खम्मम जिले का यह छोटा सा शहर तेलंगाना के दक्षिणी भाग में स्थित है। गोदावरी की विशालता प्रकृति की अथाह ऊर्जा से भी रूबरू कराती है, जहां आप खुद को कणमात्र समझ कर इसमें खो जाते हैं। आप इस स्थान पर आते ही सुकून और शांति से भर जाएंगे। दरअसल, दक्षिण भारत में ऐसी बहुत-सी जगहें हैं, लेकिन भद्राचलम की अपनी खासियत है। यहां से तकरीबन 32 किमी. दूर स्थित पर्णशाला आते ही आप पाएंगे कि आप उसी रामनगरी में आ गए हैं, जिसका जिक्र रामायण में किया गया है। जब कल्पना मात्र से रोमांच होता हो तो सोचिए वहां वास्तव में उपस्थित रहने का प्रभाव कैसा होता होगा! वैसे, अगर आप दक्षिण भारत आकर भाषायी समस्या के बारे में सोच रहे हैं तो आपको बता दें कि हिंदी भाषियों को दक्षिण भारत के अन्य हिस्सों की तुलना में तेलंगाना और आंध्र प्रदेश घूमते हुए यह समस्या अपेक्षाकृत कम होती है। दरअसल, यहां की अधिकतर आबादी हिंदी समझती-बोलती है। इसलिए दक्षिण भारत के अन्य हिस्सों की तरह यहां भाषा की समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा।

भद्राचलम शहर में स्थित सीता-राम मंदिर भगवान राम का एक भव्य मंदिर है, जिसका निर्माण 17वीं शताब्दी में करवाया गया था। भद्राचलम के मंदिर में राम, सीता और लक्ष्मण की मूर्तियों के बारे में मान्यता है किये स्वयं प्रकट हुई थीं। माना जाता है कि पोकल्ला दम्मक्का नाम की एक महिला को स्वयं भगवान श्रीराम ने स्वप्न में भद्रागिरि पहाडि़यों पर विग्रह के अस्तित्व के बारे में बताया था। जब पोकल्ला ने वहां जाकर इसकी पुष्टि करने का प्रयास किया तो वहां विग्रह को देखकर सुखद आश्चर्य से भर गई। इसके बाद उस जगह की साफ-सफाई करके वहां राम, सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां स्थापित कीं। इसके बाद वहां अर्चना शुरू हो गई। वर्तमान में यहां जो मंदिर है, उसे भक्त रामदास द्वारा बनवाया गया। मिथकों के अनुसार, वर्तमान नगर कभी दंडकारण्य वन का एक भाग था, जिसे भगवान राम ने अपनी वापसी के लिए लिए चुना था। कहा जाता है कि भगवान राम पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ अपने वनवास के दौरान यहां आए थे।

पर्णशाला है दर्शनीय

भद्राचलम में हिंदू धर्म से जुड़े कई दर्शनीय स्थल हैं, जिनमें प्रमुख पर्णशाला है। यहां की छोटी-छोटी झोपड़ियां मुख्य आकर्षण हैं, जिनमें भगवान राम की रंग-बिरंगी मूर्तियां सजाई गई हैं। यहां सीता, लक्ष्मण तथा रावण की भी मूर्तियां हैं। कहते हैं इसी स्थल पर श्रीराम वनगमन के दौरान पर्णशाला को अपना निवास स्थान बनाया था और वनवास के दौरान 14 वर्ष यहीं व्यतीत किए थे। यह भी माना जाता है कि इसी स्थान यानी पर्णशाला में ही रावण ने सीता का अपहरण किया। यहां आप सीता के चरण चिह्न, मारीच का स्वर्णमृग रूप और संन्यासी भेष में रावण का मोजैक यहां आप देख सकते हैं। इसी स्थल के पास एक धारा मिलती है, जिसे 'सीतावागु' कहा जाता है। कहते हैं यहीं देवी सीता स्नान किया करती थीं। वैसे, पर्णशाला पर्यटकों के बीच खूब लोकप्रिय है। दरअसल, आज यह एक शानदार पिकनिक स्थल भी है। हरियाली के बीच पिकनिक मनाने का आनंद ही कुछ और है।

क्रूज की अविस्मरणीय यात्रा

यदि आप भद्राचलम यात्रा को महज एक धार्मिक यात्रा मानते हैं, तो आपको बता दें कि यहां देखने-जानने को इतना कुछ है कि आप एक बार आएंगे तो दोबारा जरूर आना चाहेंगे। इसमें सबसे अधिक लुभावनी है भद्राचलम-राजामुंदरी की क्रूज यात्रा। गोदावरी नदी राजमुंदरी से भद्राचलम की ओर बहती है, जिस पर लगभग 100 किमी. की दूरी का एक क्रूज चलता है। जिसमें 12 घंटे का समय लगता है। आप यह यात्रा राजमुंदरी या भद्राचलम कहीं से भी शुरू कर सकते हैं। लेकिन इस यात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण पापी कोंडलू की पहाडि़यां हैं, जो राजमुंदरी के आसपास हैं, इसलिए आपको यात्रा वहीं से आरंभ करनी चाहिए। आप पाएंगे कि गोदावरी नदी के किनारे-किनारे विभिन्न मंदिरों और पहाड़ी स्थानों से रूबरू होना सपनों की दुनिया की सैर से कम नहीं। यही वजह है कि जो एक बार इस क्रूज पर सवार हो यात्रा करता है, वह दोबारा यहां आने की ख्वाहिश जरूर रखता है। हां, यहां आप बरसात के मौसम में न आएं। क्रूज की यात्रा भी इस मौसम में बंद होती हैं। गोदावरी नदी में बढ़े जलस्तर के कारण राज्य सरकार इसे बंद करा देती है।

कब और कैसे पहुंचें?

नवंबर से फरवरी के विंटर सीजन में यहां का मौसम सुहावना होता है। इस दौरान औसत तापमान 20-33 डिग्री तापमान रहता है। पर्यटक इस मौसम में यहां आकर खूब आनंद लेते हैं। हैदराबाद से यह जगह लगभग 320 किमी. और खम्मम से करीब 115 किमी की दूरी पर है। यहां का नज़दीकी रेलवे स्टेशन कोठुगुडेम करीब 40 किमी. है। खम्मम और हैदराबाद से यहां आने के लिए बसें चलती हैं।  

नूतन यादव

Posted By: Priyanka Singh