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    Football : न सुविधाएं, न साधन, फिर भी रचा इतिहास, बेटियों के फुटबाल कौशल की दुनिया में मची धूम

    By Jagran NewsEdited By: Yogesh Sahu
    Updated: Sat, 31 Dec 2022 05:07 PM (IST)

    बीते माह दुनिया फीफा विश्व कप के बहाने फुटबाल की खुमारी में थी। क्रिकेट के दीवाने देश में मध्य प्रदेश का एक आदिवासी बहुल इलाका ऐसा है जहां की बेटियों के फुटबाल कौशल की दुनिया में धूम है। धार की सरदारपुर तहसील की पहचान लड़कियों की फुटबाल टीम है।

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    न सुविधाएं, न साधन, फिर भी रचा इतिहास, बेटियों के फुटबाल कौशल की दुनिया में मची धूम

    इंदौर, कपीश दुबे। बीते एक माह तक दुनिया फीफा विश्व कप के बहाने फुटबाल की खुमारी में थी। क्रिकेट के दीवाने देश में मध्य प्रदेश का एक आदिवासी बहुल इलाका ऐसा है, जहां की बेटियों के फुटबाल कौशल की दुनिया में धूम है। करीब सात हजार की आबादी वाले धार जिले के सरदारपुर तहसील की पहचान यहां की लड़कियों की फुटबाल टीम है।

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    भारत ही नहीं विदेशी क्लब भी यहां की लड़कियों को अनुबंधित कर रहे हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक गांव की लड़कियों की टीम को सम्मानित कर चुके हैं। शहरों की तुलना में नाममात्र की सुविधाओं के बीच यहां की लड़कियां अपनी लगन और खेल कौशल से नारी सशक्तिकरण की नई इबारत लिख रही हैं।

    जहां पले-बढ़े, वहीं खेल को दिया बढ़ावा

    सरदारपुर में फुटबाल की टीम गढ़ने का काम यहीं पले-बढ़े कोच शैलेंद्र पाल ने किया। शैलेंद्र फुटबाल खेला करते थे। न सुविधाएं मिलीं, न किसी कोच का मार्गदर्शन तो खिलाड़ी के रूप में राज्य स्तर से आगे नहीं बढ़ सके। यह टीस हमेशा मन में रही। शैलेंद्र बताते हैं, 'मैंने तय किया कि मुझे भले ही सुविधाएं और मार्गदर्शन न मिला हो, लेकिन मैं कोच बनकर दूसरे खिलाड़ियों का भविष्य बनाऊंगा। मैं वर्ष 2006 में कोच बना और सरदारपुर से 25 किमी दूर लाबरियां गांव में पदस्थ हुआ और तीन वर्ष बाद सरदारपुर में कोचिंग शुरू की।"

    टीम तैयार करने की कहानी भी फिल्मी पटकथा की तरह है। आदिवासी इलाका होने से यहां लड़कों की तुलना में लड़कियों को बहुत ज्यादा स्वतंत्रता नहीं है। शैलेंद्र इस बारे में बताते हैं, 'मैं खुद आदिवासी समुदाय से हूं। यहीं का रहने वाला हूं, इसलिए सभी मुझे पहचानते हैं। इस भरोसे सभी ने अपने बच्चों को मैदान में खेलने भेजना शुरू किया। हमने उपलब्ध सुविधाओं के सहारे टीम को प्रशिक्षण दिया। खिलाड़ियों ने भी मेहनत की और धीरे-धीरे परिणाम सामने आने लगे।'

    यूं चला सफलता का सिलसिला

    शैलेंद्र बताते हैं, 'वर्ष 2013 में सुब्रतो कप की शुरुआत हुई। इस अंतरविद्यालयी टूर्नामेंट में शुरुआत के तीन वर्ष तक सरदारपुर की टीम मध्य प्रदेश की चैंपियन बनी और राष्ट्रीय स्पर्धा में खेली। इसके अलावा टीम दो बार मुख्यमंत्री कप, एक बार प्रधानमंत्री कप, 12 बार विभिन्न आयु वर्ग की राज्य स्तरीय स्पर्धाएं तथा पांच बार अखिल भारतीय फुटबाल स्पर्धा जीत चुकी है। वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री कप जीतने के बाद टीम की बालिकाएं दिल्ली गईं थीं, जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इन आदिवासी समाज की बच्चियों को सम्मानित किया था।

    क्रोएशिया के क्लब ने किया अनुबंध

    सरदारपुर की ज्योति चौहान क्रोएशिया में फुटबाल खेलने गई हैं, जहां स्थानीय क्लब ने अनुबंधित किया है। इससे पहले ज्योति ने इंडियन वुमंस लीग (आइडब्ल्यूएल) में अच्छा प्रदर्शन किया था। वे भारतीय टीम के शिविर में भी रह चुकी हैं। कई अन्य खिलाड़ी पुलिस और सेना सहित विभिन्न् शासकीय विभागों में चयनित हुई हैं।

    अब भी कम ही हैं सुविधाएं

    कोच शैलेंद्र बताते हैं, 'यहां की आदिवासी लड़कियों ने अपने प्रदर्शन से स्वयं को साबित किया है। इसके बावजूद अभी तक सुविधाओं का अभाव है। स्कूल स्तर पर खिलाड़ियों को जूते, फुटबाल और किट आदि मिल जाती है, लेकिन स्कूल से निकलने के बाद उन्हें कुछ नहीं मिलता। स्थानीय स्तर पर कुछ लोग मदद करते हैं, लेकिन शासकीय स्तर पर यहां के खिलाड़ियों के प्रति गंभीरता दिखाई जाए तो प्रदर्शन और बेहतर होगा।