यायालय ने दो आरोपितों को दोषी करार देकर पांच वर्ष सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। दोनों दोषी उत्तर प्रदेश के निवासी हैं। इस मामले में तीसरे आरोपित को ठोस साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया।

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    चर्च में आगजनी करने वालों को पांच साल की जेल (सांकेतिक तस्वीर)

     डिजिटल डेस्क, इटारसी। आदिवासी विकासखंड केसला के ग्राम चौकीपुरा स्थित एक चर्च को जलाने के बहुचर्चित मामले में न्यायालय ने उत्तर प्रदेश निवासी दो युवकों को दोषी पाते हुए पांच साल के कारावास की सजा से दंडित किया है। एक युवक को बरी किया गया है।

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    कोर्ट ने सुनाया फैसला

    न्यायालय तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश आदित्य रावत की अदालत ने दो वर्ष पुराने मामले में फैसला दिया है। यह घटना साल 2023 की है। न्यायालय ने अवनीश पांडेय और आकाश तिवारी को दोषी पाकर धारा 436 में पांच वर्ष और 295 में दो वर्ष की सजा सुनाई है। तीसरे आरोपित शिवा राय को दोषमुक्त किया गया। अभियोजन की ओर से 22 गवाह पेश किए गए।

    अपर लोक अभियोजक राजीव शुक्ला एवं भूरे सिंह भदौरिया ने मामले में कहा कि ग्राम चौकीपुरा स्थित ईशु प्रार्थना मंदिर में रखे हुए बाइबिल पढऩे के स्टैंड, क्रास, बाइबिल एवं धार्मिक सामग्री को ईसाई धर्म का अपमान करने के उद्देश्य से नष्ट कर उपासना स्थल में आगजनी को अंजाम दिया गया था। महेश कुमार कुमरे की शिकायत पर थाना केसला में प्रकरण पंजीबद्ध किया गया था।

    महेश ने पुलिस को बताया था कि

    सुबह 11 बजे चर्च में आकर देखा तो खिड़की दरवाजे खुले थे, लोहे की जाली टूटी और स्प्रे पेंट से दीवार पर जय मसीह की एवं आगे राम लिखा हुआ मिला था। तीन कुर्सी, बाइबिल पढऩे का स्टैंड, क्रास और अन्य सामग्री जलाई गई थी।

    जांच के दौरान अभियुक्त आकाश पिता राधेश्याम तिवारी निवासी झांसी एवं अवनीश पिता शोभाराम पांडेय। निवासी बीकापुर जिला फैजाबाद उप्र और शिवा पिता राजेन्द्र कुमार राय निवासी 12 बंगला को गिरफ्तार किया गया। अदालत में सुनवाई पूरी होने के बाद अवनीश और आकाश को अलग-अलग धारा में दो साल के सश्रम कारावास, 1000 रुपये अर्थदंड, धारा 436/120 में पांच साल के सश्रम कारावास और अर्थदंड से दंडित किया गया।

    फैसले में यह लिखा न्यायाधीश ने

    रावत ने अपने फैसले में इस बात का उल्लेख किया है कि देश की सर्वोच्च विधि अर्थात संविधान में नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार मूल अधिकार के रूप में प्रदाय किया गया है जो कि संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 में वर्णित है।

    इस संबंध में भारत की स्थिति को और अधिक स्पष्ट करने के आशय से संविधान की प्रस्तावना में धर्म निरपेक्ष शब्द 42 वे संविधान संशोधन वर्ष 1976 में समाहित किया गया है। इस प्रकार भारत प्रारंभ से ही धर्म निरपेक्ष राज्य है, जहां उसके नागरिकों को अपने धर्म की उपासना, अपने-अपने धार्मिक विश्वास के अनुसार पूजा, विश्वास, अभिव्यक्ति एवं उनके प्रबंधन का अधिकार दिया गया है।

    बहुसंख्यक होने का तात्पर्य अल्पसंख्यक की आवाज को दबाना नहीं

    उल्लेखनीय है कि यह धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार भी अन्य मूल अधिकारों के समान आत्यान्तिक नहीं है, अर्थात इस धार्मिक स्वतंत्रता के तहत दूसरे धर्म को दबाने, उनके प्रार्थना स्थलों को नुकसान पहुंचाने बलात धर्मांतरण शामिल नहीं है। बहुमत या बहुसंख्यक होने का तात्पर्य अल्पमत या अल्पसंख्यक की आवाज को दबाना नहीं है।

    उल्लेखनीय है कि न्यायालय को अधिकांश मामलों में बहुमत की अवैधानिकताओं को रोकने की दिशा में कदम उठाने पड़ते हैं, ऐसा करते हुए न्यायालय संवैधानिक मान्यताओं को सुरक्षित करते हैं।

    वर्तमान मामले में अभियुक्तगण ने अवांछित मानसिकता के तहत एक धर्म विशेष के प्रार्थना स्थल को नष्ट, नुकसानग्रस्त एवं अपमानित करने का आपराधिक कृत्य किया है। इस तुच्छ या ओछी मानसिकता के तहत धर्म विशेष के प्रार्थना स्थलों को क्षतिग्रस्त करने के फलस्वरूप अवार्ड के रूप में धनराशि भी दी गई है।

    दुस्साहस के प्रति नरम रुख नहीं अपनाया जाएगा

    ऐसी स्थिति में न्यायालय को कठोरता से पेश आना चाहिए ताकिसमाज के समक्ष यह संदेश जाए कि भारतीय संविधान द्वारा निर्धारित धर्म निरपेक्ष राज्य की अवधारणा को खतरे में डालने वाले किसी भी दुस्साहस के प्रति नरम रुख नहीं अपनाया जाएगा। चाहे उक्त कठोर कदम बहुसंख्यक को रास आए या न आए।