लोकतंत्र का मूल आधार ही विचार-विमर्श
जागरण संवाददाता, जमशेदपुर : जैसी प्रजा होगी, राजा भी वैसा ही होगा। हालांकि लोकतंत्र में रा
जागरण संवाददाता, जमशेदपुर : जैसी प्रजा होगी, राजा भी वैसा ही होगा। हालांकि लोकतंत्र में राजा का स्थान नहीं है, लेकिन शासक या सरकार है जो विधान को नियंत्रित करता है। हमारे व्यवहार, सोच और संस्कृति से ही लोकतंत्र का स्वरूप बनता-बिगड़ता है। यदि लोकतंत्र को सफल होना है तो हमें इसे गंभीरता से धर्म के रूप में ग्रहण करना होगा।
ये बातें 'जागरण विमर्श' के कार्यक्रम में जमशेदपुर वर्कर्स कालेज के राजनीति विज्ञान में विभागाध्यक्ष डॉ. अशोक कुमार महापात्र ने कहीं। 'लोकतंत्र में कैसे बढ़े जनता की भागीदारी' विषय पर उन्होंने कहा कि लोकतंत्र का मूल आधार ही विचार-विमर्श है। इसके प्रति हमारी सोच क्या है। क्या सचमुच भ्रष्टाचार हर जगह है। क्या हम इसे नहीं रोक सकते। ऐसी धारणा आ गई है, तो इसका मतलब यह है कि हमने इस बीमारी को स्वीकार कर लिया है। आजादी के 70 साल बाद भी सामान्य जनता पर वोट के लिए बिकने का आरोप लगता है। क्या वाकई हर नागरिक खरीदा जा सकता है। क्या सभी बिकाऊ हैं। क्या हम सिर्फ वोट देने की मशीन बन गए हैं। यदि हम इस पर सोच नहीं बना पाए, तो गंभीर बात है। हम दूसरे की थोपी हुई सोच पर निर्णय लेते हैं। यदि ऐसा है तो लोकतंत्र में जनता की भागीदारी कैसे हो, इस पर नए सिरे से सोचना होगा। मनुष्य में किसी मसले पर मतभेद होना स्वाभाविक है, होना भी चाहिए, लेकिन विचार विमर्श से उसका समाधान भी होना चाहिए। बहुमत का अर्थ सिर्फ अधिक वोट या किसी दल को सीट मिलना नहीं है, बल्कि विचारों का बहुमत भी निहित है। यह संस्कार पैदा होना चाहिए। विचार-विमर्श की परंपरा समाप्त हो रही है, जबकि विचार थोपने की परंपरा चल रही है।
विचार-विमर्श की परंपरा इसलिए कम हो रही है, क्योंकि हममें सुनने की क्षमता कम हो गई है। कोई किसी की बात सुनना नहीं चाहता। कालेज में विद्यार्थी नहीं सुनते और बाहर बोलने की छूट नहीं है। लोकतंत्र में सबको बोलने का अधिकार तो है, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है। बोलने से पहले ही निर्णय या विचार थोप दिए जाते हैं। बोलने वाले को किसी न किसी विचारधारा का पक्षधर बताकर चुप करा दिया जाता है। इसलिए सबसे पहले हर नागरिक को सुनने की क्षमता विकसित करनी होगी। यदि हर व्यक्ति की बात सुनी जाने लगेगी, तो लोकतंत्र खुद ब खुद मजबूत हो जाएगा।
अभी यही धारणा चल रही है कि हम जो समझते हैं, वही ठीक है। हम जो सोचते हैं, उसमें कोई खोट ना देखे। हम आत्म विश्लेषण की बजाय दूसरों का विश्लेषण करते हैं। यदि हम इन बातों पर ध्यान नहीं देंगे, तो लोकतंत्र का विकृत रूप आ जाएगा। लोकतंत्र में आम जनता की भागीदारी कम से कम होती जाएगी। लोकतंत्र शायद इसलिए भटक रहा है, क्योंकि हम मूल चीजों से भटक रहे हैं। यह सोचहीन भागीदारी है।
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परिचय
डॉ. अशोक कुमार महापात्र
विभागाध्यक्ष (राजनीति विज्ञान), जमशेदपुर वर्कर्स कालेज
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